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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

शब्द फूटे तो कहा धरूँ मै....(कुँवर जी)

 जो मुझे पसंद है
वो तो
होता नहीं..
जो हो रहा है
उसे ही पसन्द न करूँ तो
क्या करूँ मै!

झेल गया जब
मै
जो बीत चूका,
अब तो जो  भी बीते
भला उस से
क्या डरूँ मै !

गैरो से बच कर 
आया था 
अपनों की ओट में,
अब अपनों से
बचने के लिए
किसकी ओट करूँ  मै!


बहुत पीता हूँ
आंसुओ को
बिना शोर के,
ये शब्द
न माने मेरी,
फूटे तो
इन्हें कहाँ  धरूँ मै! 





जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर  जी,

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

कहा है साहस खुद को उघाड़ने का....(कुँवर जी)

सब विषयो,
शीर्षकों,
मुद्दों,शब्दों को
इक्कठा कर
जब
कुछ लिखने  की सोचता हूँ
तो एक-एक कर के
सब दूर जाते दिखते है....
बस
रह जाता हूँ
खड़ा मै अकेला
और
बात मुझ पर आकर
रुक ही जाती है....

और फिर क्या....

सब मौन....

कहा है साहस खुद को उघाड़ने का....????

कुँवर जी,

शुक्रवार, 25 जून 2010

हमारी ऐसी कौन सी मज़बूरी है जो आज़ादी सिर्फ विकारों को ही मानते जा रहे है!

आजकल
 अमित भाई साहब के लेखो पर गरमागरम बहस सी चली हुई है!उन्ही की एक पोस्ट पर टिप्पणी लिखने लगा तो ये लिखा गया...... उन्होंने कहा...
".....लेकिन  विकारों को आजादी का नाम देकर जिस तरह से अपनाये जाने की घिनोनी भेडचाल मची उससे सारा ढांचा ही भरभरा रहा है...." 


तो इस पर मेरे विचार कुछ यूँ थे....
इस बात से तो कोई भी असहमत नहीं होगा!असल बहस का मुद्दा भी यही होना चाहिए!क्यों हम विकारों को आज़ादी का नाम देने पर तुले हुए है!

श्रेष्ठ कौन है? इसका उत्तर हम किस से ले रहे है और किसे दे रहे है?भगवान् श्री ने अर्धनारीश्वर का रूप सम्भवतः इसी असमंजस के नाश के लिए ही धरा होगा,पर हम जब भगवान् के इशारों को भी अनदेखा कर रहे है तो भला किसी ओर के बताने से तो क्या समझेंगे!
हमारी ऐसी कौन सी मज़बूरी है जो आज़ादी सिर्फ विकारों को ही मानते जा रहे है!क्या सच में कोई पीड़ित वर्ग है जो आज़ाद हो ही जाना चाहिए,या फिर यह कोई मानसिक विकृता भर है!मुझे लगता है हमें ऐसे विकारों से आज़ादी की जरुरत है!

हम ब्लॉग लिख-पढ़ रहे है तो स्वभावतः ही बुद्धिजीवी तो होने ही चाहिए.....और बुद्धिजीवियों में असहमति हो जाए किसी बात पर तो इस से भी सकारात्मक परिणाम ही आने चाहिए!एक सार्थक,निष्पक्ष और निर्णायक बहस के रूप में!लेकिन इसका अर्थ ये नहीं की यदि आपने मेरी बात नहीं मानी तो मै आपके प्रति कटुता पाल लूँ,और एक निरर्थक बहस को जन्म दे दूँ!


हमें कम से कम अपने प्रति जिम्मेवार तो होना ही चाहिए!और मेरे हिसाब से जो अपनी जिम्मेवारी को इमानदारी से निभा रहा है वो ही श्रेष्ठ है अब चाहे वो पुरुष है या नारी,ये महत्त्व नहीं रखता!इसे भी मुझे ऐसा कहना चाहिए कि "अपनी जगह" वो श्रेष्ठ है!

