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गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

स्वयं घोषित और स्वयं प्रचारित शुद्रो और इनके हितैषियों से संवाद का एक प्रयास।

आजकल हमारे देश में दलहित भावना बहुत फल फूल रही है।वर्तमान प्रोमोशनल हाई प्रोफाइल शुद्र खूब प्रचार कर रहे है अपना।उन्ही से संवाद का एक प्रयास है।हालांकि उन्हें संवाद नहीं विवाद ही पसन्द आते है फिर भी प्रयास है।जो संवाद पसन्द हिन्दू है वो तो समझेगा ही ऐसा मेरा विश्वास है।                  
आजकल ये हाई प्रोफाइल प्रोमोशनल शुद्र ऐसा माहौल बनाते है जैसे बस अभी अभी इन लोगो के जन्म के बाद ही शुद्रो का, नारियो का उत्थान होना शुरू हुआ है।ये लालिये पैदा हो गए तो बच गए शुद्र और नारी नहीं तो हिन्दू धर्म ने तो ताड़ ही दिया होता और पता नहीं कब तक ताड़ते रहते इनको। हालाँकि ताड़ने को भी ये अपने हिसाब से समझेंगे।जिन्हें अपने सनातन इतिहास पर विश्वास ही नहीं वो खुद को शुद्र-नारी हितैषी दिखाने के लिए उसी का सहारा भी बड़ी बेशर्मी से लेते रहते है। कई युगों, हजारो-लाखो सालो की दो चार घटना को अधूरी और अपने हिसाब से घड़ कर प्रस्तुत करते हुए जरा भी नहीं लजाते। खैर लाज का इन्हें क्या पता होगा छोड़ो वो तो।

लेकिन जब उसी सनातन इतिहास के वर्तमान में खाटू श्याम के भी मन्दिर होने की बात आती है तो वो मुँह फेर लेते है। नारी को इतना सम्मान दिए जाने की बात आती है कि उसे पूज कर ही लोग देवतुल्य हो जाते है तो वो स्वयं क्या रही होगी, तो वर्तमान लालिये बहरे हो जाते है।

चलो ज्यादा पुरानी बात नहीं करते दो ढाई हजार साल की बात करते है। एक चक्रवर्ती  सम्राट एक चमार के चरणों में अपना सर रख देता है उसे अपने से ऊँचे स्थान पर बैठा कर सम्मान देता है।गुरु बनाता है। लालिये बोलेंगे हमे तो नहीं पता। तो बच्चों पढ़ो, जानो इतिहास को अपने। राजा भर्तृहरि और गोरख नाथ के बारे में रिसर्च करो। कितने ही वर्तमान प्रोमोशनल शुद्र रिसर्च कर रहे है उनको बोलो।शुद्र को कुछ ज्ञान की बात भी बताओ या उन्हें अनपढ़ रखने और रोटी-बेटी चिल्लाने की प्रेरणा ही देने का षडयंत्र तुम्हारा ध्येय है।


जय हिन्द,जय श्री राम।
कुँवर जी।

गुरुवार, 15 मई 2014

नतीजे...(कुँवर जी)

यही रात अंतिम यही रात भारी...

चलो नतीजो के आने से पहले सो लिया जाये!

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

हमें जरुरत क्या है अपने दैनिक जीवन में भगवान् की....?(कुँवर जी)

श्री हरी!ॐ !
हमें जरुरत क्या है अपने दैनिक जीवन में भगवान् की?उसके अस्तित्व को मानने अथवा न मानने से क्या फर्क पड़ता है हमारे दैनिक जीवन में?
उनका नाम लेने से अथवा स्मरण करने से अथवा उनके अस्तित्व को मान लेने से ही हमारी दैनिक जरुरत पूरी नहीं हो जाती!न ही हमें कोई नौकरी मिलती है, ना रोटी ही मिलती है और ना ही कोई मकान बन जाता है तो जरुरत क्या है उस भगवान् की हमें!भला क्यों मान ले हम उसे कि वो कहीं है भी?
मेरे एक मित्र है,आजकल अमरीका में उनका वास है!इंटरनेट के माध्यम से कुछ चर्चा चल रही थी तो कुछ ऐसे ही भाव वो जता रहे थे!
स्पष्ट शब्दों में वो जानना चाह रहे थे कोई "वैलिड" सा कारण जिसके आधार पर हम परमात्मा का होना मान ले!अब इसके गूढ़ प्रशन पर मुझे मौन ही साधना पड़ा!

अब कुछ पुरानी सुनी हुयी बाते स्मरण में आ रही है!उसको तो पता नहीं इस से संतुष्टि मिलेगी या नहीं पर मै  जरुर संतुष्ट हो जाता हूँ ऐसी बाते स्मरण कर के!

पढ़ा था कही.. कहाँ पता नहीं!

हम जब कहीं घूमने  जाते है तो अपने साथ रुपये-पैसे जरूर रखते है!हमारा ध्यान के इन पर ही केन्द्रित  होता है सबसे ज्यादा!हालांकि हम इन्हें खा नहीं सकते,ओढ़-पहर नहीं सकते पर सबसे अधिक ध्यान  पैसो पर ही होता है कि इनकी वयवस्था हमारे पास बनी रहे!और इन्हें पाने के लिए बहुत अधिक मेहनत भी
  करनी पड़ती है !
हालांकि खाना इस से ज्यादा जरुरी विषय है परन्तु हम उतना खाने कि चीजो पर ध्यान नहीं देते जितना पैसे को महत्त्व देते है!थोडा बहुत खाने की चीजे भी ले लेते है!हालांकि हम बिना खाए भी कई दिन रह सकते है फिर भी खाने की कुछ चीजे हम साथ लेके ही चलते है!

खाने से थोडा ज्यादा जरुरी है पानी!पर उस पर खाने से भी कम ध्यान दिया जाता है जाते हुए हम सोचते है कि पानी तो कही भी आसानी से उपलब्ध हो जाएगा!उपयोग के हिसाब से पानी खाने से कही अधिक बार हम प्रयोग करते है पर पानी की उपलब्धता पर खाने से कम मेहनत करनी होती है/करते है!
अब पानी से भी अधिक महत्वपूर्ण है हवा!इसके विषय में हम सोचते भी नहीं!कभी सोचते ही नहीं कि कल के लिए कुछ हवा रख ले!या कही जा रहे है तो अपनी हवा संग ले चले!
अथवा तो ये कहे कि कभी कुछ थोडा सा भी श्रम करने की जरुरत नहीं पड़ी है जीने लायक हवा को पाने के लिए!बिना कुछ किये ही ये हमें सर्वत्र उपलब्ध होती है!


क्या ये एक "वैलिड"  कारण नहीं है उसके होने का कि हमारे जीने के लिए सभी जरुरी चीजे हमें बिना किसी विशेष श्रम के उपलब्ध हो जाती है!इन सब चीजो की व्यवस्था वो पहले ही कर देता है!

