कुछ पत्ते दूर पड़े,
ज्यादा नहीं थोड़ी सी दूर पड़े
अपने पेड़ से
कराह रहे थे....
मैंने
जो उठाया उनको
प्यार से
वो तो
मुस्कुराने लगे!
सूख चुके थे
जाने कब टूटे होंगे
शाख से,
मैंने
कब उनको उठाया था
शाख से जोड़ने के लिए,
वो;
फिर भी गुनगुनाने लगे!
मजबूर तो होते है वो
भी और हम भी
ये सच है,
तभी तो
उस
पेड़ की आँखों में भी
आंसू आने लगे!
जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,