बुधवार, 28 दिसंबर 2011

कमाल है ब्लोग्गेरो के मेल-जोल होने पर भी कसी को किसी तरह का द्वेष हो सकता है....?(कुँवर जी)

सर्वप्रथम तो आप सभी को हाथ जोड़ कर राम राम!
तत्पश्चात सूर्य-गति आधारित वर्ष-परिवर्तन पर शुभकामनाये!
बहुत दिनों बाद आज ब्लॉग पर आना हुआ!आते ही जो ब्लॉग पढ़ा वो थोडा अजीब सा लगा!मानव वृत्ति है की वो अपनी जान-पहचान का दायरा बढाए!उस में जो अच्छाईयाँ  है या जो कुछ भी उसे अच्छा पता है उसे दूसरो तक पहुंचाए!बिना मिले ही जिनसे अनोखी प्रीत सी हो गयी है उनसे प्रत्यक्ष मिले!

और यदि इस से किसी का किसी भी प्रकार से कोई नुक्सान नहीं है तो संभवतः ये ऐसा होना वाकई बहुत अच्छा है!इस में तो किसी को किसी भी प्रकार का बुरा नहीं देखना चाहिए!मुझे तो ऐसा ही लगता है!और कम से कम ऐसे मिलन में शरीक़ हुए बिना उस पर "समय के गवाने" जैसा गंभीर आरोप  लगाना तो कदापि उचित नहीं होगा!हमें अपनी सोच का दायरा अवश्य ही बढ़ाना चाहिए!ऐसी छोटी ब़ातो को तो हमें कही भी जगह नहीं देनी चाहिए!


एक बार फिर सभी को शुभकामनाये.... अन्ना जी को भी....... और कांग्रेस सरकार को भी.......!




जय हिन्द, जय श्रीराम!
कुँवर जी,

रविवार, 25 सितंबर 2011

माँ जो होती एक बहन मेरी भी..... (कुँवर जी)

राखी के दिन
अपनी सूनी कलाई देख
लड़का आँखों में अपना सब दर्द समेट
 रो ही तो पड़ा था....

माँ जो होती एक बहन मेरी भी..... 

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

बुधवार, 31 अगस्त 2011

हम इण्डिया लूट चुके सनम.....

आज एक इ-मेल आई,बड़ी सार्थक सी मेल जान पड़ी तो सोचा क्यों आप सब को भी इस नयी फिल्म के बारे में बता ही दूं!समय के अभाव में इसे ज्यो का त्यों ही प्रस्तुत कर रहा हूँ,मतलब अंग्रेजी में ही..........


WHAT THE BRITISHERS DIDN’T SUCCEED IN DOING, WE ARE EXCELLING IN!!






Sir Winston Churchill wrote 64 years ago about India : "Power will go to the hands of rascals, rogues, freebooters; all Indian leaders will be of low caliber & men of straw. They will have sweet tongues & silly hearts. They will fight amongst themselves for power & India will be lost in political squabbles. A day would come when even air & water would be taxed in India ." We are indeed an incredible NATION; we have worked very hard and we have indeed proved him right.....

India against Corruption!


Releasing Shortly Multi Billion $ Small Budget Film






"LOOT LE INDIA "






Producer : Ambani Bros,

Director : Sonia & Sharad


Hero : Manmohan Singh.


Villian : Baba Ramdev & Anna Hazare


Supporting cast : Ashok Chavan, A Raja , D Maran , Kanimohzi & Kalmadi

Comedy : Lalu Prasad Yadav, Rahul Gandhi, Digvijay Singh


Guest Appearance : S Balwa


Script : Karunanidhi


Choreography : Supreme Court & Subramanian Swamy


Action : Delhi Police,


Stunts & Inaction ; CBI, ED


Music : Neera Radia


Noise ; J Natarajan, M Tiwari, A Singhvi


Media Partners : Sun TV, Kalaignar TV

Banking Partners : Hasan Ali, S Balwa


Shot at locales in Switzerland, Cayman Islands , Tihar,






Tickets printed by TELGI


No e tickets please Please Keep forwarding.... Till this reaches all Indians.

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

जो बोलोगे तो इस राज में महज मवाद हो तुम...(कुँवर जी)



स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई देने के लिए ही आया था मै आज...पर हालात ऐसे है कि चाह कर भी न दे पाया!जो भी घटनाक्रम देश में दोहराया जा रहा है वो कतई बधाई के लिए उपयुक्त नहीं  है ऐसा भी नहीं है!