यहाँ बस यही स्पष्ट करने की कोशिश थी कि जो चीज हमारे जीने के लिए, जीवन के लिए जितनी महत्वपूर्ण है, अथवा तो ये कहे  कि जीव के जीने के लिए जो चीज जितनी ज्यादा जरुरी है वो उसे उतने ही कम श्रम और अधिक आसानी से उपलब्ध हो जाती है!इसी आधार और अनुपात पर इन चीजो के लिए हमारे मन में चिंता-जरूरत  उत्पन्न होती है!

इसी तरह खाना-पानी-हवा को भी जो प्रयोग कर रहा है, जिसके बिना हम एक क्षण भी नहीं रह सकते!खाने के बिना भी हम कुछ दिन रह सकते है,पानी के बिना भी हम कुछ दिन जी सकते है और हवा के बिना भी हम कुछ समय तक जीवित रह सकते है पर जिस कारण से हम इन सबका प्रयोग कर पाते है वो आत्मा, उस चैतन्य स्वरूप का तो हम कभी ख्याल ही नहीं करते!पर वो हवा से भी अधिक समीप होता है हमारे!उसके बिना तो एक निमेष  भी शरीर जीवित नहीं रह सकता पर उसके लिए तो सांस लेने जितना श्रम भी हम नहीं करते!हमें उतना करने की भी जरुरत महसूस नहीं होती!
हमें जरूरत ही अभाव में होती है!उस परमात्मा का कभी अभाव ही हमें नहीं होता तो जरुरत भी महसूस नहीं होती!
हमें जरुरत ही नहीं है उसका होना मानने की,क्योकि कभी उसका अभाव ही नहीं है हमारे होने में!

जय हिन्द , जय श्रीराम 
कुँवर जी,
 

 

 

बुधवार, 1 मई 2013

एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल.....






थोडा रूक कर सोचे तो देखेंगे कि हम इस तरह भी तो भगवद सेवा कर सकते है!हम मानव तो अपनी जरुरत की चीजो का संग्रह कर के रख ही लेते है और जितनी जरुरत होती है उस से कहीं अधिक ही संग्रह कर लेते है!पर ये बेजुबान,निरीह पशु-पक्षी.... अभी भूख लगी तो कही जाकर खा लिया और प्यास लगी तो जो पानी कही भी उपलब्ध हो गया पी लिया! कल तो बहुत दूर है,दूसरी बार खाने-पीने के लिए भी ये संग्रह नहीं करते!

यदि हम देखे हमारी संग्रह की आदत से हम इनको भी लाभ दे ही सकते है!जो हम अपने लिए संग्रह कर रहे है उसमे से कुछ हिस्सा इनके लिए निकाल ले,और रख दे कही ऐसी जगह जो इनकी पहुँच में हो सरलता से,और सुरक्षित भी हो!और सोचो कितना हमें इनके लिए निकालना है,बहुत कम मात्र ही इनके लिए पर्याप्त है!




एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल,अनाज या जो भी अन्न हमें आसानी से मिल जाता हो!बस इतने से ही हम अपनी भगवद सेवा कर सकते है!हाँ,बदले में इन्हें खाने-पीने वाले पंछी आपको धन्यवाद बोलने तो नहीं आयेंगे पर आपको अनुभव जरूर होगा कि आपको धन्यवाद मिल गया है!अरे सोचना कि नहाने में एक लोटा पानी कम प्रयोग कर लेंगे, मंजन में थोडा कम पानी खर्च लेंगे.... और कितनी ही ऐसी गैरजरूरी पानी की बर्बादी को कम कर के हम ये एक लोटा पानी रोज निकाल ही सकते है और जिनमे हमें कुछ कमी भी महसूस नहीं होगी उस एक लोटे पानी की!

जरुरत है तो बस एकबार सच्चे मन से संकल्प करने की कि अब मुझे हर रोज एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल पंछियों के लिए निकालने ही है और छत पर,झांकी में या कही भी उनकी सरलता से पहुँच वाली जगह रखनी है......बस! फिर तो भगवान् भी आपको नहीं रोक सकता उन पंछियों के लिए ऐसा करने से!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

कहा है साहस खुद को उघाड़ने का....(कुँवर जी)

सब विषयो,
शीर्षकों,
मुद्दों,शब्दों को
इक्कठा कर
जब
कुछ लिखने  की सोचता हूँ
तो एक-एक कर के
सब दूर जाते दिखते है....
बस
रह जाता हूँ
खड़ा मै अकेला
और
बात मुझ पर आकर
रुक ही जाती है....

और फिर क्या....

सब मौन....

कहा है साहस खुद को उघाड़ने का....????

कुँवर जी,

शुक्रवार, 6 मई 2011

आतंकवादी देश पाकिस्तान है या भारत....????


अभी कुछ देर पहले ही मोबाइल में एक लघु सन्देश पाप्त हुआ!उसे पढ़ कर एक बार तो दिमाग सोचने पर मजबूर हुआ!फिर मैंने महसूस किया की मै  मष्तिष्क को उस विचार से सहमती से नहीं रोक पा रहा हूँ!जब मै ये सहन नहीं कर पाया तो सोचा आप सब की राय ली जाए!

उस सन्देश का तात्पर्य यही था कि आतंकवादी देश पाकिस्तान नहीं बल्कि   भारत है!

आप सहमत इस विचार से...???
मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय इस से सहमत होगा!पर जो सन्देश था वो ये है....

"पाकिस्तान में कोई भी सुरक्षित नहीं है,यहाँ तक कि ओसामा बिन लादेन तक भी नहीं!
जबकि भारत में हर कोई सुरक्षित है,अजमल कसाब,अफज़ल गुरु...सभी!

अब आप क्या सोच रहे है..??
हो सके तो सूचित जरूर करना....

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी, 

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

शादी से पहले बातचीत .......?

राम राम जी,एक बार फिर ब्लॉगजगत से दूरी बनी हुयी है!कुछ नया भी लिखा नहीं जा रहा है!आज फिर एक शुरूआती पोस्ट आपके लिए.....

यह विषय आज के समय को देखते हुए बड़ा जरुरी-सा विषय बनता जा रहा है!हालांकि इसकी आवशयकता है भी या नहीं ये परिस्थितियों पर बहुत निर्भर करता है,मेरे हिसाब से तो!इसका एक कारण बताया जाता है कि लड़की ओर लड़के की आपस में जानकारी बढ़ेगी और वो एक दुसरे को और अच्छी तरह जान पायेंगे!जिस से कि उनका आने वाला समय बेहतर होगा!


