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गुरुवार, 28 जुलाई 2011

ये शाम...

दिन की सारी  
उमंगो-तरंगो को समेट  
रोज
ये शाम 
ढल जाती है
सारी चमक
उम्मीदों वाली
शाम की लालिमा में
पिघल जाती है...

ये शाम 
ढल जाती है 
फिर भी ढलती नहीं
जाने क्यों
रात बन फिर
सुबह में बदल जाती है....

हारता तो नहीं हूँ
पर हार
हो ही जाती है.
उठा कदम
धरते ही
धरती सी फिसल जाती है...


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

सोमवार, 10 जनवरी 2011

साँसों पर जोर नहीं था सो चल रही थी.....

सर्द रात और गहराती जा रही थी,
पलके थी कि झपकना भी भूल गयी!
साँसों पर जोर नहीं था सो चल रही थी.....

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

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