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बुधवार, 22 मई 2013

मौत भी बहला लेगी दिल अपना हमसे

जब तक जिन्दा है तो
जिंदगी के ही मरीज है,
फिर एक दिन मौत भी

बहला लेगी दिल अपना हमसे!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,
 

बुधवार, 16 मई 2012

आश्चर्य ही आश्चर्य ...... (कुँवर जी)

प्रकाश-पुन्ज को 
अभी निहारा भी न था
जी भर के,
ना समेटा ही था अभी
आश्चर्य 

आँखे खुलने का,
कि तभी
शाम का डर समां गया मन में,
सूरज के भी ढलने का रोमांच
डरा ही तो रहा था!

तम के वहम से सहमा मन
और भी चकित हो गया
जब
देखा कि
तम को भेदती हुई
वो महीन सी किरण
विराट हुई जाती है
फूटी है मुझ ही से...

जय हिन्द,जय श्रीराम!
कुँवर जी,

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

लगता है कांग्रेस सरकार ने भगवान् के साथ मुलायम या ममता के जैसे कोई गठबंधन कर लिया है!

लगता है भगवान् ने भी कांग्रेस सरकार को समर्थन दे दिया है या फिर कांग्रेस सरकार ने भगवान् के साथ मुलायम या ममता के जैसे कोई गठबंधन कर लिया है!तभी तो..... जब गेहुओ को पानी की जरुरत थी तब सरकारसही बिजली नहीं दे रही थी और वो भगवान् भी बारिश नहीं कर रहा था! और अब जब फसल कटाई के लिए बिलकुल तैयार है तब बिजली भी पहले से सही है और बारिश.... उसमे परमात्मा ने मौज कर रखी है!रही-सही कसर औलो ने पूरी कर दी!

पिछले कई महीने जिस फसल के लिए किसान दिन-रात एक कर के मेहनत कर रहा था और जब उसका फल मिलने ही वाला था....लगभग मिल भी गया था....क्योकि खेत में सोने के जैसे लहलहाती गेहूं की बैल देख कर उसकी सारी थकान और दिक्कत जो उसने पिछले कुछ महीनो में उठाई थी बहुत छोटी लग रही थी उसे.....पर ....!

नया सूरज उगते ही जो फसल लहलहा रही थी कल तक आज बरसात और औलो की मार से भारत की जनता के जैसे ज़मीन पर बिछी पड़ी थी और देख रही थी किसान की और जो की भगवान् की और टकटकी लगाए हुए था!

भगवान् की ये कांग्रेस नीति..... किसान को कही का नहीं छोड़ा!



जैसे भारत की जनता चुनावों से पहले खूब जोश दिखाती है...कांग्रेस को चुनती है फिर मंहगाई ,भ्रष्टाचार,घपले-घोटाले की बारिश और ओलावृष्टि से ज़मीन पर बिछ जाती और फिर कांग्रेस सरकार की ओर देखती है जो की भगवान् की ओर देख रही होती है....
 
 
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

अरे सब-कुछ है; बस ये भ्रम रहे......(कुंवर जी)

मै ये नहीं कहता कि हमारी मुलाक़ात हो,
हर रोज हर पल हमारी ही बात हो,
तमन्ना बस इतनी सी है कि जब दूर हो तो,
थोड़ी सी हमारी याद और थोड़े से ज़ज्बात हो!

किसने कहा कि आँखे नम रहे,
इस ज़िन्दगी से खफा  हरदम रहे,
सब-कुछ हो ये जरुरी तो नहीं यहाँ,
अरे सब-कुछ है; बस ये भ्रम रहे!



 जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

ज़ख्म देख कर भी कोई सहलाता नहीं है,,,,(कुँवर जी)

ज़ख्म देख कर भी कोई सहलाता नहीं है,
नमक डालते है,इलाज़ कोई बताता नहीं है!

आँखों में आंसूं देख आँखे झुकाते मिले सब,
हौसला बढाने को भी तो कोई मुस्कुराता नहीं है!

चौराहे तक तो खूब साथ निभाया गया,
अब गलत-ठीक ही सही,राह कोई बताता नहीं है!

उनकी जरुरत के हिसाब से तो रिश्ते बहुत बने,
अपनी बारी आई,नया-पुराना कोई रिश्ता निभाता नहीं है!