किन्तु कई बार इसका उल्टा हुआ है!उनकी आपस में एक दुसरे के बारे में जानकारी तो बढ़ जाती है,लेकिन एक रिश्ता जो बनने जा रहा था वो बन नहीं पाता!यहाँ तक कि शादी होने के बाद भी!क्योंकि वो जान जाते है एक दुसरे के बारे में,पहले ही!रोमांच सारा ख़त्म!
पहले क्या होता था,या गाँव-देहात में क्या होता है,लड़का-लड़की एक दुसरे से बात करना तो दूर,जानते भी नहीं,और शादी हो गयी जी!आधुनिक जगत को ये बात बहुत अखरती है!ऐसा कैसे हो गया,कैसे हो सकता है?पता नहीं वो एक दुसरे को समझ पायेंगे या नहीं?वो नहीं समझ पायेंगे तो सुखी कैसे रहेंगे?वगराह-वगराह!

वो ज्यादातर सुखी रहते है!

असल में सुखी रहने का रहस्य दुसरे को समझने में कम और खुद को समझने में अधिक छिपा है!ऐसा नहीं है के वो एक दुसरे को नहीं समझते,समझते है!लेकिन जब तक वो एक दुसरे को समझते है तब एक बहुत बड़ा कालखण्ड जीवन का बीत चुका होता है,जानने के रोमांच में!और जो आनंद मनुष्य दुसरे की जिन्दगी ने झाँक कर लेता है उसका शायद कोई विकल्प नहीं!वो आनंद ले रहे होते है 'किसी अपने' की जिंदगी में झाँकने का!जबकि यही काम यदि शादी से पहले किया जाए तो हम केवल 'किसी' लड़के या लड़की की जिंदगी में झाँक रहे होते है जो अभी तक हमारा कुछ नहीं है!भविष्य में हो सकता है,अभी कुछ नहीं है!सो एक एह्न्कार-सा मन में आ जाता है कि हम निष्पक्ष होकर किसी की जिंदगी में देखेंगे जो की हम कभी हो ही नहीं सकते!एह्न्कार में निर्णय ठीक ही हो इसकी सुनिश्चितता नहीं होती!

दूसरी और जब हम 'किसी अपने' की जिंदगी में झांकेंगे तो हमारे पास निष्पक्ष होने या रहने की मजबूरी नहीं होती!हम स्वाभाविक ही अपने का पक्ष ले सकते है!उसमे केवल अच्छा ही देखने की कोशिश करेंगे!कुछ बुरा यदि दिखाई दे भी जाए तो सोच लेते है की पहले रहा होगा,अब हम नहीं होने देंगे ऐसा!कमियाँ अब भी देखेंगे साथ ही उन्हें ख़त्म करने के उपाय भी!

जबकि शादी से पहले केवल कमियाँ ही दिख पाती है,उपाय तक जाने की कोशिश ही नहीं की जाती!करे भी क्यों?किसके लिए?"ये नहीं तो और सही" वाली खिड़की होती है अभी हमारे पास!वो भी खुली हुई!कोई चिंता ही नहीं!

हालांकि इसका कभी-कभी लाभ भी होता है दोनों को! पर मैंने अब तक ऐसा कम ही देखा है!वैसे जो अनुभव हमारा है वो केवल हमारा ही है!जरूरी नहीं जिन परिस्थितियों में 'क' जो करेगा वही उन्ही परिस्थितियों 'ख' के लिए भी सही रहेगा!


जय हिंद,जयश्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

ये रात अँधेरी और सर्द तो जरुर है,पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा...?(कुंवर जी)


ये रात अँधेरी और सर्द
तो जरुर है,
पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा..?
जो
समेटे हुए है,
अंधड़ कितने ही,
कितने ही तुषाराघात सहे हुए है!
खुशियों के कितने ही सूरज
धुंधले-धुंधले से फिर रहे है
मेरे दुखो कि धुन्ध में!
जैसे भीख मांगते हो
कुछ पल को दिखने कि खातिर!
और आस के सूरज तो
फिर से नकलने की आस छोड़,
छिप ही चुके है!

ये रात अँधेरी और सर्द तो जरुर है,
पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा...?


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 25 जून 2010

हमारी ऐसी कौन सी मज़बूरी है जो आज़ादी सिर्फ विकारों को ही मानते जा रहे है!

आजकल
 अमित भाई साहब के लेखो पर गरमागरम बहस सी चली हुई है!उन्ही की एक पोस्ट पर टिप्पणी लिखने लगा तो ये लिखा गया...... उन्होंने कहा...
".....लेकिन  विकारों को आजादी का नाम देकर जिस तरह से अपनाये जाने की घिनोनी भेडचाल मची उससे सारा ढांचा ही भरभरा रहा है...." 


तो इस पर मेरे विचार कुछ यूँ थे....
इस बात से तो कोई भी असहमत नहीं होगा!असल बहस का मुद्दा भी यही होना चाहिए!क्यों हम विकारों को आज़ादी का नाम देने पर तुले हुए है!

श्रेष्ठ कौन है? इसका उत्तर हम किस से ले रहे है और किसे दे रहे है?भगवान् श्री ने अर्धनारीश्वर का रूप सम्भवतः इसी असमंजस के नाश के लिए ही धरा होगा,पर हम जब भगवान् के इशारों को भी अनदेखा कर रहे है तो भला किसी ओर के बताने से तो क्या समझेंगे!
हमारी ऐसी कौन सी मज़बूरी है जो आज़ादी सिर्फ विकारों को ही मानते जा रहे है!क्या सच में कोई पीड़ित वर्ग है जो आज़ाद हो ही जाना चाहिए,या फिर यह कोई मानसिक विकृता भर है!मुझे लगता है हमें ऐसे विकारों से आज़ादी की जरुरत है!

हम ब्लॉग लिख-पढ़ रहे है तो स्वभावतः ही बुद्धिजीवी तो होने ही चाहिए.....और बुद्धिजीवियों में असहमति हो जाए किसी बात पर तो इस से भी सकारात्मक परिणाम ही आने चाहिए!एक सार्थक,निष्पक्ष और निर्णायक बहस के रूप में!लेकिन इसका अर्थ ये नहीं की यदि आपने मेरी बात नहीं मानी तो मै आपके प्रति कटुता पाल लूँ,और एक निरर्थक बहस को जन्म दे दूँ!


हमें कम से कम अपने प्रति जिम्मेवार तो होना ही चाहिए!और मेरे हिसाब से जो अपनी जिम्मेवारी को इमानदारी से निभा रहा है वो ही श्रेष्ठ है अब चाहे वो पुरुष है या नारी,ये महत्त्व नहीं रखता!इसे भी मुझे ऐसा कहना चाहिए कि "अपनी जगह" वो श्रेष्ठ है!

फिर से मुद्दे पर आते है....

क्या हमारी वर्तमान शिक्षा हमें ये सोचने पर विवश कर रही कि जो परंपरा या संस्कृति हमारी पिछली पीढ़ी ने निभायी वो एक ग़ुलामी और दकियानूसी के सिवाय कुछ नहीं...?

क्या वो संस्कृति या परम्परा असल में ही वैसी ही है जैसा कि नयी पौध के कुछ पौधे उसे समझ रहे है?यदि नहीं तो क्यों उसने उन्हें अपने में नहीं ढाला?