आज बधाई इस बात की कि कुछ लोग तो खुद को इस अंग्रेजो से भी बद्तर राज में गुलाम  कहलाना पसंद नहीं कर रहे है और अपनी बात रखने के लिए सरकारी अत्याचार सहने के लिए भी तैयार  हो चुके है!उन सभी को शुभकामनाये......




आज भूखे है वो जिनके पेट भरे है.....



ठूंठो को समझा हमने के पेड़ हरे है.....
 
डोली को लूटने को उसके ही कहार फिरे है...
 
भौर के सूरज के ऊपर निशा के ही डेरे है...
 
 
 
जियो जिंदगी मर-मर के क्योकि आज़ाद हो तुम...
 
जो बोलोगे तो इस राज में महज मवाद हो तुम...
 
मजबूरी और लाचारी का अनकहा संवाद हो तुम...
 
सहमत हो तो सही, नहीं तो विवाद हो तुम...
 
 
आज अपराधी है आदर्शो की राह पर चलने वाला...
 
आदमी है वो जो है हालातो के संग ढलने  वाला...
 
भ्रष्टाचार के इस दौर में घपलों पर ही पलने वाला...
 
जिसने भी विश्वाश किया उसको ही छलने वाला...
 
 
जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

तो आत्मा पे अब कैसा ये बोझ...!(कुँवर जी)

मै हूँ भी या नहीं
इसी असमंजस में
टूट जाता है
भौर वेला में चलता
कोई सुखद सा  सपना
रोज!

परिवार सहारे मेरे..
हुह,
और मै भला किसके..?
जो भी हो 
जिम्मेवारी तो मेरी ही है,,,
और फिर
सब कुछ भ्रम है,
ऐसा कोई कहे..
तो आत्मा पे अब कैसा ये
बोझ!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी, 

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

ये शाम...

दिन की सारी  
उमंगो-तरंगो को समेट  
रोज
ये शाम 
ढल जाती है
सारी चमक
उम्मीदों वाली
शाम की लालिमा में
पिघल जाती है...

ये शाम 
ढल जाती है 
फिर भी ढलती नहीं
जाने क्यों
रात बन फिर
सुबह में बदल जाती है....

हारता तो नहीं हूँ
पर हार
हो ही जाती है.
उठा कदम
धरते ही
धरती सी फिसल जाती है...


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

बुधवार, 8 जून 2011

अब शायद भारत जाग जाए.....!(कुँवर जी)

अब शायद भारत जाग जाए!

जब चाहते है सब ऐसा,
हो भारत वही पहले जैसा,
वो फिर विश्वविजय के राग गाये!
तो अब शायद भारत जाग जाये!

मै,तुम,वो;हम सब क्यों न एक हो?
सर्वहित क्यों न चाहे,क्यों इरादे न हमारे नेक हो,
भला क्यों न ये दुर्भाग्य भाग जाए!
फिर तो शायद भारत जाग जाये!

बलिवेदी पर असंख्य बेटे बलिदान हुए,
कितनी मांगे उजड़ी कितने आँचल लहुलुहान हुए,
धुल अब अतीत के सारे  दाग जाए!
शायद अब भारत जाग जाये!

बस लिखो ही नहीं झकजोर दो सबको,
 राह प्रेम की कोई और दो सबको,
अब तो कुचला नफरत का ये नाग जाये!
अब शायद भारत जाग जाये!

रोना ही किस्मत नहीं तुम्हारी कब तुम जनोंगे,
आँखे खोलो नहीं तो मर कर भी क्या जागोंगे!
जो ये आंसू तुम्हारे जन-जन में बन आग जाये,
तो शायद भारत जाग जाये!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

बुधवार, 1 जून 2011

वाह रे मोबाइल तेरी महिमा!...(कुँवर जी)


मोबाइल!