फिर से मुद्दे पर आते है....

क्या हमारी वर्तमान शिक्षा हमें ये सोचने पर विवश कर रही कि जो परंपरा या संस्कृति हमारी पिछली पीढ़ी ने निभायी वो एक ग़ुलामी और दकियानूसी के सिवाय कुछ नहीं...?

क्या वो संस्कृति या परम्परा असल में ही वैसी ही है जैसा कि नयी पौध के कुछ पौधे उसे समझ रहे है?यदि नहीं तो क्यों उसने उन्हें अपने में नहीं ढाला?

क्या हम खुद इतने संस्कारित नहीं रहे है कि आने वाली पीढ़ी तक उन संस्कारों को पहुंचा सके?

जहाँ तक मै अपनी बात करूँ तो स्थिति ये है कि वैसे तो मै उन संस्कारों को,परम्पराओं को अपने मन में सहेजे हुए हों,और दैनिक जीवन में उनका सहारा भी लेता रहता हूँ!पर कई बार मन में आ जाता है कि थोडा सा इन के बिना भी आचरण हो जाए तो कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ेगा और एक-आध बार मै ऐसा कर भी डालता हूँ!तो क्या ये एक-आध बार करने कि प्रवृत्ति ही बड़ा कारण बन सकती है भविष्य में.....?

अब मै अपने माता-पिता और घर की बात करूँ तो वो एक पुरानी सोच वाला परिवार ही है!उन्हें मेरा अथवा मेरे अन्य भाइयो का शाम होते ही घर में होना पसंद है!हालांकि मै कई बार सोचता हूँ कि हमारी वजह से कोई भी,कैसा भी उल्हाना अब तक नहीं आया सो हमें थोड़ी बहुत छूट मिलनी चाहिए पर अन्त में उनकी बात ही ठीक लगती है...जब किसी पर अकारण ही बुराई आती दिखती है तो....!इस पर भी हमारी जितनी बहने है उनमे से जिसने भी पढने की इच्छा जताई है उन्होंने स्नातक तक पढ़ाई की ही है,उस से ऊपर भी पढ़ी है,तो यहाँ कोई बंधन भी दिखाई नहीं देता!

अब मैंने अपनी बात आपके समक्ष रखी...मै आशा करता हूँ कि आप भी एक बार अपना आंकलन इस हिसाब से जरूर करेंगे,यदि योग्य समझे तो उस आत्म-मंथन से हमें भी अवगत कराये....!
आप सभी शुभकामाए स्वीकार करे...

जय हिन्द.जय श्री राम,
कुंवर जी,

मंगलवार, 22 जून 2010

मेरा पिघलना अभी बाकी है....

ये कविता
यहाँ 
जब मैंने पढ़ी तो जो ख्याल मन में आये वो ये थे....

मेरा पिघलना अभी बाकी है,

तो भला क्या समझूंगा
यूँ नदी की तरह बहने की बाते,
भांप बन बन कर उड़ने की बाते,
बर्फ से बादल होने की बाते,


इस बारे में आपके के क्या ख्याल है...बताएँगे....

जय हिन्द,जय श्री राम.
कुंवर जी,

शुक्रवार, 4 जून 2010

जीवन कोई दलदल है क्या........?....(क्षणिका)




जितना सुलझाना चाहता हूँ
उतना ही छटपटाता हूँ,
जितना छटपटाता हूँ
उतना ही धंसता जाता हूँ,
जीवन कोई दलदल है क्या........?
समझ ही नहीं पाता हूँ...
.
.
.

जय हिन्द जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 24 मई 2010

मिट्टी मेरी.... न जाने कैसी है?-(कुंवर जी)

आज ही घर से वापिस आया हूँ!बहुत कुछ पढ़े बिना छूट गया होगा!
एक लम्बी यात्रा और वो भी बस में खड़े होकर..........थकान भी बहुत हो रही है!
कुछ भी नया जो लिखा गया उस से संतुष्टि सी नहीं मिली सो आज पुरानी कविता फिर आपके समक्ष........



