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शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

मुझे अनुभव रेत के महलो का है.....(कुँवर जी)







मेरे शब्दकोष में कितने शब्दों के  अर्थ बदल गए,
अरमानो के सूरज कितने चढ़ शिखर पर ढल गए,
फौलादी इरादे वक़्त की तपन से मोम के जैसे पिघल गये,
सपनो तक जाने वाले रस्ते भौर होते ही मुझको छल गये,
इसी लिए तो आजकल बाते कम किया करता हूँ मै,
जिह्वा दब जाती है शब्दों के बोझ तले तो दो पल को सोचा करता हूँ  मै,

पहले हर हरकत एक जूनून हो जाती थी,
करना है तो बस करना है ऐसी धुन हो जाती थी,
क्या फ़िक्र थी कि ओरो की नजर ये बाते गुण या अवगुण हो जाती थी,
गुम था भविष्य,वर्तमान के लिए तो ये ही शगुन हो जाती थी,
आज शगुन को भी दो घडी टटोला करता हूँ मै,
तुमको लगा तो ठीक लगा के बाते करते सोचा करता हूँ  मै,


मुझे अनुभव रेत के महलो का है सो डरता हूँ हर आहट  से,
कितनी चतुराई क्यों न दिखाऊ हार जाता हूँ इस समय के  इक पल नटखट से,
फिर वो खड़ा मुस्कुराता है बेफिक्र और बेखबर हो मेरी हर झल्लाहट से,
सब भूलने का हौसला भी यूँ तो देता,उलझा कर तभी नयी  खटपट में,
बस यही से फिर जीने का दम भर जाता हूँ मै!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,



बुधवार, 16 मई 2012

आश्चर्य ही आश्चर्य ...... (कुँवर जी)

प्रकाश-पुन्ज को 
अभी निहारा भी न था
जी भर के,
ना समेटा ही था अभी
आश्चर्य 

आँखे खुलने का,
कि तभी
शाम का डर समां गया मन में,
सूरज के भी ढलने का रोमांच
डरा ही तो रहा था!

तम के वहम से सहमा मन
और भी चकित हो गया
जब
देखा कि
तम को भेदती हुई
वो महीन सी किरण
विराट हुई जाती है
फूटी है मुझ ही से...

जय हिन्द,जय श्रीराम!
कुँवर जी,

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

शब्द फूटे तो कहा धरूँ मै....(कुँवर जी)

 जो मुझे पसंद है
वो तो
होता नहीं..
जो हो रहा है
उसे ही पसन्द न करूँ तो
क्या करूँ मै!

झेल गया जब
मै
जो बीत चूका,
अब तो जो  भी बीते
भला उस से
क्या डरूँ मै !

गैरो से बच कर 
आया था 
अपनों की ओट में,
अब अपनों से
बचने के लिए
किसकी ओट करूँ  मै!


बहुत पीता हूँ
आंसुओ को
बिना शोर के,
ये शब्द
न माने मेरी,
फूटे तो
इन्हें कहाँ  धरूँ मै! 





जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर  जी,

बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

ताकि जो जैसा है वो रहे वैसे ही...

ओस की बूंदे जम गयी थी पलकों पर,
अब झपकते तो मोती झर नहीं जाते,


साँसों में भर ली थी सुगंध जीवन की.
अब उन्हें छोड़ते तो मर नहीं जाते,


सपनो में बदल गयी थी जिंदगी,
जागते तो सपने बिखर नहीं जाते,


तभी तो....

तभी तो
हमने रोक ली थी सांस,
झपकने नहीं दिया पलकों को
और न खुलने दी आँख सो कर एक बार!
ताकि जो जैसा है वो रहे वैसे ही...
वैसा ही...! 


कुँवर जी,
जय हिंद,जय श्रीराम!

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

जो बोलोगे तो इस राज में महज मवाद हो तुम...(कुँवर जी)



स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई देने के लिए ही आया था मै आज...पर हालात ऐसे है कि चाह कर भी न दे पाया!जो भी घटनाक्रम देश में दोहराया जा रहा है वो कतई बधाई के लिए उपयुक्त नहीं  है ऐसा भी नहीं है!

आज बधाई इस बात की कि कुछ लोग तो खुद को इस अंग्रेजो से भी बद्तर राज में गुलाम  कहलाना पसंद नहीं कर रहे है और अपनी बात रखने के लिए सरकारी अत्याचार सहने के लिए भी तैयार  हो चुके है!उन सभी को शुभकामनाये......