चलो किसी का अच्छा किया ही नहीं हमने,
फिर सोचा,हँसे;बुरा किया हो ये भी तो याद आता नहीं है!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

सोमवार, 22 नवंबर 2010

`अब आंसुओ में कोई रंग आता ही नहीं!..........(Kunwar ji)..

पिछले  कुछ दिन या पिछला एक-दो महीना ब्लॉग से दूर सा ही रहा,कल तक तो इतना अफ़सोस नहीं हो रहा था पर कल रोहतक में जब मै अपने परिवार से पहली बार रूबरू हुआ तो लगा जैसे ये समय कैसे बर्बाद कर दिया मैंने....

लगा जैसे लड़की अपने ससुराल से मैके में आई हो पता नहीं कितने दिनों के बाद....
लेकिन वहा जाने से मन कि उत्कंठा को तो बल मिल गया पर समय का सहारा उन्हें अब भी नहीं मिल पा रहा है!उसी के अभाव में आज बस ये पंक्तियाँ ही आपके लिए....और चेष्टा रहेगी कि निरन्तर अपने परिवार का प्यार मै पाता रहूँ...

 अपने जीवन के सारे रंग
उड़ेल दिए मैंने शब्दों के चित्र बनाने में...

अब आंसुओ में कोई रंग आता ही नहीं!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शनिवार, 3 जुलाई 2010

मै सोचता हूँ कि.......(कुंवर जी)

पिछले कई दिनों से मै वो समय नहीं निकाल पा रहा हूँ जिसे कुछ दिनो पहले तक मै अपना सबसे अनिवार्य समय मानने लगा था....विवशताएँ कहे या कुछ ओर इस पर अभी शोध कार्य चल रहे है.....मै सोच रहा हूँ कि जब तक प्रयोग सफल हो तब तक आपको एक ऐसे लड़के का किस्सा सुनाँ दूं जो मेरी ही तरह सोचता बहुत था.......पर कभी-कभी मुझ से अलग कुछ कर भी देता था.....

कभी मैंने सुना था....आज आप झेले..... 

..........एक कक्षा में किसी अध्यापक को कक्षा में ही लड्डू खाने कि तलब हो आई!लड्डू थे नहीं सो बहार दुकान से मंगवाने कि सोच ली!उसने कक्षा में दृष्टि दौड़ाई तो जो लड़का सबसे शांत दिखाई दिया उसको ही 5 रुपये दे दिए लड्डू लाने के लिए!अब जो बहुत सोचता है वो स्वाभाविक ही शांत तो होता ही है!

उस लड़के ने वो 5 रुपये दुकानदार को दिए और बोला लड्डू दे दो!दुकानदार ने लड्डू तोले,पहले तराजू में 5 रखे जब देखा के ज्यादा है तो एक निकाला!ठीक थे दे दिए!वो लड़का भी ले कर चल दिया,और शुरू हो गया उसके सोचने का सिलसिला!


उसने सोचा जब दुकानदार 5 रख कर एक वापस उठा सकता है तो वो तो मै भी 4 में से एक तो उठा ही सकता हूँ,मास्टर जी देख थोड़े ही रहे है!एक उठाया और खा गया!


बीच राह में एक बड़ा नाला था,उसे कूदने लगा तो एक लड्डू गिरते-गिरते बच गया!उसने फिर सोचा,"गिर भी तो सकता था"! एक और खा गया!


जैसे ही विद्यालय में प्रवेश किया,फिर सोचा!उसने सोचा के मै इतनी मेहनत कर के लड्डू ला रहा हूँ,कम से कम एक तो मिलेगा मुझे भी!क्यों मास्टर जी का समय नष्ट किया,सोचा बता दूंगा और खा गया!


अब जो एक बचा था उसे ही अखबार में बहुत अच्छी तरह से लपेट-सपेट कर रख दिया मास्टर जी के सामने!मास्टर जी 5 रुपये का एक लड्डू पाकर हैरान,परेशान!


उस शांत बच्चे से बड़ी शान्ति से पूछा- "5 का एक ही?"


वो बोला- "नहीं; थे तो ज्यादा यहाँ तक एक ही पहुँच पाया!"


मास्टर जी-थोडा सा सख्त हो कर-"कैसे????"