क्या हम खुद इतने संस्कारित नहीं रहे है कि आने वाली पीढ़ी तक उन संस्कारों को पहुंचा सके?

जहाँ तक मै अपनी बात करूँ तो स्थिति ये है कि वैसे तो मै उन संस्कारों को,परम्पराओं को अपने मन में सहेजे हुए हों,और दैनिक जीवन में उनका सहारा भी लेता रहता हूँ!पर कई बार मन में आ जाता है कि थोडा सा इन के बिना भी आचरण हो जाए तो कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ेगा और एक-आध बार मै ऐसा कर भी डालता हूँ!तो क्या ये एक-आध बार करने कि प्रवृत्ति ही बड़ा कारण बन सकती है भविष्य में.....?

अब मै अपने माता-पिता और घर की बात करूँ तो वो एक पुरानी सोच वाला परिवार ही है!उन्हें मेरा अथवा मेरे अन्य भाइयो का शाम होते ही घर में होना पसंद है!हालांकि मै कई बार सोचता हूँ कि हमारी वजह से कोई भी,कैसा भी उल्हाना अब तक नहीं आया सो हमें थोड़ी बहुत छूट मिलनी चाहिए पर अन्त में उनकी बात ही ठीक लगती है...जब किसी पर अकारण ही बुराई आती दिखती है तो....!इस पर भी हमारी जितनी बहने है उनमे से जिसने भी पढने की इच्छा जताई है उन्होंने स्नातक तक पढ़ाई की ही है,उस से ऊपर भी पढ़ी है,तो यहाँ कोई बंधन भी दिखाई नहीं देता!

अब मैंने अपनी बात आपके समक्ष रखी...मै आशा करता हूँ कि आप भी एक बार अपना आंकलन इस हिसाब से जरूर करेंगे,यदि योग्य समझे तो उस आत्म-मंथन से हमें भी अवगत कराये....!
आप सभी शुभकामाए स्वीकार करे...

जय हिन्द.जय श्री राम,
कुंवर जी,

सोमवार, 31 मई 2010

क्या हमारा अपना इतना सामर्थ्य है की हम परमात्मा की दी हुई प्रेरणा को अस्वीकृत कर दे,उसे औचित्यहीन घोषित कर दे,बिना उसकी सहमती या आज्ञा के.....?-(एक विचार....)

आज बस एक प्रशन जिससे मै अकेला जूझता रहता हूँ!

"क्या हमारा अपना इतना सामर्थ्य है कि  हम परमात्मा की दी हुई प्रेरणा को अस्वीकृत कर दे,उसे औचित्यहीन घोषित कर दे,बिना उसकी सहमती या आज्ञा के.....?"


मै मानता हूँ कि 'शब्द' 'विचार' को अक्षरशः प्रस्तुत करने में असफल ही होते है और फिर उन असफल शब्दों से जो विचार बनेंगे क्या वो सफल सिद्ध होंगे.....?नहीं जानता....

तत्पश्चात भी मेरे विचारों के अधिकतम समीप जो शब्द मुझे जान पड़े वही आपके हवाले कर रहा हूँ...आज...!
जो कुछ भी आपके मस्तिष्क में चले इसे पढ़कर कृपया अवश्य अवगत कराये सभी को....क्या पता आपके बहाने किस को क्या मिल जाए........

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 19 मई 2010

मै नहीं मानता कि ब्लॉगजगत केवल आतंकवादियों और उनके समर्थको से या नपुन्सको से ही भरा पड़ा है!

यहाँ सुनील जी को पढ़ा  तो मुझसे रहा ना गया!मै वहा भी इस बात पर अपनी असहमति उनसे जता चुका हूँ!पर लगा वो पर्याप्त नहीं है!

मै नहीं मानता कि ब्लॉगजगत केवल आतंकवादियों और उनके समर्थको से या नपुन्सको से ही भरा पड़ा है!एक-आध गन्दी मछली तालाब को गन्दा दिखा जरुर सकती है पर उसे गन्दा नहीं कर सकती!मेरा तो ऐसा ही मानना है!हम सभी की एक पहचान बन गयी है!भले ही वो हमने ही बनायी हो,बन गयी है!बस उसी को सजाने,सवांरने के चक्कर में हम कई जगह,जहाँ विरोध जरुरी है विरोध और जहाँ समर्थन जरुरी है समर्थन नहीं दिखा पाते!ये हमारी मजबूरीतो है पर  कमजोरी नहीं हो सकती!कुछ पंक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा....

जो मजबूत है
वो मजबूर भी तो हो सकता है,
जो हो गया प्रभु मर्जी जान
उसे मन्जूर भी तो सकता है,
मौन उसका
प्रतिशौध का तंदूर भी तो हो सकता है,
भ्रम कैसा भी हो
वो दूर भी तो सकता है!


हिन्दू बेचारा नहीं है,
उनको बेचारा जान सहम जाता है,
विनाश देखा है कई बार उसने,
इसीलिए उन पर रहम खाता है,
अपनी बलि देकर भी शांत हो जाए माहौल,
ये सोच मरता जाता है,
ना कुरेदो उसकी आत्मा को,
भड़का तो तांडव भी वो मचाता है!

कुछ तो उन्ही की पोस्ट पर टिप्पणी स्वरुप पहले भी लिखी जा चुकी है कुछ नयी है!मै बस यही बताना चाह रहा हूँ कि
यहाँ कोई भी कमजोर नहीं मजबूर नहीं,
बस वो मान बैठे है कि हम उस परमात्मा के नूर नहीं,
बस थोडा मुह फिर गया है सच्चाई से,वो सच से दूर नहीं,
सच्चाई है कडवी तो लगेगी ये कोई लड्डू मोती चूर नहीं!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,















कुंवर जी,

मंगलवार, 11 मई 2010

ब्लॉग-जगत की शान,आतंकवादी भाई जान,सलीम खान से एक छोटा सवाल अपना भी!पता नहीं वो बताएँगे या नहीं!मर्जी है उनकी आखिर नियत है उनकी!-कुंवर जी,

मै पिछले कई दिनों से अपने आप को इस विषय से बचाए हुए था!पर मन चंचल आखिर चंचलता दिखा ही गया!आतंकवादी भाई जान,मुस्लिम जगत की शान,सलीम खान का प्रेम मुझे खींच ही लाया दुबारा से इस खेल में!हालांकि वो भरे-पूरे मस्तिष्क के स्वामी है,इस पर किसी को भी कोई भी आपत्ति नहीं होगी!फिर पता नहीं क्यों.......?

पता नहीं क्यों वो एक बात पर अटक गए है!अब उनको बताने वाले एक तरह से छक भी चुके है और थक भी चुके है!अब मेरा इरादा भी उनको कुछ बताने का नहीं है!मै तो बस एक छोटी सी बात उन से ही पूछना चाह रहा हूँ!पता नहीं वो बताएँगे या नहीं!मर्जी है उनकी आखिर नियत है उनकी!