इसे तो आप जानते ही होंगे!आज के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण जरुरत यही तो है!कुछ दिनों पहले जब मोबाइल इतना प्रचलित नहीं हुआ था,तब मैंने कही पढ़ा था की "जैसे पहले गाँव में कोई रिश्तेदार या मेहमान आता था तो सबसे पहले वो घर की राजी-ख़ुशी के बारे में पूछता,फिर घर में दूध-घूँट के बारे पूछता!फिर खेत-खलिहान के बारे में!उसके बाद इधर-उधर कि बातों पर चर्चा होती!पर आने वाले समय में वहाँ भी ये बाते पुरानी हो जायेगी!घर में घुसते ही राजी-ख़ुशी के बाद पूछा जाएगा कि "पतली पिन का चार्जर है?"  

आज एक जगह फिर मोबाइल की महिमा को दर्शाने वाला मार्मिक वृत्तांत पढ़ा, आज वो ही आपके समक्ष है!

एक भिखारी किसी घर में खाना मांगने के लिए गया!
वहा उपस्थितजन ने उसे बोला कि खाना अभी बना नहीं है!

इस पर भिखारी बोला..."कोई बात नहीं;मेरा मोबाइल नम्बर ले लो,जब बन जाए मिस कॉल दे देना......" 
वाह रे मोबाइल तेरी महिमा!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

सोमवार, 30 मई 2011

पेड़ों की नब्ज थाम, उनकी सांसों को लेते हैं सहेज,ये चमत्कार ही तो है!...(कुँवर जी)

हमारे जीवन में पेड़ो का एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है!इनकी अनुपस्थिति में हमारे जीवन की कल्पना करना भी बेहद दुखद है!अपनी कितनी ही जरूरते हम इनसे पूरी करते है!
और कितनी ही यादें हमारी जुडी होती है हमारे आस-पास के पेड़ो से!

लेकिन हमारी अन्य जरूरते इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण हमें अब लगने लगी है कि हम उन्हें पूरा करने के लिए कोई भी पेड़,कितना भी पुराना पेड़ कुछ क्षणों में उखाड़ फेंकते है!सब यादें उस पेड़ की,हमारी उस पेड़ से जुडी सब बाते सब फिजूल हो जाती है!
हम ये भी भूल जाते है की ये पेड़ कितना प्राचीन है?


कुछ भी तो हम याद नहीं रख पाते,या रखना नहीं चाहते,जो भी! कई बार ऐसा भी होता है जिसको उस पेड़ को उखाड़ने की जिम्मेवारी मिली होती है उसे उस पेड़ से कोई लेना-देना नहीं होता,कोई भावनात्मक लगाव उसका पेड़ से नहीं होता!उसे तो बस अपना काम करने के पैसे लेने होते है!सो वह तो केवल अपना काम भर करता है,लेकिन असल में एक बहुत पुराना और महत्वपूर्ण पेड़ हम खो चुके होते है!




















अभी पिछले दिनों हमारी कम्पनी परिसर में भी ऐसी ही एक दुर्घटना घटी!एक बहुत प्राचीन और विशाल पीपल का पेड़ कटवा दिया गया!हालांकि हिन्दू धर्म की मान्यताओ के हिसाब से यथासंभव उसकी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना और ब्रहमहत्या से लगने वाले पाप से बचने के लिए क्षमायाचना  भी की गयी!पर ये सब उस पेड़ बचा नहीं सकी!

जब वो पेड़ काटा जा रहा था तो एक अजीब सा सूनापन  मस्तिष्क में फ़ैल रहा होता था!मन बचपन के उन दिनों में चला जाता था जब हम कोई छोटा पौधा उखाड़ कर लाते थे कहीं से,उसकी जड़े मिटटी में लपेट सपेट कर,अपने आँगन या खेत में लगाने के लिए!और लगा देते थे,कुछ पौधे आज पेड़ बन चुके है,कुछ तभी सूख भी गए थे!वो बाते ही याद आ रही थी!सोचते की काश इतने बड़े और पुराने पेड़ को भी हम उखाड़ कर दूसरी जगह लगा पाते तो शायद ये पेड़ बच जाता!
पिछले दिनों अखबार में एक खबर पढ़ी तो ख़ुशी का ठिकाना न रहा!अरे नहीं..!वो कम्पनी वाला पेड़ दुबारा नहीं उग आया था,वो खबर थी पेड़ को एक जगह से दूसरी जगह लगाने वाली खबर!

जिसे मै असंभव सा सोच रहा था एक हरियाली नामक संस्था उसे पूरी श्रद्धा और समर्पण कर रही है!उनकी ये मुहीम मुझे तो बहुत ही अधिक सरहानीय और एक तरह से मानव जाती पर परमात्मा का आशीर्वाद सा लगी!