लड़का-"जी दूकानदार ने 4 रखे फिर एक उठा लिया,रह गए तीन!"


मास्टर जी- "वो तीन कहा गए ?"


लड़का-"जी एक लड्डू नाला कूदते हूए नाले में गिर गया!रह गए दो!"


मास्टर जी थोडा सा और गंभीर होते हूए- ये तो दो भी नहीं, ये कैसे???


लड़का बड़ी ही स्वाभाविक सी मासूमियत के साथ- "मैंने सोचा मै इतनी मेहनत कर के लड्डू ला रहा हूँ,कम से कम एक तो मिलेगा मुझे भी!क्यों मास्टर जी का समय नष्ट किया,सोचा बता दूंगा और खा गया!


मास्टर जी फुल्ली आग-बबूला होते हूए- "हरामजादे! मेरा लड्डू तू कैसे खा गया??"


उस लड़के ने वो लड्डू उठाया और मुह में रक्खा और खा गया,बोला-"जी ऐसे खा गया!"


मास्टर जी देखते रहे और वो जो एक लड्डू जैसे-कैसे भी आया था, वो भी उन्हें नसीब न हूआ!






मै सोचता हूँ कि........


मै केवल सोचता ही हूँ,करता नहीं हूँ ये भी ठीक ही है!


यदि वो लड़का मेरी तरह केवल सोचता ही,करता नहीं तो मास्टर जी को उनके सारे लड्डू मिल ही जाते!
{पुनः प्रकाशित}
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 21 जून 2010

रात में सूरज को तरसता हूँ,दिन में धुप से तड़पता हूँ!

गत मई मास की हिन्दी युग्म प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का मुझे भी अवसर मिला!इसमें मेरी निम्न कविता त्रितय स्थान तक के सफ़र को पूरा कर के आई है!वैसे तो हिन्दी युग्म ने इसे प्रकाशित कर दिया था,पर मुझे लगा कि मुझे भी इसे प्रकाशित कर ही देना चाहिए सो हाज़िर हूँ आपके समक्ष.....

जब ये लिखी गयी थी तो मन अजीब सी स्थिति में था जीवन यात्रा और परमात्मा के प्रति!जो कुछ मन में था अनसुलझा सा....वो कहा नहीं जा रहा था और अचानक जो जैसे कहा गया वो यही था...... 


रात में सूरज को तरसता हूँ,
दिन में धुप से तड़पता हूँ!
आखिर क्या होगा मेरा.....?
मै हूँ कहा इस यात्रा में....?
सोचता हूँ तो पाया




मुझे
ना मंजिल का पता है
ना पहचान है,
ना रास्ते में हूँ
ना सराय में,
मंजिल भी सोचती होगी
ये भी
अजीब नादान है!


खजूर की  छाँव देख भी
ललचा जाता हूँ,
जबकि जानता हूँ मै
थोडा आगे ही तो
पीपल की घनी छाँव भी है!


राह छोड़
पग-डंडियों  
पर भटक जाता हूँ,
जबकि मै
देख चुका पहले भी
कि
इनका भी तो 
ये राह ही
पड़ाव है!


ऐसा लगता है
जैसे नीन्द में हूँ,
अभी मै
सो रहा हूँ,
आँख भी खुलती है कई बार
खुली भी है,
अँधेरा देख
पता ही नहीं लगता कि
भौर है या रात
और मै फिर सो जाता हूँ!


मै सोचता हूँ
इस बार
वो मुझे बतायेगा नहीं
जगायेगा!
सही राह पर नहीं चलाएगा
बल्कि
अपनी गोदी में उठाएगा,
झूठी हंसी नहीं
सच्चे आंसू रुलाएगा.....


लेकिन क्या मै सोचता रह जाऊँगा....?



















जय हिन्द.जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 9 जून 2010

तुझको मजबूर समझ मै लौट आया.....


मै कल तेरे दरवाजे तक गया
और लौट आया,

अन्दर जाना जी ने बहुत चाहा
पर मै लौट आया,

मन ही मन तेरा दर खटखटाया
और मै लौट आया,

लगा मुझे ऐसा कि
देख लिया है तुमने मुझे कहीं से,
तुमको भी अनदेखा कर मै लौट आया,

कुछ तो रह गया था मेरा वही पर,
उसे वहीँ छोड़ कर मै लौट आया,

मै लौट आया ये मेरी मजबूरी नहीं थी,
तुझको मजबूर समझ मै लौट आया...

