मंगलवार, 15 जुलाई 2014

मौन..... (कुँवर जी)

मौन.....
.
.
.
जिह्वा तालु को सटी है,
और अंतर में फिर भी शोर है,
क्या वहा मुझ से अलग कोई और है…
.
.
ये कैसा मौन है, ये कौन मौन है…?


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी

गुरुवार, 15 मई 2014

नतीजे...(कुँवर जी)

यही रात अंतिम यही रात भारी...

चलो नतीजो के आने से पहले सो लिया जाये!

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

धोखा उसकी रगो में बहता है क्या करे....

धोखा उसकी रगो में बहता है क्या करे,
वो करता है फिर सहता है क्या करे!

मशगूल है उसकी आदतो में बाँध तोड़ना,
औरो के चक्कर में फिर खुद बहता है क्या करे!


जय हिन्द,
जय श्रीराम!

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

मुझे अनुभव रेत के महलो का है.....(कुँवर जी)







मेरे शब्दकोष में कितने शब्दों के  अर्थ बदल गए,
अरमानो के सूरज कितने चढ़ शिखर पर ढल गए,
फौलादी इरादे वक़्त की तपन से मोम के जैसे पिघल गये,
सपनो तक जाने वाले रस्ते भौर होते ही मुझको छल गये,
इसी लिए तो आजकल बाते कम किया करता हूँ मै,
जिह्वा दब जाती है शब्दों के बोझ तले तो दो पल को सोचा करता हूँ  मै,

पहले हर हरकत एक जूनून हो जाती थी,
करना है तो बस करना है ऐसी धुन हो जाती थी,
क्या फ़िक्र थी कि ओरो की नजर ये बाते गुण या अवगुण हो जाती थी,
गुम था भविष्य,वर्तमान के लिए तो ये ही शगुन हो जाती थी,
आज शगुन को भी दो घडी टटोला करता हूँ मै,
तुमको लगा तो ठीक लगा के बाते करते सोचा करता हूँ  मै,


मुझे अनुभव रेत के महलो का है सो डरता हूँ हर आहट  से,
कितनी चतुराई क्यों न दिखाऊ हार जाता हूँ इस समय के  इक पल नटखट से,
फिर वो खड़ा मुस्कुराता है बेफिक्र और बेखबर हो मेरी हर झल्लाहट से,
सब भूलने का हौसला भी यूँ तो देता,उलझा कर तभी नयी  खटपट में,
बस यही से फिर जीने का दम भर जाता हूँ मै!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,



शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

फिर आतंकियों ने सेना पर हमला बोल दिया.....(लघु कथा )...(कुँवर जी)

मिश्रा जी ने चाय को ऐसे पिया जैसे किसी काढ़े का घूँट भर रहे हो!उनकी बहन घर पर आई हुयी थी,उन्होंने पूछा क्या हुआ चाय में चीनी की जगह नमक डाल दिया है क्या?
मिश्रा जी मुखमंडल पर दार्शनिक सी आभा को दिखाते हुए से बोले,"आज का अखबार तो देखो... फिर आतंकियों ने सेना पर हमला बोल दिया, कितने जवान शहीद हो गए!बोलते-बोलते वो सच में ही भावुक हो गए!फिर किसी की माँग सूनी हो गयी होगी,कितनी राखी कलाइयों को तरस जायेगी!कितनी माँ बस राह ताकती रह जायेगी!"
अखबार को अपने मन की तरह मसोस कर एक तरफ फेंक कर ऐसे ही बडबडाते हुए वो अपने कमरे की और चल पड़े,घडी की और नजर पड़ी तो ...." ओहो, आज फिर लेट हो जाऊँगा,अपनी पत्नी को लगभग धमकाते हुए वो बाथरूम की और दौड़े,"तुम्हे भी समय का पता नहीं चलता क्या?बताना तो चाहिए!आज तो वैसे भी एटीएम होकर जाना था,पांच-दस मिनट वहाँ भी लग जायेंगे!"
पत्नी बेचारी अपनी ननन्द की वजह से अपने सारे गुबार अपने ही अन्दर रखते हुए बोली,"नहाना बाद में, पहले अपने जीजा जी से बात तो कर लो.... क्या पता आज भी आये न आये!" पलट कर होंठ पीटती सी रसोई की और चली गयी!
मिश्रा जी की बहन को लगा की शायद वो ये कहती गयी है कि" रोज इसे लेने के लिए आने कि कह देते है....और आ रहे है नहीं!
उधर मिश्रा जी फोन काट कर बोले,"आज फिर बिना नहाये ही जाना पड़ेगा,खाना जैसा भी,जितना भी बना हो पैक कर दो!मैंने बोल दिया है जीजा जी को आज तो वो आ ही जायेंगे सो एटीएम तो जाना ही पड़ेगा!"
मिश्रा जी की बहन सोफे के एक कोने में फडफड़ाते  हुए अखबार को एक तक देखे जा रही थी,जैसे उसमे वो खुद को तलाश रही हो!

जय हिन्द,जय श्री राम,
कुँवर जी,   

लिखिए अपनी भाषा में

Google+ Followers