किसी का भी दुःख मै नहीं बाँट सकता हूँ,
किसी की भी राहों से कांटे मै नहीं छाँट सकता हूँ,
पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!

जो मुझे जैसा समझता है मै वैसा ही हूँ मै,
जो खुद को जैसा भी समझता है वैसा भी हूँ मै,
पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!

ऐसे तो हाड़-मांस कि ही हूँ मै,
पर नहीं किसी के विश्वाश का हूँ मै,
पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!

गीली सी मिट्टी मानो,कुछ भी घड़ लो,
कोरा कागज़,जो मर्जी लिखो और पढ़ लो,
कुछ-कुछ ऐसी मिट्टी है मेरी!

हर-दीप जल कर बुझ जाता है,
अँधेरा पहले भी था,वही बाद में भी नजर आता है,
कुछ-कुछ ऐसी मिट्टी है मेरी!

पर शायद मिट्टी भी मेरी कहाँ है?
धुल सी,अभी यहाँ,अभी न जाने कहाँ है?
कुछ-कुछ ऐसी मिट्टी है मेरी!

मिट्टी मेरी....
न जाने कैसी है,
है! पर न होने जैसी है!
जय  हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 21 मई 2010

माँ के ख़यालात में....(कुंवर जी)

हँसता-गाता,
खेलता-खाता,रोता-नहाता,
रूठता-मनाता
भी मै शायद अधुरा ही होता हूँ!

आंसुओ के अहातो में
दुखो के अखाड़ो में,
मुश्किलों के पहाडो में
अपनों के मेलो में
परायो के झमेलों में,
भी शायद मै अधूरा ही होता हूँ!

माँ के ख़यालात में,
और जब कलम होती है हाथ में

तो ही मै पूरा होता हूँ!
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,







गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

चलो माहौल कुछ शायराना हो जाए,दिल के जख्म दिखाने का कुछ तो बहाना हो जाए!

चलो माहौल कुछ शायराना हो जाए,
दिल के जख्म दिखाने का कुछ तो बहाना हो जाए!

तुम अपनी बात कहना हम अपनी कहेंगे,
बीती बातो का फिर से दोहराना हो जाए!

झेला तो बहुत है जिंदगी को सभी ने,
आओ एक-दुसरे को समझाना हो जाए!

संजोया है जो मर-जी कर हमने,
देखने-दिखाने को वो ग़मो का खजाना हो जाए!

मै आह भरूँगा तुम वाह करना,
इस नादाँ को ऐसे ही समझाना हो जाए!


कोई बड़ा तीर मार नहीं पाए तो क्या,
उन छोटी-मोटी भूलो पर ही इतराना हो जाये!

हरदीप चल कुछ ऐसा लिख दे आज,
कल जिसे पढ़ जग ये सयाना हो जाए!


कुछ मुस्कुराने का बहाना हो जाए,
जो माहौल कुछ शायराना हो जाए!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

पता नहीं क्या चाहते है ये दुनियावाले मुझ से?(वयंग्यिका)

मेरा पिछली पोस्ट का अनुभव बड़ा ही ख़ास रहा!मुझे एहसास हुआ कि कितने  सज्जन मेरे हित में सोच रहे है!मै अकेला नहीं हूँ यहाँ!मुझे गिरता देख कितने ही सज्जन मुझे सम्हालने के लिए तत्पर दिखे!
आज के समय मे अपनी इस अनन्त  व्यस्तता में से भी आप सब ने मुझ तुच्छ के लिए समय निकाला,उस के लिए मै आप सबका धन्यवाद करना चाह रहा हूँ!आभार वयक्त करना चाह रहा हूँ,पर कैसे?
मै कोशिश करूँगा कि अपना सर्वश्रेष्ठ सदैव आपके समक्ष प्रस्तुत करूँ!
विचारो कि उधेड़बुन जो सदा ही मन में चलती रहती है वो कभी-कभी शब्दों का सहारा पाकर ना जाने क्या बन जाती है!ऐसी ही एक उधेड़-बुन सी आज आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ,इसे सुलझाने में आप मेरी मदद जरुर करेंगे,पता नहीं क्यूँ,मुझे ऐसा लग रहा है!