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 4 जून 2010

जीवन कोई दलदल है क्या........?....(क्षणिका)




जितना सुलझाना चाहता हूँ
उतना ही छटपटाता हूँ,
जितना छटपटाता हूँ
उतना ही धंसता जाता हूँ,
जीवन कोई दलदल है क्या........?
समझ ही नहीं पाता हूँ...
.
.
.

जय हिन्द जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 19 मई 2010

मै नहीं मानता कि ब्लॉगजगत केवल आतंकवादियों और उनके समर्थको से या नपुन्सको से ही भरा पड़ा है!

यहाँ सुनील जी को पढ़ा  तो मुझसे रहा ना गया!मै वहा भी इस बात पर अपनी असहमति उनसे जता चुका हूँ!पर लगा वो पर्याप्त नहीं है!

मै नहीं मानता कि ब्लॉगजगत केवल आतंकवादियों और उनके समर्थको से या नपुन्सको से ही भरा पड़ा है!एक-आध गन्दी मछली तालाब को गन्दा दिखा जरुर सकती है पर उसे गन्दा नहीं कर सकती!मेरा तो ऐसा ही मानना है!हम सभी की एक पहचान बन गयी है!भले ही वो हमने ही बनायी हो,बन गयी है!बस उसी को सजाने,सवांरने के चक्कर में हम कई जगह,जहाँ विरोध जरुरी है विरोध और जहाँ समर्थन जरुरी है समर्थन नहीं दिखा पाते!ये हमारी मजबूरीतो है पर  कमजोरी नहीं हो सकती!कुछ पंक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा....

जो मजबूत है
वो मजबूर भी तो हो सकता है,
जो हो गया प्रभु मर्जी जान
उसे मन्जूर भी तो सकता है,
मौन उसका
प्रतिशौध का तंदूर भी तो हो सकता है,
भ्रम कैसा भी हो
वो दूर भी तो सकता है!


हिन्दू बेचारा नहीं है,
उनको बेचारा जान सहम जाता है,
विनाश देखा है कई बार उसने,
इसीलिए उन पर रहम खाता है,
अपनी बलि देकर भी शांत हो जाए माहौल,
ये सोच मरता जाता है,
ना कुरेदो उसकी आत्मा को,
भड़का तो तांडव भी वो मचाता है!

कुछ तो उन्ही की पोस्ट पर टिप्पणी स्वरुप पहले भी लिखी जा चुकी है कुछ नयी है!मै बस यही बताना चाह रहा हूँ कि
यहाँ कोई भी कमजोर नहीं मजबूर नहीं,
बस वो मान बैठे है कि हम उस परमात्मा के नूर नहीं,
बस थोडा मुह फिर गया है सच्चाई से,वो सच से दूर नहीं,
सच्चाई है कडवी तो लगेगी ये कोई लड्डू मोती चूर नहीं!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,















कुंवर जी,

मंगलवार, 18 मई 2010

कमी अपनों की खलती ही है!-(कविता)

रातो में,
बातो में,

कभी खयालो में
कभी हालातो में,

कभी जोश में
कभी जज्बातों में,

किसी से बिछुड़ने पर 
किसी की मुलाकातों में,

मौत के हमले में,
कभी जिंदगी की घातों में,

बोझ होते रिश्तों में
कहीं नए जुड़ते नातों में
.
.
.
कमी अपनों की खलती ही है! 

जय हिन्द जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 12 मई 2010

भाई जान;क्षमा करना,मै तो बस आपसे बात करना चाहता था और आपने तो अपने पूरे समाज की जिम्मेवारी अपने सर पर ले ली!और उसी समाज ने आपको अकेला छोड़ दिया!लेकिन मै आपके साथ हूँ-कुंवर जी,

वैसे मै ऐसे मुद्दों को एक दिन से ज्यादा घसीटने में विश्वाश नहीं रखता!लेकिन भाई जान इस से महीने भर से चिपटे हुए है तो क्या मै दो दिन भी नहीं खेल सकता !