वो हर बार,बार-बार ये ही पूछ रहे है कि "अगर सावरकर जी का पुनर्जन्म अफ़गानिस्तान में तालिबान समर्थक में हुआ तो इस बात की गारंटी कौन लेगा कि भारत के ख़िलाफ़ किसी भी आतंकी घटना में वे लिप्त नहीं होंगे??? और अगर ऐसा हुआ तो उस राष्ट्रवाद का क्या होगा जिसे वीर सावरकर अपने कथित खून पसीने से सींचा था !!!??? "

तो भईया,मेरे सारे तर्क आपकी तार्किक  बुद्धि के आगे निष्प्राण है!मुझे अपनी शरण में आया जान,मुझे और सभी को ये बताने का कष्ट करे कि उपरोक्त वाक्य में सावरकर जी कि जगह आप अपने आदरणीय(हमारे लिए भी) पिताश्री को रख दे तो आपका क्या तर्क होगा!क्या ख्याल होगा इस बारे में!

 मान लीजिये आपके पिताश्री या दादा श्री का पुनर्जन्म पाकिस्तान या उस टाइप कि दूसरी जगह हो गया जो भारत के खिलाफ छदम या प्रत्यक्ष युद्ध में रत हो तो आपका कैसा वयवहार रहेगा उनके प्रति!
मुझे पूरा विश्वाश आप इसका सभी को(अपने समेत) संतुष्ट करने वाला उत्तर आज दे ही दोगे,और अपनी तर्कशीलता लोहा एक बार फिर ब्लोगजगत को मनवा के रहोगे!आज इस रहस्य का पटाक्षेप हो ही जाए!
आपका शुभचिंतक ही मानिए मुझे तो आप!

जय हिंद,जय श्रीराम!
कुंवर जी,

सोमवार, 3 मई 2010

ना तो लेखनी में समर्पण है,ना सही है कभी आह कोई,क्या लिख पाऊंगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!(एक विचार...., )

ना तो लेखनी में समर्पण है,ना सही है कभी आह कोई,
क्या लिख पाऊंगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!


बहा चला गया हर बार बहाव के साथ मै,
बह गया गया कभी भाव के साथ मै,
खींच-तान रही जारी सदा लगाव के साथ मै,
रहा लुटता हर बार चुनाव के साथ मै!

क्या उलझन ही जीवन है,या पकड़ ली है गलत राह कोई,
क्या कोई सही राह चुन पाउँगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!


ये हताशा,निराशा सब तन की है,मन की तो नहीं,
देखना मेरे स्वभाव और शब्दों में कहीं अनबन तो नहीं,
मेरे विचारों में कहीं,आत्मा का उत्पीडन तो नहीं,
मेरी मुस्कान किसी के लिए कोई चुभन तो नहीं,

ना समझ  है, ना लगन,ना योग्यता ही कोई,
क्या उदहारण बन पाउँगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!















जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

अब इतनी जिम्मेवारी तो हमारी बनती ही है कि हम सजग रहे!एक विचार....

क्या आप एक सामजिक आदमी और धार्मिक आदमी में फर्क महसूस करते है!मतलब धर्म और समाज कितने जुड़ा है एक-दुसरे से!क्या एक सामजिक आदमी धार्मिक हो सकता है या एक धार्मिक आदमी सामाजिक नहीं हो सकता!कई बार जो बाते समाज के हिसाब से हितकर होती है धर्म उसे मान्यता नहीं देता!कई बार समाज ही धर्म की बातो के खिलाफ दिखाई देता है!हालांकि मै अभी "धर्म" को ही नहीं समझ पाया हूँ अभी,शायद तभी ऐसा कहने की गलती कर रह हूँ!और अज्ञानी कहाँ नहीं हो सकते!किन्ही विषयों में कोई अज्ञानी है,किन्ही में कोई!


मै यदि कुछ बोल रहा हूँ तो वो मेरी जिम्मेवारी है कि मै सिर्फ वो ही बोलू जो मेरी जानकारी,अनुभव और बुद्धि से मेल खा रहा हो!इसमें यदि मेरी बुद्धि किसी और के हितो के बारे में भी उतनी ही सजग है जितनी कि मेरे खुद के हितो के बारे में तो शायद मै जो बोलूँगा वो सभी को अच्छा भी लगेगा और सभी के लिए हितकर भी होगा,अब चाहे मेरी जानाकरी और अनुभव मुझे कुछ भी कह रहे हो!


हर कोई ये तालमेल सदैव बना के रखे,क्या ये सभी के लिए सम्भव है!कभी-कभी बुद्धि भी विचलित हो जाती है,कभी जानकारी और कभी अनुभव के चक्करों में पड़ जाती है!कई बार हम वो नहीं बोल पाते जो हम वास्तव में कहना चाहते है,बल्की वो ही बोल जाते है जो दूसरा हम से कहलवाना चाह रहा है!


अब इतनी जिम्मेवारी तो हमारी बनती ही है कि हम सजग रहे!


ये बाते अमित  भाई  की पोस्ट पर दी गयी टिपण्णी है!कुछ अच्छा पढेंगे तो अच्छा लिखने की भी प्रेरणा मिलती ही है!क्यों जी......


जय हिंद जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

देखना एक बार क्या ये सच्ची बात है?(वयंग्य),

देखना एक बार ये आँखों की चमक
ये हाथो की पकड़
ये होंठो पर मुस्कान
क्या सच्ची बात है!
या फिर
महज़ औपचारिकताओं की
करामात है!

ये फोटो अभी कुछ दिन पहले दैनिक  जागरण  में  छपा  था!देख कर कुछ अटपटा सा तो लगा,पर सोचा काश ये सब सच्चा होता!आप क्या सोचते है इस बारे में.....?

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

कृप्या सच्चे मुसलमान भाई इसे ना पढ़े! मै नहीं चाहता मेरी वजह से किसी मुस्लिम भाई के इस्लाम का उल्लंघन हो!लेकिन जवाब कौन देगा भाई?

मेरा इरादा कभी भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कतई नहीं रहा है!बस विषय कई बार ऐसे होते है कि कई बार बहस चल ही पड़ती है!हो  सकता  है  कि मै गलत हूँ,तो सही बताने वालो का भी स्वागत है जी!


 "मुफ्ती अब्दुल कुदूस रूमी ने फतवा जारी करते हुए कहा कि राष्ट्रगान का गायन उन्हें मुस्लिमों को नरक पहुँचाएगा। बहिष्त लोगों में लोहा मण्डी और शहीद नगर मस्जिदों के मुतवल्ली भी थे। इनमें से 13 ने माफी मांग ली। आश्चर्य की बात है कि अपराधिक गतिविधियों में शामिल होना, आतंकवादी कार्रवाईयों में भाग लेना, झूठ, धोखा, हिंसा, हत्या, असहिष्णुता, शराब, जुआ, राष्ट्र द्रोह और तस्करी जैसे कृत्य से कोई नरक में नहीं जाता मगर देश भक्ति का ज़ज़बा पैदा करने वाले राष्ट्र गान को गाने मात्र से एक इंसान नरक का अधिकारी हो जाता है।"
इसीलिए मै सच्चे मुसलमान भाइयो से पहले ही अपील कर चुका हूँ!
                           
