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गुरुवार, 12 जनवरी 2012

उनकी आह नहीं मिटती...

शब्द खड़े है चारो और...
मुझे घेरे...
घूर रहे है...
मैंने पूछा उन से..
"सर्दी नहीं लगती है क्या तुम्हे......?"
वो बोले....
जवाब नहीं तो बात बदलोगे...?
हम ने कहा
 तुमने पूछा ही क्या है..?
वो बोले...
नहीं पूछा तो क्यों हो सहमे-सहमे ...?
मन में क्या कम्पन है..?


हम ने कहा... 
तुम भी खूब हो.
सर्द सुबह  में
सर्दी से ही कांप रहे है!
और जिनकी तुम सोच रहे हो...
उन फुटपाथ पर पड़े
लोगो की 
दिक्कत को भी भांप रहे है!
शब्द जैसे इतराए...
हमारी चोरी पकड़ कर..


हम पुनः बोले..
उनका प्रारब्ध,विधान.....
शब्द तो जैसे गरजे.....
बोले..
हमारे ही सहारे
हम ही से खेलते हो....!


मन की सारी करुणा 
बस कागज़ पर ही उड़ेलते हो!
कविता में तो भिगो देते हो 
हमें भी 
अपने आंसुओ से....
पर असल में 




पर असल में
बच के निकल आये हो तुम 
फुटपाथ पर पड़े अधनंगो से!
उनको कितने ही शब्द 
ओढाओ,पहराओ,
ऐसे किसी ही सर्दी नहीं हटती,
उनके जीवन  से
कोरी  "वाह" बीनने से ही
उनकी आह नहीं मिटती...
उनकी आह नहीं मिटती...
उनकी आह नहीं मिटती...



जय हिंद,जय श्रीराम
कुँवर जी,

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

ये शाम...

दिन की सारी  
उमंगो-तरंगो को समेट  
रोज
ये शाम 
ढल जाती है
सारी चमक
उम्मीदों वाली
शाम की लालिमा में
पिघल जाती है...

ये शाम 
ढल जाती है 
फिर भी ढलती नहीं
जाने क्यों
रात बन फिर
सुबह में बदल जाती है....

हारता तो नहीं हूँ
पर हार
हो ही जाती है.
उठा कदम
धरते ही
धरती सी फिसल जाती है...


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

आँखे अब और भी चमक रही थी...(कुंवर जी)

साँस भला कब तक रोकता समय,
सुबह तो होनी ही थी,
पर ये क्या?
दिन तो निकला पर सूरज नहीं!
सब कुछ धुंधला-धुंधला
उस सर्द सुबह में,
तारे बेचारे
थक हार कर या
सुबह की लाज बचाने की खातिर
चले गए थे!
पक्षियों का आलस ज्यों का रयों था,
या तो वो घबराए हुए गुमसुम थे!
कालिया जो ख्वाब देख रही थी
खिलने के,
खुद पर तितलियों के मंडराने के,
जगी जरुर,पर मुस्कुराई नहीं,
तितलियाँ भी कहा आई थी,
क्योकि...
दिन तो निकला पर सूरज नहीं!

पत्ते उदास हो चले थे,
हौसले तोड़ दिए थे टहनियों ने भी,
और कालिया तो रो ही पड़ी
जब देखा उनके चारो और तितलियों के पंख
पड़े है बिखरे हुए!
उस पर न धुप का सहारा मिला,
तो यूँ तदपि कालिया
जैसे किसी ने सांस आने के सभी दर मूँद दिए हो...

तितलियों के बिखरे पंखो के बीच
लाचार कलियों को दम तोड़ते देख
झटके से; एक सांस खींच,
मुट्ठिया भींच आँखे खुली...
तो देखा

तितलियाँ तो उड़ रही थी,
क्योकि कालिया फूल बन खिलखिला रही थी!
पंछी भी खुले आसमान में
पर फैला चहचहा रहे थे,
क्योकि सूरज तो चमक रहा था क्षितिज पर,
और तारे कहीं भी न थे,
न उनकी जरुरत भी थी!

और बूँद ओस की,
आँख की पुतली से चल
समां गयी आँख की कौर में,
जो अब भी
पलके झपकाने से भी दर रही थी
कही फिर कोई सपना न दिख जाए,
पर
आँखे अब और भी चमक रही थी!



जय हिन्द,जय श्रीराम
कुँवर  जी,

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