सलीम भाई जान;क्षमा करना,मै तो बस आपसे बात करना चाहता था और आपने तो अपने पूरे समाज की जिम्मेवारी अपने सर पर ले ली!और उसी समाज ने आपको अकेला छोड़ दिया!लेकिन मै आपके साथ हूँ!इसके लिए मुझे अपने कई भाइयो की नाराजगी भी जायज लग रही है!
पर सवाल तो ये है कि आपके समाज से क्यों कोई आपके साथ नहीं आया!सभी ने आपको अकेला छोड़ दिया!आप तो हर बार उनकी कही हर बात(गलत या ठीक ये मायने नहीं रखता) का खुला समर्थन करते थे!फिर क्यों कोई नहीं आया आपके लिए दो बोल भी लिखने!मुझे लगता है कोई भौतिक मज़बूरी रही होगी उनकी!या बात कुछ और है.....?

मैआपकी इस भावना कि "इस्लाम में पुनर्जन्म सम्भव नहीं" का पूरा सम्मान करने लगा हूँ!
पर ये नादाँ पता नहीं कौन है जो ये

"وَرَبُّكَ الْغَنِيُّ ذُو الرَّحْمَةِ إِن يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَيَسْتَخْلِفْ مِن بَعْدِكُم مَّا يَشَاء كَمَآ أَنشَأَكُم مِّن ذُرِّيَّةِ قَوْمٍ آخَرِينَ 133 إِنَّ مَا تُوعَدُونَ لآتٍ وَمَا أَنتُم بِمُعْجِزِينَ 134

अनुवाद:
और तुम्हारा अल्लाह बेनियाज़ और रहमत वाला है। (इसलिये उसे ज़ुल्म करने की कोई ज़रूरत नही है) अगर वह चाहे तो तुम सबको मार कर तुम्हारी जगह जिसको चाहे पैदा कर सकता है, उसी तरह से जिस तरह से उसने तुम्हे एक दूसरी क़ौम से पैदा किया था।"

लिख रहा है!भाई इसको समझाओ आप,मुझे तो ज्यादा जानकारी नहीं है इस बारे में!
मैंने इसे यहाँ  पढ़ा.....

और ये अनजान राणा साहब क्या कह रहे है......
"भाई जान मे आप लोगो के इस झगडे मे नही पड़ने वाला, पर एक बात जो मेरे जहाँ मे आ रही हैं वो आपसे जरुर कहना चाहूँगा, और कुंवर जी से निवेदन हैं की वो ऐसी व्यवस्था करे की उनका जवाब मेरे तक भी पहुँच जाए

"भाई जान चलो ठीक हैं आप लोग पुनर्जनम मे विश्वाश नही रखते हो तो मेरे एक शक का समाधान जरुर कर दो


आपने कुछ ऐसा कहा हैं=-" की जो जहा जनम लेकर वही पे दबा दिया जाता हैं तो कयामत के दिन उसको वही से सीधे उठाया जाता हैं तो मुसलमान जयादा रास्ट्रवादी हुआ क्योंकि वो अपने देश मे ही दुबारा जनम लेता हैं मतलब था ये आपका
1. - तो भाई जान इसमें रास्ट्रवादी वाली कौन सी बात हुई . पहले तो आप ये बताइए की क्या एक मुसलमान जो इस देश मे आतंकवादी हैं तो मरने के बाद तो वो भी आतंकवादी ही बनेगा इसी देश मे, इसकी क्या गारंटी हैं की वो देशभक्त ही बनेगा. और अगर वो आतंकवादी ही बनता है तो "तो क्या पाकिस्तान और अफगानिस्तान का आज ये हश्र इसी कारण से हैं "
2.- और एक बात अगर जो दबा हैं वो कयामत के दिन वही से उठा लिया जायेगा तो फिर ये मुस्लिम आबादी कैसे बढ़ रही हैं क्योंकि आप तो ऐसा मानते हो की जो दबा हैं वो ही उठेगा, तो बाकी लोग कहा से आये ?
और एक बात आप सब से आपको मनुष्य जनम मिला हैं उसे ऐसे धार्मिक झगडो मे जिनका कोई और हैं ना कोई छोर हैं मे मत गवावो.
किसीके भी धरम से अच्छी बातें उठाओ सिरफ .
मेरे अपने मन मे ये सवाल आये हैं और ये किसी के धरम को नीचा दिखाने या अपने धरम का प्रचार करने के लिए नही हैं .
मे तो ये सिर्फ अपने मन मे आये चंद सवालों को संतुस्ट करने के लिए पूछ रहा हूँ
सलीम भाईजान से आग्रह हैं की अगर वो जवाब न देना चाहे तो कोई बात नही मगर अगर वो जवाब दे देते हैं तो मुझे अपने मुस्लिम भाइयो के धरम को समझने मे और मदद मिल जायेगी .
- संजीव राणा
हिन्दुस्तानी"