ये है उस संस्था का इन्टरनेट पर लिंक !
यहाँ आप इस संस्था के बारे में विस्तार से जान पायेंगे!


मानवता  के हित किया जाने वाला ये अद्भुत प्रयास चमत्कार ही तो है!क्या ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहन नहीं मिलने चाहिए! समय और जानकारी के अभाव में मैंने ये एक तुच्छ सा प्रयास किया है यदि उचित लगे तो आप भी यथा संभव प्रयास करे!हो सकता है आपका ये प्रयास किसी की कोई सुनहरी स्मृति,किसी की आस्था,और पृथ्वी और मानवता के लिए एक पेड़ सहेजने का कारण बन जाए.....

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शनिवार, 14 मई 2011

ये वर्दी वाला कुछ खाता नहीं क्या...?

मैंने देखा
पतली सी कमर,
कमजोर से कंधे,
वाला एक आदमी
और वो भी वर्दी वाला....










अरे  ये कुछ खाता नहीं क्या...?


जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी, 

शुक्रवार, 6 मई 2011

आतंकवादी देश पाकिस्तान है या भारत....????


अभी कुछ देर पहले ही मोबाइल में एक लघु सन्देश पाप्त हुआ!उसे पढ़ कर एक बार तो दिमाग सोचने पर मजबूर हुआ!फिर मैंने महसूस किया की मै  मष्तिष्क को उस विचार से सहमती से नहीं रोक पा रहा हूँ!जब मै ये सहन नहीं कर पाया तो सोचा आप सब की राय ली जाए!

उस सन्देश का तात्पर्य यही था कि आतंकवादी देश पाकिस्तान नहीं बल्कि   भारत है!

आप सहमत इस विचार से...???
मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय इस से सहमत होगा!पर जो सन्देश था वो ये है....

"पाकिस्तान में कोई भी सुरक्षित नहीं है,यहाँ तक कि ओसामा बिन लादेन तक भी नहीं!
जबकि भारत में हर कोई सुरक्षित है,अजमल कसाब,अफज़ल गुरु...सभी!

अब आप क्या सोच रहे है..??
हो सके तो सूचित जरूर करना....

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी, 

गुरुवार, 5 मई 2011

मजबूर होते है वो भी और हम भी....(कुँवर जी)

कुछ पत्ते दूर पड़े,
ज्यादा नहीं थोड़ी सी दूर पड़े
अपने पेड़ से
कराह रहे थे....
मैंने
जो उठाया उनको
प्यार से
वो तो
मुस्कुराने लगे!


सूख चुके थे
जाने कब टूटे होंगे
शाख से,
मैंने
कब उनको उठाया था
शाख से जोड़ने के लिए,
वो;
फिर भी गुनगुनाने लगे!


मजबूर तो होते है वो
भी और हम भी
ये सच है,
तभी तो
उस
पेड़ की आँखों में भी
आंसू आने लगे!


जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

क्या तुम भी उन्हें कुछ कह नहीं पाते हो?

मुझे पता है
परिवर्तन संसार का नियम है,
फिर क्यूँ
न मै बदल सका न तुम बदले,
न हम बदले न हमारे नज़रिए बदले,
आज भी
जाती है तुझ तक मेरी नज़र
कुछ सवाल लेकर,
आज भी
कुछ भी बताती नहीं उनको तुम्हारी नज़र,
आज भी
बिना जवाब के लौटी मेरी नज़र
पूछती है मुझसे
जब
पता था ही तुम्हे
कि कुछ बताया नहीं जाएगा
तो भेजा ही क्यों था हमें वहा?

आज भी
मै कुछ कह नहीं पाता हूँ इनको !
क्या
तुम्हारी नज़र भी पूछती है तुमसे
कि क्यों हमें कुछ बताने नहीं दिया तुमने?
और
क्या तुम भी उन्हें कुछ कह नहीं पाते हो?

जय हिंद,जय श्रीराम
कुँवर जी,
 

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

ये जो दुनिया है ये तो दुनिया है!....(कुँवर जी)


ये जो दुनिया है
ये तो दुनिया है!

कभी उलट दिशा में चल कर भी साथ होती है,
कभी हम पर हंसती कभी गम में हमारे रोती है,
कभी जागते है हम और ये आराम से सोती है,
कभी हमारी एक शिकन पे चैन अपना खोती है!
ये जो दुनिया है

ये तो दुनिया है!