आज भूखे है वो जिनके पेट भरे है.....



ठूंठो को समझा हमने के पेड़ हरे है.....
 
डोली को लूटने को उसके ही कहार फिरे है...
 
भौर के सूरज के ऊपर निशा के ही डेरे है...
 
 
 
जियो जिंदगी मर-मर के क्योकि आज़ाद हो तुम...
 
जो बोलोगे तो इस राज में महज मवाद हो तुम...
 
मजबूरी और लाचारी का अनकहा संवाद हो तुम...
 
सहमत हो तो सही, नहीं तो विवाद हो तुम...
 
 
आज अपराधी है आदर्शो की राह पर चलने वाला...
 
आदमी है वो जो है हालातो के संग ढलने  वाला...
 
भ्रष्टाचार के इस दौर में घपलों पर ही पलने वाला...
 
जिसने भी विश्वाश किया उसको ही छलने वाला...
 
 
जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

ये शाम...

दिन की सारी  
उमंगो-तरंगो को समेट  
रोज
ये शाम 
ढल जाती है
सारी चमक
उम्मीदों वाली
शाम की लालिमा में
पिघल जाती है...

ये शाम 
ढल जाती है 
फिर भी ढलती नहीं
जाने क्यों
रात बन फिर
सुबह में बदल जाती है....

हारता तो नहीं हूँ
पर हार
हो ही जाती है.
उठा कदम
धरते ही
धरती सी फिसल जाती है...


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

बुधवार, 8 जून 2011

अब शायद भारत जाग जाए.....!(कुँवर जी)

अब शायद भारत जाग जाए!

जब चाहते है सब ऐसा,
हो भारत वही पहले जैसा,
वो फिर विश्वविजय के राग गाये!
तो अब शायद भारत जाग जाये!

मै,तुम,वो;हम सब क्यों न एक हो?
सर्वहित क्यों न चाहे,क्यों इरादे न हमारे नेक हो,
भला क्यों न ये दुर्भाग्य भाग जाए!
फिर तो शायद भारत जाग जाये!

बलिवेदी पर असंख्य बेटे बलिदान हुए,
कितनी मांगे उजड़ी कितने आँचल लहुलुहान हुए,
धुल अब अतीत के सारे  दाग जाए!
शायद अब भारत जाग जाये!

बस लिखो ही नहीं झकजोर दो सबको,
 राह प्रेम की कोई और दो सबको,
अब तो कुचला नफरत का ये नाग जाये!
अब शायद भारत जाग जाये!

रोना ही किस्मत नहीं तुम्हारी कब तुम जनोंगे,
आँखे खोलो नहीं तो मर कर भी क्या जागोंगे!
जो ये आंसू तुम्हारे जन-जन में बन आग जाये,
तो शायद भारत जाग जाये!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

गुरुवार, 5 मई 2011

मजबूर होते है वो भी और हम भी....(कुँवर जी)

कुछ पत्ते दूर पड़े,
ज्यादा नहीं थोड़ी सी दूर पड़े
अपने पेड़ से
कराह रहे थे....
मैंने
जो उठाया उनको
प्यार से
वो तो
मुस्कुराने लगे!


सूख चुके थे
जाने कब टूटे होंगे
शाख से,
मैंने
कब उनको उठाया था
शाख से जोड़ने के लिए,
वो;
फिर भी गुनगुनाने लगे!


मजबूर तो होते है वो
भी और हम भी
ये सच है,
तभी तो
उस
पेड़ की आँखों में भी
आंसू आने लगे!


जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

क्या तुम भी उन्हें कुछ कह नहीं पाते हो?

मुझे पता है
परिवर्तन संसार का नियम है,
फिर क्यूँ
न मै बदल सका न तुम बदले,
न हम बदले न हमारे नज़रिए बदले,
आज भी
जाती है तुझ तक मेरी नज़र
कुछ सवाल लेकर,
आज भी
कुछ भी बताती नहीं उनको तुम्हारी नज़र,
आज भी
बिना जवाब के लौटी मेरी नज़र
पूछती है मुझसे
जब
पता था ही तुम्हे
कि कुछ बताया नहीं जाएगा
तो भेजा ही क्यों था हमें वहा?