वन्दे मातरम्‌ गीत आनन्दमठ में 1882 में आया लेकिन उसको एक एकीकृत करने वाले गीत के रूप में देखने से सबसे पहले इंकार 1923 में काकीनाड कांग्रेस अधिवेशन में तत्कालीन कांग्रेसाध्यक्ष मौलाना अहमद अली ने किया जब उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के हिमालय पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को वन्दे मातरम्‌ गाने के बीच में टोका। लेकिन पं. पलुस्कर ने बीच में रुकर कर इस महान गीत का अपमान नहीं होने दिया, पं- पलुस्कर पूरा गाना गाकर ही रुके।


उस हिसाब से  तो ब्रिटेन के राष्ट्र गान में रानी को हर तरह से बचाने की प्रार्थना भगवान से की गई है अब ब्रिटेन के नागरिकों को यह सवाल उठाना चाहिए कि कि भगवान रानी को ही क्यो बचाए, किसी कैंसर के मरीज को क्यों नहीं?
बांग्लादेश से पूछा जा सकता है कि उसके राष्ट्रगीत में यह आम जैसे फल का विशेषोल्लेख क्यों है?
सउदी अरब का राष्ट्रगीत ‘‘सारे मुस्लिमों के उत्कर्ष की ही क्यों बात करता है और राष्ट्रगीत में राजा की चाटुकारिता की क्या जरूरत है?सीरिया के राष्ट्रगीत में सिर्फ ‘अरबवाद की चर्चा क्या इसे रेसिस्ट नह बनाती? ईरान के राष्ट्रगीत में यह इमाम का संदेश क्या कर रहा है? लीबिया का राष्ट्रगीत अल्लाहो अकबर की पुकारें लगाता है तो क्या वो धार्मिक हुआ या राष्ट्रीय?


शम्सु इस्लाम हमें यह भी जताने की कोशिश करते हैं कि वन्दे मातरम्‌ गीत कोई बड़ा सिद्ध नहीं था और यह भी कोई राष्ट्रगीत न होकर मात्र बंगाल गीत था। वह यह नहीं बताते कि कनाडा का राष्ट्रगीत 1880 में पहली बार बजने के सौ साल बाद राष्ट्रगीत बना। 1906 तक उसका कहीं उल्लेख भी नहीं हुआ था। आस्ट्रेलिया का राष्ट्रगीत 1878 में सिडनी में पहली बार बजा और 19 अप्रैल 1984 को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त हुआ।


सवाल यह है कि इतने वषो तक क्यों वन्दे मातरम्‌ गैर इस्लामी नहीं था?


क्यों खिलाफत आंदोलन के अधिवेशनों की शुरुआत वन्दे मातरम्‌ से होती थी और ये अहमद अली, शौकत अली, जफर अली जैसे वरिष्ठ मुस्लिम नेता इसके सम्मान में उठकर खड़े होते थे। बेरिस्टर जिन्ना पहले तो इसके सम्मान में खडे न होने वालों को फटकार लगाते थे। रफीक जकारिया ने अपने निबन्ध में इस बात की ओर इशारा किया है। उनके अनुसार मुस्लिमों द्वारा वन्दे मातरम्‌ के गायन पर विवाद निरर्थक है। यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान काँग्रेस के सभी मुस्लिम नेताओं द्वारा गाया जाता था। जो मुस्लिम इसे गाना नहीं चाहते, न गाए लेकिन गीत के सम्मान में उठकर तो खड़े हो जाए क्योंकि इसका एक संघर्ष का इतिहास रहा है और यह संविधान में राष्ट्रगान घोषित किया गया है।


1906 से 1911 तक यह वंदे मातरम्‌ गीत पूरा गाया जाता था तो इस मंत्र में यह ताकत थी कि बंगाल का विभाजन ब्रितानी हुकूमत को वापस लेना पडा, लेकिन, 1947 तक जबकि इस मंत्र गीत को खण्डित करने पर तथाकथित ‘राजनीतिक सहमति बन गई तब तक भारत भी इतना कमजोर हो गया कि अपना खण्डन नहीं रोक सका यदि इस गीत मंत्र के टुकड़े पहले हुए तो उसकी परिणति देश के टुकडे होने में हुई।मदनलाल ढींगरा, फुल्ल चाकी, खुदीराम बोस, सूर्यसेन, रामप्रसाद बिस्मिल और अन्य बहुत से क्रांतिकारियों ने वंदे मातरम कही कर फासी के फंदे को चूमा। भगत सिंह अपने पिता को पत्र वंदे मातरम्‌ से अभिवादन कर लिखते थे। सुभाषचं बोस की आजाद हिन्द फौज ने इस गीत को अंगीकार किया और सिंगापुर रेडियो स्टेशन से इसका प्रसारण होता था।


ये है जी वो हमारा सर्व-सम्माननीय राष्ट्रगीत!


सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्

सस्य श्यामलां मातरंम् .
शुभ्र ज्योत्सनाम् पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम् .
सुखदां वरदां मातरम् ॥

कोटि कोटि कन्ठ कलकल निनाद कराले
द्विसप्त कोटि भुजैर्ध्रत खरकरवाले
के बोले मा तुमी अबले
बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम् ॥



तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि ह्रदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे ॥


त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् ॥


श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
धरणीं भरणीं मातरम् ॥


आज कि सारी सामग्री मैंने "वन्देमातरम इतिहास विकिपीडिआ" से ली है!मै इसके लिए 
"वन्देमातरम इतिहास विकिपीडिआ" का आभारी हूँ!u -tube पर सुनने-देखने के लिए नीचे दिए गए लिन्क पर क्लिक कर के कुछ महसूस करे! चित्र भी गूगल से ही लिया है!


http://www.youtube.com/watch?v=xj1Iy4nRMkc




"इस देश में असंख्य अल्पसंख्यक वन्दे मातरम्‌ के प्रति श्रद्धा रखते हैं। यह उनकी श्रद्धा का अपमान ही था जब आगरा में 10 मार्च 2004 को 54 मुसलमानों को जाति बाहर कर दिया गया और उनकी शादिया शून्य घोषित कर दी गई क्योंकि उन्होंने  कहीं ये कह दिया था कि वन्दे मातरम्‌ गाना गैर इस्लामी नहीं है।"


सवाल यह है कि इतने वषो तक क्यों वन्दे मातरम्‌ गैर इस्लामी नहीं था?