कभी अपनों में पराये नजर आते है,
कभी परायो में हमसायें उतर आते है,
 बारिशों में कई चेहरे और निखर जाते है,
कुछ के कई और रंग उभर आते है!
ये जो दुनिया है


ये तो दुनिया है!


माना ये जो दुनिया है ये तो दुनिया है,
मगर देखो तो आखिर हम क्या है,
सोचते है ये जानकर भी आखिर मिलना क्या है,
न ये बदलेगी कभी और अपना.....

...अरे!अपना तो ख़ैर क्या है....!

ये जो दुनिया है

ये तो दुनिया है!




जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

एक क्षणिका

हर कोई

अनजान सा

यहाँ जीये जाता है,

न जाने

कौन सा पल

ठहर जाए पलकों पर!



जय हिंद,जय श्रीराम
कुंवर जी,

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

शादी से पहले बातचीत .......?

राम राम जी,एक बार फिर ब्लॉगजगत से दूरी बनी हुयी है!कुछ नया भी लिखा नहीं जा रहा है!आज फिर एक शुरूआती पोस्ट आपके लिए.....

यह विषय आज के समय को देखते हुए बड़ा जरुरी-सा विषय बनता जा रहा है!हालांकि इसकी आवशयकता है भी या नहीं ये परिस्थितियों पर बहुत निर्भर करता है,मेरे हिसाब से तो!इसका एक कारण बताया जाता है कि लड़की ओर लड़के की आपस में जानकारी बढ़ेगी और वो एक दुसरे को और अच्छी तरह जान पायेंगे!जिस से कि उनका आने वाला समय बेहतर होगा!


किन्तु कई बार इसका उल्टा हुआ है!उनकी आपस में एक दुसरे के बारे में जानकारी तो बढ़ जाती है,लेकिन एक रिश्ता जो बनने जा रहा था वो बन नहीं पाता!यहाँ तक कि शादी होने के बाद भी!क्योंकि वो जान जाते है एक दुसरे के बारे में,पहले ही!रोमांच सारा ख़त्म!
पहले क्या होता था,या गाँव-देहात में क्या होता है,लड़का-लड़की एक दुसरे से बात करना तो दूर,जानते भी नहीं,और शादी हो गयी जी!आधुनिक जगत को ये बात बहुत अखरती है!ऐसा कैसे हो गया,कैसे हो सकता है?पता नहीं वो एक दुसरे को समझ पायेंगे या नहीं?वो नहीं समझ पायेंगे तो सुखी कैसे रहेंगे?वगराह-वगराह!

वो ज्यादातर सुखी रहते है!

असल में सुखी रहने का रहस्य दुसरे को समझने में कम और खुद को समझने में अधिक छिपा है!ऐसा नहीं है के वो एक दुसरे को नहीं समझते,समझते है!लेकिन जब तक वो एक दुसरे को समझते है तब एक बहुत बड़ा कालखण्ड जीवन का बीत चुका होता है,जानने के रोमांच में!और जो आनंद मनुष्य दुसरे की जिन्दगी ने झाँक कर लेता है उसका शायद कोई विकल्प नहीं!वो आनंद ले रहे होते है 'किसी अपने' की जिंदगी में झाँकने का!जबकि यही काम यदि शादी से पहले किया जाए तो हम केवल 'किसी' लड़के या लड़की की जिंदगी में झाँक रहे होते है जो अभी तक हमारा कुछ नहीं है!भविष्य में हो सकता है,अभी कुछ नहीं है!सो एक एह्न्कार-सा मन में आ जाता है कि हम निष्पक्ष होकर किसी की जिंदगी में देखेंगे जो की हम कभी हो ही नहीं सकते!एह्न्कार में निर्णय ठीक ही हो इसकी सुनिश्चितता नहीं होती!

दूसरी और जब हम 'किसी अपने' की जिंदगी में झांकेंगे तो हमारे पास निष्पक्ष होने या रहने की मजबूरी नहीं होती!हम स्वाभाविक ही अपने का पक्ष ले सकते है!उसमे केवल अच्छा ही देखने की कोशिश करेंगे!कुछ बुरा यदि दिखाई दे भी जाए तो सोच लेते है की पहले रहा होगा,अब हम नहीं होने देंगे ऐसा!कमियाँ अब भी देखेंगे साथ ही उन्हें ख़त्म करने के उपाय भी!