ना सोचे तो लापरवाह 
सोचने लगे तो चिंतित,
ना करे तो कामचोर
करने लगे तो पागल,
पता नहीं क्या चाहते है ये दुनियावाले
मुझ से,
डुबोना,
तैराना
या फिर
कि बैठा ही रहूँ मै
उस ओर ही नदी के.....?
विचारो की इस लहर को
 साहिल तक पहुंचाऊं
या
समा जाने दूं सागर में ही......?

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

मै ब्लॉग-जगत से माफ़ी मांगता हूँ,यदि मेरी वजह से ब्लॉग्गिंग का स्तर गिरा है तो!लेकिन कोई आगे तो आये सही क्या है बताने के लिए....

अभी कुछ देर पहले ही ये क्यों  और  किसके  लिए  कर  रहे  है  ब्लॉग्गिंग  ब्लॉग पढ़ा!वहा जो पोस्ट दिखाई गयी है उन पोस्टो में से एक मेरी पोस्ट है!बाकी के बारे मै कुछ नहीं कह सकता!परन्तु यदि मेरी वजह से ब्लॉग्गिंग का स्तर किसी भी तरह से गिरा है तो मै सम्पूर्ण ब्लॉगजगत से माफ़ी मांगता हूँ!एक अपील भी है!आप मेरे ब्लॉग पर आये,मेरी और पोस्ट भी पढ़े,यदि फिर भी आप लोगो को लगता है कि मै गलत राह पर चल रहा हूँ,तो कोई औचित्य नहीं मेरे इस तरह से आने वाली पीढ़ी को गलत-सलत परोसने का!मै स्वयं ब्लॉग पर लिखना छोड़ दूंगा!


यदि मेरी गलती है तो इसका सबसे अच्छा इलाज यही है कि मै अपनी गलती सुधार लूं!इसके लिए अच्छे और सच्चे मार्गदर्शक का हमारे समीप या संपर्क में होना निहायत ही जरुरी है!मुझे सौभाग्य से ऐसा  आदर्श  मार्गदर्शक  मिल भी गया!जो मेरे समीप भी है और संपर्क में भी है!उन्होंने समय रहते चेताया भी था मुझे कि मै थोडा सा भटकता सा प्रतीत हो रहा हूँ!लेकिन अपना अनुभव भी कुछ होता है,शायद यही सोच कर उन्होंने मुझे रोकने की बजाये बस इशारा भर किया था!


अभी समस्या यह हो रही है कि जिन्होंने मुझे या मेरे तरीके को गलत बताया है और जिन्होंने उनका पुरजोर समर्थन किया है उनमे अधिकतर वो ही है जो भूतकाल में उन पोस्टो के कारण-पोस्टो की या उन में से किसी पोस्ट की प्रंशसा कर चुके थे!अब इसे क्या समझा जाए?


यहाँ भी समर्थन और वहां भी समर्थन!भई वाह! क्या अब वो ही निर्धारित करेंगे ब्लॉग्गिंग स्तर?


अभी दिल कुछ ज्यादा ही उबाल खा रहा सो अधिक नहीं!


बस एक बार फिर मै ब्लॉग-जगत से माफ़ी मांगता हूँ,यदि मेरी वजह से ब्लॉग्गिंग का स्तर गिरा है तो!मै तो अभी नया ही हूँ इस ब्लॉग जगत में!मै भी शायद ना समझ पाऊं की क्या गलत है,लेकिन कोई आगे भी तो आये सही क्या है बताने के लिए....!




जय हिंद,जय श्रीराम,



कुंवर जी

बुधवार, 20 जनवरी 2010

जारी है संघर्ष मेरा मुझ को "मै" बताने का.........