राणा जी ने यहाँ कही अपनी बात 

चलो मेरी ना सही इनकी सद्भावना की कद्र कर के ही कोई इन्हें संतुष्ट कर दे!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 3 मई 2010

ना तो लेखनी में समर्पण है,ना सही है कभी आह कोई,क्या लिख पाऊंगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!(एक विचार...., )

ना तो लेखनी में समर्पण है,ना सही है कभी आह कोई,
क्या लिख पाऊंगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!


बहा चला गया हर बार बहाव के साथ मै,
बह गया गया कभी भाव के साथ मै,
खींच-तान रही जारी सदा लगाव के साथ मै,
रहा लुटता हर बार चुनाव के साथ मै!

क्या उलझन ही जीवन है,या पकड़ ली है गलत राह कोई,
क्या कोई सही राह चुन पाउँगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!


ये हताशा,निराशा सब तन की है,मन की तो नहीं,
देखना मेरे स्वभाव और शब्दों में कहीं अनबन तो नहीं,
मेरे विचारों में कहीं,आत्मा का उत्पीडन तो नहीं,
मेरी मुस्कान किसी के लिए कोई चुभन तो नहीं,

ना समझ  है, ना लगन,ना योग्यता ही कोई,
क्या उदहारण बन पाउँगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!















जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 29 मार्च 2010

समंदर भी बह जाता होगा ये तो ना सोचा था....(कविता)

समंदर भी बह जाता होगा ये तो ना सोचा था,
नदियों ने देखा तो रो पड़ी,
पहाड़ का बिखरना कोई आम बात नहीं,
रेत के टीलों को हैरानी तो होगी ही,
आसमान को सहारा तलाशते तो ना देखा था,
हवाओं ने देखा तो घबरा गयीं!
हवा बेखबर,रेत के टीले अनजान और नदियाँ बेचारी मासूम,
वो क्या जाने समंदर भी बहना चाहता है कभी,
पहाड़ कि बिखरने कि तमन्ना बे बुनियाद नहीं,
आसमान अकेला कब तक देखे सभी को सहारे मिलते हुए!
मगर वो जानते भी है कि उनको ऐसी कोई जरुरत नहीं,
ऐसे रहना उनकी कोई मजबूरी भी नहीं,


फिर भी.....

समंदर बहना  चाह  रहा  है,
बिखरना चाहता है पहाड़,
आसमान झुक गया है सहारे की खोज में!
और!
नदियाँ व्याकुल बही जा रही है
समंदर की और
उसे समझाने!
कही वो बह ना जाए!
रेट के टीले स्तब्ध है,
नहीं पता उन्हें वो क्या करे?
पहाड़ को बिखरने से रोकने के लिए!
हवा तो घबराई सी भटक रही है,
जिधर आसमान झुकता दिखाई दिखा,
दौड़ ली,
उसे सहारा देने......
कुंवर जी,

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

आज तो हँस ही लो..........

बधाई हो,आज २६ जनवरी है न इसीलिए!
और मै हमारे गाँव में शिव जी के निकलने की बधाई थोड़े ही दे रहा हूँ!आपको तो पता ही होगा खैर,मुझे थोडा देर से पता चला था!असल में आज छुट्टी थी तो थोडा और सो लिए थे,जब तक जागे परेड हो चुकी थी!वैसे भी लालकिले पर झण्डा मुझे ही तो फेहराना नहीं था जो जल्दी उठता! न कंपनी में ही जाना था,सो सोचा के थोडा और सो ले!

मै सोच रहा था के कल के लिए आपसे क्षमा याचना कर लू!कल मैंने शुरू किया था ये सोच कर कि  अपने बारे में कुछ न कुछ बता कर ही दम लूँगा! लेकिन एक बार फिर मै कुछ भी स्पष्ट करने में नाकाम रहा!