जबकि शादी से पहले केवल कमियाँ ही दिख पाती है,उपाय तक जाने की कोशिश ही नहीं की जाती!करे भी क्यों?किसके लिए?"ये नहीं तो और सही" वाली खिड़की होती है अभी हमारे पास!वो भी खुली हुई!कोई चिंता ही नहीं!

हालांकि इसका कभी-कभी लाभ भी होता है दोनों को! पर मैंने अब तक ऐसा कम ही देखा है!वैसे जो अनुभव हमारा है वो केवल हमारा ही है!जरूरी नहीं जिन परिस्थितियों में 'क' जो करेगा वही उन्ही परिस्थितियों 'ख' के लिए भी सही रहेगा!


जय हिंद,जयश्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

उम्मीदों के रंग में रंगने की बारी आज है....

मलाल के गुलाल से ही
होली खेलते आये थे अब तक हम,
उम्मीदों के रंग में
रंगने की बारी आज है!
धैर्य के राग पर
मन अपना साज़ है,
आँखों के सुर पे
मौन ही आवाज़ है,
क्योकि बोलने वालों को तो
यहाँ तौलने का रिवाज़ है,
और कोई तौले हमें
इस से दिल नासाज़ है!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

मंगलवार, 1 मार्च 2011

अपनों के बीच में आज अर्जुन नहीं दुर्योधन है....(कुंवर जी)




कल जब 
अमित जी की ओजपूर्ण कविता  को पढ़ा तो काफी दिनों के बाद कुछ पंक्तियाँ एक दम दिल से निकल कर आई....




अपनों के बीच में आज अर्जुन नहीं दुर्योधन है,
गीता गायी जाए तो किसके आगे ये भी उलझन है!

जो दिख रहा है उसे देख देख कर
छोटे से मन में बड़ी-बड़ी उधेड़बुन है!

बेशर्मी और बदनामी गौरव का कारण बन रही,
सच्चाई,ईमानदारी,देशभक्ति इनसे कहाँ अब जीवन है!

ठीक गलत के मायने सब बदल गए आज,
खिज़ा को ही बहार मान रहा खुद चमन है!

साधन और सुविधाओं को जुटाने को ही संघर्ष है,
साख और सोच में जैसे हो गयी कोई अनबन है!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,


गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

आँखे अब और भी चमक रही थी...(कुंवर जी)

साँस भला कब तक रोकता समय,
सुबह तो होनी ही थी,
पर ये क्या?
दिन तो निकला पर सूरज नहीं!
सब कुछ धुंधला-धुंधला
उस सर्द सुबह में,
तारे बेचारे
थक हार कर या
सुबह की लाज बचाने की खातिर
चले गए थे!
पक्षियों का आलस ज्यों का रयों था,
या तो वो घबराए हुए गुमसुम थे!
कालिया जो ख्वाब देख रही थी
खिलने के,
खुद पर तितलियों के मंडराने के,
जगी जरुर,पर मुस्कुराई नहीं,
तितलियाँ भी कहा आई थी,
क्योकि...
दिन तो निकला पर सूरज नहीं!

पत्ते उदास हो चले थे,
हौसले तोड़ दिए थे टहनियों ने भी,
और कालिया तो रो ही पड़ी
जब देखा उनके चारो और तितलियों के पंख
पड़े है बिखरे हुए!
उस पर न धुप का सहारा मिला,
तो यूँ तदपि कालिया
जैसे किसी ने सांस आने के सभी दर मूँद दिए हो...

तितलियों के बिखरे पंखो के बीच
लाचार कलियों को दम तोड़ते देख
झटके से; एक सांस खींच,
मुट्ठिया भींच आँखे खुली...
तो देखा

तितलियाँ तो उड़ रही थी,
क्योकि कालिया फूल बन खिलखिला रही थी!
पंछी भी खुले आसमान में
पर फैला चहचहा रहे थे,
क्योकि सूरज तो चमक रहा था क्षितिज पर,
और तारे कहीं भी न थे,
न उनकी जरुरत भी थी!

और बूँद ओस की,
आँख की पुतली से चल
समां गयी आँख की कौर में,
जो अब भी
पलके झपकाने से भी दर रही थी
कही फिर कोई सपना न दिख जाए,
पर
आँखे अब और भी चमक रही थी!