जब भी मै नहीं लिख रहा होता हूँ तो  मै ये सोचता रहता हूँ कि आज उस विषय पर लिखूंगा-आज उस विषय पर लिखूंगा !परन्तु जैसे ही मै लिखने बैठता हूँ मस्तिष्क एकदम सुन्न जैसे,विचारो के नाम पर केवल रिक्तस्थान!कुछ भी तो सूझता नहीं जिसपर मै कुछ भी लिख पाऊं ! और कभी इतने विषय के चयन करना मुश्किल के किस से शुरुआत करू!फिर जिस किसी भी विषय पर लिखना आरम्भ किया तो उसके बारे में विस्तृत जानकारी का आभाव,अंततः एक विषय जो मुझे लगा कि जिसके बारे में मै बिना किसी भ्रम और संशय के लिख सकता हूँ वो अभी तो केवल और केवल मै स्वयं ही हूँ!


यह तो सत्य है कि मेरे बारे भला कौन पढ़ेगा,किसी के पास कहा इतना समय है कि वे मेरे लिए अपने अनमोल पल नष्ट करे !

लेकिन मै थोडा स्वार्थी टाइप का मानता हूँ अपने आप को !यहाँ भी अपना स्वार्थ ढूंढ ही लिया मैंने.........................!

स्वार्थ ये कि एक तो मेरे बारे में कोई मेरे सिवा जनता ही नहीं,जो भी कुछ मै बताऊंगा वही सर्वमान्य व् सत्य होगा,क्योंकि मेरे सिवा कोई जनता ही नहीं मुझे!दूसरा ये कि कम से कम मुझे लिखने का अभ्यास तो हो ही रहा है!कोई पढ़े या न पढ़े,मै खुद ही पढ़ कर अपने अन्दर सुधार के अवसर खोजा करूँगा!कभी तो कुछ तो सुधार कि गुंजाईश दिखाई देगी,जब भी दिखाई देगी धर-दबोचूंगा!

वैसे मै इतनी शीघ्रता से 'अवसर' को पिंजरे का पंछी नहीं बनाता,सोचता हूँ कि जब तक इसकी किस्मत में यूँ ही उड़ना है,उड़ लेने दूं!बाद में तो इसे मेरे कठोर और परिश्रमी विचारो में क़ैद हो ही जाना है!असल में मुझ से अधिक तो मेरे विचार ही परिश्रमी है!यदि केवल विचारो पर ही पारिश्रमिक मिला करता तो हम भी अमीर हो सकते थे!
मै सोचता हूँ........
वैसे मै बस सोचता ही ही हूँ,'करना' मुझे थोडा कम पसंद है!'सोचने' से किसी का कैसा भी नुक्सान मै नहीं कर सकता लेकिन यदि 'करता हूँ' तो न चाहते हुए भी किसी का नुक्सान हो ही जाता है!ये एक बड़ा कारण मै मानता हूँ अपने केवल 'सोचने' का!और एक ये भी है....मैंने किसी महापुरुष का एक विचार पढ़ा था कभी कि 'मनुष्य सत्ता नहीं करता,सत्ता विचारो कि होती है'!तो मै उस से पूर्ण सहमत हूँ!अधिकतर जो भी विचार मै कही से पढता या सुनता हूँ तो उस से अधिकतर मै सहमत या असहमत ही होता हूँ,मुझे ऐसा कभी लगता ही नहीं कि ये विचार मेरी विचार-दानी में कभी आये ही नहीं या 'पहली बार सुन रहा हूँ'!.............
ज्यादा तो नहीं हो रहा हा....?
अरे मेरे लिए नहीं , सम्भवतः आपके लिए हो रहा हो!
पर ये अटल सत्य है मेरे लिए तो!

आज के लिए इतना ही,शीर्षक का रहस्य अगली बार.........
अभी राम-राम जी,,,,,,
कुंवर जी!

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