वास्तविकता यही है,मै भी अपने बारे में अभी कुछ स्पष्ट रूप से नहीं जान पाया हूँ!तो अब मेरे बारे में आप अधिक न सोचे!सोचने का कार्य तो आप बस मेरे लिए छोड़ दे!

मै ये सोच रहा था कि आपको एक लड़के का किस्सा सुना ही दूं जो मेरी तरह बहुत सोचता था!

मैंने भी सुना ही था.....
                                      ..........एक कक्षा में किसी अध्यापक को कक्षा में ही लड्डू खाने कि तलब हो आई!लड्डू थे नहीं सो बहार दुकान से मंगवाने कि सोच ली!उसने कक्षा में दृष्टि दौड़ाई तो जो लड़का सबसे शांत दिखाई दिया उसको ही 5 रुपये दे दिए लड्डू लाने के लिए!अब जो बहुत सोचता है वो स्वाभाविक ही शांत तो होता ही है!
उस लड़के ने वो 5 रुपये दुकानदार को दिए और बोला लड्डू दे दो!दुकानदार ने लड्डू तोले,पहले तराजू में 5 रखे जब देखा के ज्यादा है तो एक निकाला!ठीक थे दे दिए!वो लड़का भी ले कर चल दिया,और शुरू हो गया उसके सोचने का सिलसिला!
उसने सोचा जब दुकानदार 5 रख कर एक वापस उठा सकता है तो वो तो मै भी 4   में से एक तो उठा ही सकता हूँ,मास्टर जी देख थोड़े ही रहे है!एक उठाया और खा गया!
बीच राह में एक बड़ा नाला था,उसे कूदने लगा तो एक लड्डू गिरते-गिरते बच गया!उसने फिर सोचा,"गिर भी तो सकता था"! एक और खा गया!
जैसे ही विद्यालय में प्रवेश किया,फिर सोचा!उसने सोचा के मै इतनी मेहनत कर के लड्डू ला रहा हूँ,कम से कम एक तो मिलेगा मुझे भी!क्यों मास्टर जी का समय नष्ट किया,सोचा बता दूंगा और खा गया!
अब जो एक बचा था उसे ही अखबार में बहुत अच्छी  तरह से लपेट-सपेट  कर रख दिया मास्टर जी के सामने!मास्टर जी 5  रुपये का एक लड्डू पाकर हैरान,परेशान!
उस शांत बच्चे से बड़ी शान्ति से पूछा- "5 का एक ही?"
वो बोला- "नहीं; थे तो ज्यादा यहाँ तक एक ही पहुँच पाया!"
मास्टर जी-थोडा सा सख्त हो कर-"कैसे????"
लड़का-"जी दूकानदार ने 4 रखे फिर एक उठा लिया,रह गए तीन!"
मास्टर जी- "वो तीन कहा गए ?"
लड़का-"जी एक लड्डू नाला कूदते हूए नाले में गिर गया!रह गए दो!"
मास्टर जी थोडा सा और गंभीर होते हूए- ये तो दो भी नहीं, ये कैसे???
लड़का बड़ी ही स्वाभाविक सी मासूमियत के साथ- "मैंने सोचा मै इतनी मेहनत कर के लड्डू ला रहा हूँ,कम से कम एक तो मिलेगा मुझे भी!क्यों मास्टर जी का समय नष्ट किया,सोचा बता दूंगा और खा गया!
मास्टर जी फुल्ली आग-बबूला होते हूए- "हरामजादे! मेरा लड्डू तू कैसे खा गया??"
उस लड़के ने वो लड्डू उठाया और मुह में रक्खा और खा गया,बोला-"जी ऐसे खा गया!"
मास्टर जी देखते रहे और वो जो एक लड्डू जैसे-कैसे  भी आया था, वो भी उन्हें नसीब न हूआ!

मै सोचता हूँ कि........
मै केवल सोचता ही हूँ,करता नहीं हूँ ये भी ठीक ही है!
यदि वो लड़का मेरी तरह केवल सोचता ही,करता नहीं तो मास्टर जी को उनके सारे लड्डू मिल ही जाते!


खैर छोडो आज यही.........
एक बार फिर बधाई हो,इस बार असली वाली है,,,,,
राम-राम जी
कुंवर जी!

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