क्यों खिलाफत आंदोलन के अधिवेशनों की शुरुआत वन्दे मातरम्‌ से होती थी और ये अहमद अली, शौकत अली, जफर अली जैसे वरिष्ठ मुस्लिम नेता इसके सम्मान में उठकर खड़े होते थे। बेरिस्टर जिन्ना पहले तो इसके सम्मान में खडे न होने वालों को फटकार लगाते थे।




कृप्या सच्चे मुसलमान भाई इसे ना पढ़े! मै नहीं चाहता मेरी वजह से किसी मुस्लिम भाई के इस्लाम का उल्लंघन हो!लेकिन जवाब कौन देगा भाई?











जय हिंद जय श्रीराम,
कुंवर जी,

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

पंडित जसराज जी को एक अनोखा उपहार!

पंडित जसराज जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है!ऐसे कलाकार को कल हरियाणा सरकार ने एक अलग तरह का तोहफा दिया!विस्तृत खबर के लिए नीचे दिए गए लिन्क पर क्लिक करे!
yaha...

आज सुबह-सुबह ये पढ़ कर बहुत अच्छा लगा!किसी प्रतिभा का सम्मान करना हमारी पुरानी परम्परा रही है!लेकिन उनके पुश्तैनी घर,गाँव,नगर को हम अमूमन नजरअंदाज ही करते रहे है!एक अनजान सी,अनावश्यक सी परम्परा ये भी चली ही आ रही है!

ऐसा तो पहले भी बहुत हुआ है कि मुख्यमंत्रियों,सांसदों ने अपने गाँव के लिए बहुत से विकास कार्य करवाए या किये!लेकिन एक प्रतिभा का सम्मान उसके गाँव को देकर एक अच्छा उदाहरण दिया श्री हुड्डा जी ने!ऐसे कितने ही कलाकार और खिलाड़ी है जिनका गाँव आज भी गुमंनामी के अंधेरो में ही पड़ा हुआ है!

ऐसे सरकारी कदमो से कलाकारों में हौसला तो बढ़ता ही है साथ ही उनके घर-गाँव वालो में उन्हें सहयोग देने की भावना भी तो बढती है!ये एक जरुरी और प्रशंशनीय शुरुआत मै कहूं तो गलत ना होगा!


जय हिंद,जय श्री राम, 
कुंवर जी, 

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

हिन्दुओ की ये भावना के "कुत्ता भौंक कर अपने आप चुप हो जाएगा" काफी हद तक जिम्मेवार है कुत्ते की भों-भों सुनने के लिए!

आजकल जो ब्लोग्युद्ध सा छिड़ा हुआ है ब्लॉगजगत में हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों को लेकर अपने-आप में दुर्भाग्यपूर्ण है!और जो वास्तव है में वो तो अति-घृणित भी! लेकिन जब कोई हमारे बारे में कुछ गलत कह रहा है तो उसे उसका जवाब भी तो मिलना चाहिए!जो सक्षम है जवाब देने में वो तो जवाब जरुर देंगे,देना भी चाहिए!हिन्दुओ की ये भावना के "कुत्ता भौंक कर अपने आप चुप हो जाएगा" काफी हद तक जिम्मेवार है कुत्ते की भों-भों सुनने के लिए!



असल में ये पोस्ट लिखी गयी है एक नीचे दिए गिये लिंक पर लिखे गए एक लेख पर टिप्पणी करते हुए!विस्तार से जानने के लिए नीचे क्लिक करें!  

 http://samrastamunch.blogspot.com/2010/04/blog-post_3276.html  इस तरह के कुत्ते सिर्फ मुस्लिम ही नहीं बल्कि इसाई जगत में भी पाए जाते है!और तो और हिन्दू धर्म से जो उप-धर्म निकले है उनमे भी और जो अभी तक भी खुद को हिन्दू मान रहे है वो भी इन कुत्तानुमा वयवहार ही कर रहे है!




कुत्ते से एक बात याद आ गयी,कवी सुरेंदर शर्मा जी की!अपने शब्दों का प्रयोग कर रहा हूँ,जो गलती होगी वो मेरी ही होगी!

एक फौजी की शादी हो गयी जी,बन्दे के पास अपनी दोनाली बन्दुक!नयी-नयी दुल्हन घर में!फौजी साहब खाना खा रहे है जी,बन्दूक पास में रखी है!
एक कुत्ता वही बैठा था,जब उसे काफी देर तक टुकड़ा नहीं मिला तो बेचारा आदतन भौंकने लगा!जब काफी देर हो गयी तो फौजी बोला "कुत्ते चुप"!अब बिना टुकड़े वो कहाँ चुप होने वाला था!वो भौंकता रह जी!फौजी बोला "कुत्ते चुप,मेरी बन्दूक नहीं देखी क्या?"अब कुत्ता कोई पढ़ा-लिखा डॉक्टर तो था नहीं!वो बेचारा बन्दूक क्या देखता,वो तो रोटी देख रहा था!रोटी मिली नहीं तो वो भौंकता रहा!
अब हो गयी जी हद!फौजी साहब अपने वास्तविक रूप में आते हुए बोले कुत्ते मै तीन तक गिनूंगा,चुप हो गया तो ठीक नहीं तो फिर देख लेना!
कुत्ता अब भी नहीं समझ पाया बेचारा!कुत्ता जो था!उधर गिनती शुरू!कुत्ते चुप हो जा एक...कुत्ते चुप हो जा दो...कुत्ते चुप होजा तीन....!


कुता बेचारा सच में अनपढ़ था!गिनती का महत्त्व नहीं जानता था,भौंकता रहा गिनती के दौरान भी और बाद भी!
गिनती पूरी और बस एक फायर ही काफी था उस कुत्ते के लिए तो!सदा के लिए चुप!फौजी अपनी जीत पर अति प्रसन्न!अब आराम से खाना खाया उसने!लेकिन उसकी पत्नी थोड़ी जागरूक नारी थी!वो ये अत्याचार सहन ना कर पायी!उसने आवाज उठायी!


फौजी पतिधर्म के तहत सब सुनने लगा!वो कहे जा रही थी....."ये कोई मानवता है क्या?कुत्ता था भौंक ही तो रहा था,गोली मार दी!ऐसे ही इसी को गोली मार देते है क्या......"
अब फौजी अपने धैर्य को टूटा सा देख कर बोला के बहुत हो चुका अब चुप हो जा!


पर नारी थी,जागरूक थी,"मुझे तो पता ही नहीं था कि आप ऐसे भी हो,पता होता तो कभी शादी नहीं करती......"


अब फौजी से ना रहा गया!वो बोला "देख चुप होजा एक.....चुप होजा दो......
और फिर तीन गिनने कि जरुरत नहीं पड़ी!आज सब ठीक चल रहा है!उसके बाद उस घर में फिर कभी लड़ाई नहीं हुई!


