जब हम प्रत्यक्ष किसी से कुछ पूछने में असमर्थ होते है तो अप्रत्यक्ष पूछ लेना चाहिए!ऐसा मुझे कई बार महसूस हो चुका है!ऐसा ही कुछ आजकल फिर मुझे लग रहा है!एक प्रशन मेरे मन-मस्तिष्क में खूब कुलाचे भर रहा है आजकल!मेरा नहीं है,पर मुझे बेचैन कर रहा है!मेरी (जैसी-कैसी भी)आस्था पर सीधे प्रहार जो कर रहा है!मै क्षमा चाहूँगा उन सब से जो मुझे थोडा गलत समझने जा रहे है!मै स्पष्ट करना चाहुंगा के मै केवल पूछ रहा हूँ,जिस पर मै आश्वश्त नहीं हूँ वो पूछ रहा हूँ!
पिछले दिनों हमारी मित्र मंडली में "श्रीमद भागवत गीता" पर चर्चा हो चली!मैंने अभी इसे पूरा नहीं पढ़ा है सम्भवतः इसीलिए मै उनके जवाब नहीं दे पाया!
प्रशन आया कि भगवान् श्री कृष्ण केवल युद्ध चाहते थे!
उनके अपने तर्क भी थे!
उन्होंने कहा यदि वो केवल ऐसा नहीं चाहते तो सम्भवतः युद्ध ना ही होता!उन्होंने अर्जुन को केवल लड़ने के लिए प्रेरित किया!
एक प्रशन ये आया कि यदि गीता का उपदेश देना था तो दुर्योधन को देना चाहिए था!उसे अधिक आवयश्कता थी ज्ञान की!गीता-ज्ञान यदि दुर्योधन को मिलता तो....?
अर्जुन तो पहले से ही विचारवान था,दुर्योधन के मुकाबले!
यहाँ मै भी एकचित नहीं रह पाता!कई जगह मैंने भी पढ़े है हमारी धार्मिक पुस्तकों में कि "इसका जिक्र केवल जिनकी इच्छा हो केवल उन्ही में करना,जिनकी इच्छा ना हो उन्हें ये ना सुनाया जाए" टाइप के आदेश!
मै भी सोचता हूँ के जो धार्मिक है उसी कि इच्छा होगी धार्मिक बाते पढने-सुनने की!जबकि जो अभी अधार्मिक है उसकी तो ये जरुरत है!मेरे हिसाब से!उसे धर्म के बारे बता कर या पढ़ा-सुना कर ही धर्म की और चलने के लिए प्रेरित किया जा सकता है!उसकी इच्छा नहीं है,इधर आने की हमे उसे बुलाना है!पर वो पहले वाली बात .."इसका जिक्र........" हमे ऐसा करने से रोकती सी प्रतीत होती है!
श्री कृष्ण भी यही करते दिखाई पड़ते है!अर्जुन युद्ध से बचाने के लिए कह रहे है और वो उसे आत्मा-परमात्मा के बारे समझा रहे है!जबकि उसकी इच्छा नहीं थी ये सुनने की फिर भी सुनाया!
दुर्योधन अमादा था युद्ध को,पाण्डव मजबूरी में लड़ रहे थे!तो श्री कृष्ण के द्वारा दुर्योधन को समझाया जाना चाहिए था!
एक प्रशन ये आया के भगवान् ने हमे अपने मनोरंजन के लिए बनाया है जो कि वो हमे हंसा-रुला कर(खासकर रुला कर) करता है!
मै उम्मीद कर सकता हूँ कि आप मेरे जिज्ञासु मित्रो की जिज्ञासा को कुछ शांत करने में मेरी साहयता करेंगे!कृपया कर मुझे समझाए कि मै क्या कह उनकी जिज्ञासा को संतुष्ट करने का प्रयास करूँ!सिवाय स्वयं गीता पढने के!क्योंकि बस ये ही उनके बस कि बात नहीं है!कुछ श्रीमद भागवद पर इतनी टिकाए मौजूद है के उनमे ही एक बात को कई तरह से समझाया गया होगा!
प्रशन तो और भी है,आज के लिए बस ये ही!
बाकी फिर कभी!
कुंवर जी,
कैसे न भागे सबकुछ छोड़...
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गोविन्द जो खींचे अपनी ओर
कैसे न भागे सब कुछ छोड़.
न दिखे फिर निशा और न भोर
दिखे तो बस एक कोमल डोर.
कभी शून्य चेतन,कभी भावविभोर
उनसे रिश्ता निभाने चली,बाक...
1 सप्ताह पहले







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