जय हिन्द,जय श्रीराम
कुँवर  जी,

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

जिन्दगी दौड़ रही है,तेज बहुत तेज...

जिन्दगी दौड़ रही है,तेज बहुत तेज...
हमको वही दूर कहीं छोड़...तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये!


भाव सारे है यहाँ,कुछ कम कुछ ज्यादा....
बस कुछ को कुछ के ऊपर ओढ़...तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये....


सपने दिखाती है,आँखे खुल भी जाती है कभी,
कभी सपनो को कभी हमें तोड़...तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये....


मै साथ तो हूँ इसके,यही सोचता हूँ अधिकतर मै,
पर उसी पल मुझे झिंझोड़... तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये...

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

हम हिन्दू है या मुसलमान है,यदि इंसान है तो क्या हम ऐसा करते है...?(कुंवर जी)

आजकल विवाहों के उत्सव का माहौल है हर तरफ!ना चाहते हुए भी जाना पड़ रहा है बहुत सी जगह तो!किन्तु इस बार हर जाने पर एक विचार जो मन में कुलबुलाने लगता है,या यूँ कहे कि कुलबुलाता रहता है!
मै सोच रहा हूँ कि जब भी हम किसी के ऐसे उत्सव(बड़े या छोटे) में शामिल होते है,तो क्या हम हर बार उस उत्सव के सफल होने कि कामना करते है?

कई बार हमें किसी के मरणोपरांत उनके परिवार से मिलने जाते है,तो क्या हम दिल से एक बार भी स्वर्गीय आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना करते है?

किसी विवाहोत्सव में शामिल को होने पर क्या हम उस विवाह समारोह के शांतिपूर्ण सफल होने ओर उन दोनों का जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होने की प्रार्थना करते है!

किसी रोगी या दुखी से मिलते है या सोचते है तो क्या उसके रोग और कष्टों के निवारण की प्रार्थना हम परमात्मा से करते है?

किसी दरिद्र को देखने पर या उसे कुछ देते समय उसकी दरिद्रता समाप्त करने की प्रार्थना हम परमात्मा से करते है?

क्या हम दिल से किसी परिचित अथवा अपरिचित के दुःख या सुख में भागीदार बनते है...???
आज बस यही......

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 10 जनवरी 2011

साँसों पर जोर नहीं था सो चल रही थी.....

सर्द रात और गहराती जा रही थी,
पलके थी कि झपकना भी भूल गयी!
साँसों पर जोर नहीं था सो चल रही थी.....

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शनिवार, 8 जनवरी 2011

ईंट,पत्थर,कंकड़ और तिनको से भी बच्चा खेलता है...

कौन कहता है कि हंसी में रोना नहीं होता,
जरा उनसे तो पूछो जिनके पास सूना सा कोई कोना नहीं होता!

ईंट,पत्थर,कंकड़ और तिनको से भी बच्चा खेलता  है,
जिस के पास खेलने को कोई खिलौना नहीं होता!

 घास मिली तो सही नहीं तो जमीन पर ही सो गया,
जिसके पास बिछाने को कोई बिछौना नहीं होता!

जिन्दगी को जी कर तो हम भी देखते कभी ना कभी,
जो जिन्दगी भर दुखो को यूँ ही ढोना ना होता!

मन की प्यास बुझाते आँख के पानी से ही हम,
जो किस्मत पे अपनी हमें कभी रोना ना होता!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शनिवार, 1 जनवरी 2011

जब सुख तक चला गया तो इस दुःख की तो क्या औकात है!

अरे!बस थोड़े से दिनों की तो ओर बात है,
 देखो साल बदला है.....
तो हाल क्यों नहीं बदलेगा!
जब सुख तक चला गया तो इस दुःख की तो क्या औकात है!
रोशनिया तक खो जाती है तो
परछाइयों की क्या बिसात है!
सच मे;आँखे खोलो,
वो निशा तो गुजर चुकी,
हो गयी नव प्रभात है!

आओ हम सब मिल कर इस सूर्य-गति-आधारित नव वर्ष का अभिनन्दन करे....
जो कुछ भी हम अपने लिए अच्छा सोच सकते है वो ही सबके लिए सोचे....
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

लिखिए अपनी भाषा में

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