मतलब यही कि,कभी-कभी शान्ति के लिए हमे भी कठोर रूप अख्तियार कर लेना चाहिए!कोई हमे गलत कह रहा है तो कोई कब तक सहे!वो गलत है ये कहने वाला कोई ना कोई तो होना ही चाहिए!और वो कोई मै क्यों नहीं,ये बात सभी हिन्दुओ को सोचनी चाहिए!जब सभी अपने-अपने स्तर पर विरोध दर्ज कर सकते है तो करना चाहिए!क्यों हम गलत को गलत नहीं कह पा रहे है?


सोचो!
जय हिंद,जय श्री राम.....
 कुंवर जी,


बुधवार, 31 मार्च 2010

करनाल कोर्ट का एक एतिहासिक फैसला (एक विचार....)(वयंग्य),

कल करनाल कोर्ट में एक एतिहासिक फैसला सुनाया गया!खबर के लिए लिंक दे दिया गया है!पाँच अभियुक्तों को फांसी कि सजा एक साथ सुनाया जाना अपने आप में एक मिसाल है!कहाँ तो भारत में फांसी कि सजा को ही ख़त्म करने पर विचार चल रहा है और कहा  एक साथ पाँच-पाँच को फांसी कि सजा! चूँकि निर्णय माननीय कोर्ट से आया है तो उस पर कोई टिप्पणी करने का मेरा कोई इरादा नहीं है फिलहाल!

ये जाहिर सी बात है कि खाप पंचायतो के बढ़ते दबाव को कम करने के लिए ये निर्णय शुरुआत मानी जायेगी भविष्य में!

और हाँ! यहाँ ये भी काबिल-ए-तारीफ़ और गौर की बात है कि ये निर्णय एक महिला जज ने सुनाया है!वर्तमान सरकार में महिलाओं का योगदान उल्लेखनीय है!उल्लेख करने के कारण सभी अलग-अलग बता सकते है,पर उल्लेखनीय जरुर है!
अब सवाल ये उठता है कि जो सजा माननीय कोर्ट ने सुना दी है उस पर अमल कब तक हो पायेगा,हो पायेगा या नहीं भी हो पाए?
अनायास ही "सम्माननीय अजमल जी"(भई अतिथि है हमारे) का चेहरा उभर आया स्मृतिपटल पर!वो तो अपने कसाब जी भोले-भाले,नाहक ही कानूनी पचड़ो में फस गए बेचारे,थोडा ठन्डे दिमाग से काम लेते तो कब के राष्ट्रीय अतिथि सार्वजनिक रूप से घोषित हो चुके होते!
मै समझता हूँ कि उन पाँचो को तो सजा मिल जानी चाहिए,मिल भी जायेगी शायद!क्योंकि उनके पास अजमल और कसाब जैसी किस्मत नहीं है!मानवाधिकार वाले तो वैसे ही हिन्दुओ के खिलाफ हुए फैसले में मौन रहते है!उन्हें बस कुछ ख़ास वर्ग ही पीड़ित दिखाई देता है(चाहे वो हो या ना हो)!


उन पाँचो के पास तो अपने पड़ोसियों का समर्थन और सहयोग  नहीं होगा,पडोसी देश कि बात बहुत दूर है!कोई नेता टाइप के लोग भी क्यों उनके पचड़े में पड़े! यार,कोई राजनैतिक लाभ भी तो नहीं दीखता!ना कोई वोट बैंक उन पर आधारित है,ना ही कोई किसी वर्ग के मुखिया है वो!जानता ही कौन है उनको?बस इतना ही कि घर कि लड़ाई में हत्या हो गयी इनसे और फांसी कि सजा मिली है,ओह सॉरी! बुली है!जब मिलेगी तब भी थोडा हिट हो जायेंगे,तभी बोलना ज्यादा हितकर होगा!तो उनको तो सजा मिल ही जायेगी,मिल जानी भी चाहिए!और फिर है भी लड़की वाले वो तो!सब उन्ही को तो सहना पड़ता है सदा!



मै बस ये कहना चाह रहा हूँ कि जब उनको दोषी करार दिया जा चुका है और सजा घोषित हो चुकी है तो सजा मिलनी भी चाहिए!सजा तो हर उस अपराधी को मिल जानी चहिये जो सजा पाकर भी निश्चिन्त ही मजे से जी रहा है!मस्त खा-पी रहा है!कारण चाहे जो भी हो,वो तो एक तरह से न्यायालय के निर्णय  की खिल्ली सी उड़ा रहा है,लो दे लो सजा,मै तो अब भी खुश हूँ और मजे में हूँ!

वास्तविक खबर के लिए नीचे क्लिक करें,विस्तार से पढने को मिलेगा!
http://www.khaskhabar.com/murder-of-love-couple5people-hang-till-death-03201031796046291.html





अन्त में इतना ही कि खाप पंचायतो को स्वयं को देश के क़ानून से ऊपर समझने कि भूल छोडनी चाहिए!वो तो प्रशाशन को भी सुनिश्चित करना चाहिए कि इस समस्या का सर्वसम्मति से कोई शान्तिपूर्ण हल निकाले!बहरहाल करनाल  में एक एतेहासिक शुरुआत हुई है,आशा करते है कि भविष्य में इस फैसले को समय समय पर याद  किये जाता रहेगा!

जय हिंद,जय श्री राम!
कुंवर जी,

मंगलवार, 23 मार्च 2010

जरुरी तो कुछ भी नहीं.......(कविता), (वयंग्य),

माना शिवाजी,महाराणा,भगत सिंह ये पुराने जमाने की बात है,
पर देख ज़रा उन के आगे तेरी क्या औकात है!


जरुरी नहीं के
 सारे के सारे
"रंग दे बसंती"
वाला सीन पैदा करें!
ये भी जरुरी नहीं
के सारे के सारे
"अ वेडनसडे" जैसा
भी कुछ करें!
जरुरी तो कुछ भी नहीं,
जो हम करते है!
डरे-सहमे से जिए
ये भी जरुरी नहीं!
नहीं जरुरी
मरना ऐसे
जैसे
गुमनाम से हम मरते है!


चलो मै तो भावुक हो गया आज,
तुम तो संभालो
अपने आप को ही सही,
आज तुम खुद को संभालोगे तो
कल देश भी संभल जाएगा,
तब लगेगा के शायद
अब किसी भी शहीद का बलिदान
व्यर्थ नहीं जाएगा!

जरुरी  नहीं के सारे के सारे
इसे पढ़ कर भूल जाए,
जरुरी नहीं के सारे के सारे
कुछ "रंग दे बसंती"
या
"अ वेडनसडे"
जैसा कुछ कर पायें!
क्योंकि हम मजबूर जो है!
जिम्मेवार है,
भले ही जिम्मेवारी समझे ना समझे!

जरुरी नहीं के सारे के सारे
शर्मा जाएँ खुद से ही
जब वो तुलना करेंगे खुदकी उनसे
जिन्होंने अपना बलिदान दिया
ये सोच कर के
"एक भगत के मरने से हर भारतवासी भगत बन जाएगा!"

जरुरी तो कुछ भी नहीं.......


हर शहीद को कोटि-कोटि नमन ..... 
कुंवर जी,





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