आज भी
मै कुछ कह नहीं पाता हूँ इनको !
क्या
तुम्हारी नज़र भी पूछती है तुमसे
कि क्यों हमें कुछ बताने नहीं दिया तुमने?
और
क्या तुम भी उन्हें कुछ कह नहीं पाते हो?

जय हिंद,जय श्रीराम
कुँवर जी,
 

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

ये जो दुनिया है ये तो दुनिया है!....(कुँवर जी)


ये जो दुनिया है
ये तो दुनिया है!

कभी उलट दिशा में चल कर भी साथ होती है,
कभी हम पर हंसती कभी गम में हमारे रोती है,
कभी जागते है हम और ये आराम से सोती है,
कभी हमारी एक शिकन पे चैन अपना खोती है!
ये जो दुनिया है

ये तो दुनिया है!


कभी अपनों में पराये नजर आते है,
कभी परायो में हमसायें उतर आते है,
 बारिशों में कई चेहरे और निखर जाते है,
कुछ के कई और रंग उभर आते है!
ये जो दुनिया है


ये तो दुनिया है!


माना ये जो दुनिया है ये तो दुनिया है,
मगर देखो तो आखिर हम क्या है,
सोचते है ये जानकर भी आखिर मिलना क्या है,
न ये बदलेगी कभी और अपना.....

...अरे!अपना तो ख़ैर क्या है....!

ये जो दुनिया है

ये तो दुनिया है!




जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

मंगलवार, 1 मार्च 2011

अपनों के बीच में आज अर्जुन नहीं दुर्योधन है....(कुंवर जी)




कल जब 
अमित जी की ओजपूर्ण कविता  को पढ़ा तो काफी दिनों के बाद कुछ पंक्तियाँ एक दम दिल से निकल कर आई....




अपनों के बीच में आज अर्जुन नहीं दुर्योधन है,
गीता गायी जाए तो किसके आगे ये भी उलझन है!

जो दिख रहा है उसे देख देख कर
छोटे से मन में बड़ी-बड़ी उधेड़बुन है!

बेशर्मी और बदनामी गौरव का कारण बन रही,
सच्चाई,ईमानदारी,देशभक्ति इनसे कहाँ अब जीवन है!

ठीक गलत के मायने सब बदल गए आज,
खिज़ा को ही बहार मान रहा खुद चमन है!

साधन और सुविधाओं को जुटाने को ही संघर्ष है,
साख और सोच में जैसे हो गयी कोई अनबन है!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,


गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

आँखे अब और भी चमक रही थी...(कुंवर जी)

साँस भला कब तक रोकता समय,
सुबह तो होनी ही थी,
पर ये क्या?
दिन तो निकला पर सूरज नहीं!
सब कुछ धुंधला-धुंधला
उस सर्द सुबह में,
तारे बेचारे
थक हार कर या
सुबह की लाज बचाने की खातिर
चले गए थे!
पक्षियों का आलस ज्यों का रयों था,
या तो वो घबराए हुए गुमसुम थे!
कालिया जो ख्वाब देख रही थी
खिलने के,
खुद पर तितलियों के मंडराने के,
जगी जरुर,पर मुस्कुराई नहीं,
तितलियाँ भी कहा आई थी,
क्योकि...
दिन तो निकला पर सूरज नहीं!

पत्ते उदास हो चले थे,
हौसले तोड़ दिए थे टहनियों ने भी,
और कालिया तो रो ही पड़ी
जब देखा उनके चारो और तितलियों के पंख
पड़े है बिखरे हुए!
उस पर न धुप का सहारा मिला,
तो यूँ तदपि कालिया
जैसे किसी ने सांस आने के सभी दर मूँद दिए हो...

तितलियों के बिखरे पंखो के बीच
लाचार कलियों को दम तोड़ते देख
झटके से; एक सांस खींच,
मुट्ठिया भींच आँखे खुली...
तो देखा

तितलियाँ तो उड़ रही थी,
क्योकि कालिया फूल बन खिलखिला रही थी!
पंछी भी खुले आसमान में
पर फैला चहचहा रहे थे,
क्योकि सूरज तो चमक रहा था क्षितिज पर,
और तारे कहीं भी न थे,
न उनकी जरुरत भी थी!

और बूँद ओस की,
आँख की पुतली से चल
समां गयी आँख की कौर में,
जो अब भी
पलके झपकाने से भी दर रही थी
कही फिर कोई सपना न दिख जाए,
पर
आँखे अब और भी चमक रही थी!



जय हिन्द,जय श्रीराम
कुँवर  जी,

सोमवार, 10 जनवरी 2011

साँसों पर जोर नहीं था सो चल रही थी.....

सर्द रात और गहराती जा रही थी,
पलके थी कि झपकना भी भूल गयी!
साँसों पर जोर नहीं था सो चल रही थी.....

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शनिवार, 8 जनवरी 2011

ईंट,पत्थर,कंकड़ और तिनको से भी बच्चा खेलता है...

कौन कहता है कि हंसी में रोना नहीं होता,
जरा उनसे तो पूछो जिनके पास सूना सा कोई कोना नहीं होता!

ईंट,पत्थर,कंकड़ और तिनको से भी बच्चा खेलता  है,
जिस के पास खेलने को कोई खिलौना नहीं होता!

 घास मिली तो सही नहीं तो जमीन पर ही सो गया,
जिसके पास बिछाने को कोई बिछौना नहीं होता!

जिन्दगी को जी कर तो हम भी देखते कभी ना कभी,
जो जिन्दगी भर दुखो को यूँ ही ढोना ना होता!

मन की प्यास बुझाते आँख के पानी से ही हम,
जो किस्मत पे अपनी हमें कभी रोना ना होता!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

ये रात अँधेरी और सर्द तो जरुर है,पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा...?(कुंवर जी)


ये रात अँधेरी और सर्द
तो जरुर है,
पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा..?
जो
समेटे हुए है,
अंधड़ कितने ही,
कितने ही तुषाराघात सहे हुए है!
खुशियों के कितने ही सूरज
धुंधले-धुंधले से फिर रहे है
मेरे दुखो कि धुन्ध में!
जैसे भीख मांगते हो
कुछ पल को दिखने कि खातिर!
और आस के सूरज तो
फिर से नकलने की आस छोड़,
छिप ही चुके है!

ये रात अँधेरी और सर्द तो जरुर है,
पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा...?


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

सब कुछ तो है.....(कुंवर जी)

सब कुछ तो है,
थोड़ी सी खुशिया,थोडा सुकून;
और थोडा सा चैन ही तो नहीं है!
और हाँ आस भी तो है!

सब कुछ तो है,
छोटी सी ज़िन्दगी,पाषाण सा तन,
और ये शिला सा स्थिर मन सब यही है!
और हाँ रुकी-रुकी सी सांस भी तो है!
देखा;सब कुछ तो है,





जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

रविवार, 19 दिसंबर 2010

वो जो अपनों में पराया सा,गैरों में ख़ास क्यों है?

वो जो अपनों में पराया सा,
गैरों में ख़ास क्यों है?
सब जब पहले जैसा है तो
मन उदास क्यों है?
पलके गीली है और,
इन आँखों में प्यास क्यों है?
जीवन जीने के सपनो में,
खुद को मिटाने का भास क्यों है?
"हरदीप" आँखे खुल चुकी है,
फिर भी खुशियों की आस क्यों है?

जय हिन्द,जय श्रीराम.
कुंवर जी,


शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

क्या इसीलिए बनाया हमें भगवान् ने......??? (कुंवर जी)


बोलते-बोलते
रुक जाती है जुबाँ,
हाथ थम जाते है लिखते हुए,
दिमाग भी
सुन्न सा हो जाता है जब,
सोचता है
कि
बनाने वाले ने
बनाया है
हमें,
बस उसे पूरा
या
सिद्ध करने के लिए
जो उसने कभी
ना जाने कब
      लिख दिया था....

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

अरे सब-कुछ है; बस ये भ्रम रहे......(कुंवर जी)

मै ये नहीं कहता कि हमारी मुलाक़ात हो,
हर रोज हर पल हमारी ही बात हो,
तमन्ना बस इतनी सी है कि जब दूर हो तो,
थोड़ी सी हमारी याद और थोड़े से ज़ज्बात हो!

किसने कहा कि आँखे नम रहे,
इस ज़िन्दगी से खफा  हरदम रहे,
सब-कुछ हो ये जरुरी तो नहीं यहाँ,
अरे सब-कुछ है; बस ये भ्रम रहे!



 जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

बचकानी फ़रियाद......(कुंवर जी)

कुछ

नयी बात
करनी चाही तो
सब पुरानी बातें याद आई,
चलने
लगे तो
ज़ेहन में फिर
मिलने वाली
बचकानी फ़रियाद आई!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

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