शनिवार, 1 जनवरी 2011

जब सुख तक चला गया तो इस दुःख की तो क्या औकात है!

अरे!बस थोड़े से दिनों की तो ओर बात है,
 देखो साल बदला है.....
तो हाल क्यों नहीं बदलेगा!
जब सुख तक चला गया तो इस दुःख की तो क्या औकात है!
रोशनिया तक खो जाती है तो
परछाइयों की क्या बिसात है!
सच मे;आँखे खोलो,
वो निशा तो गुजर चुकी,
हो गयी नव प्रभात है!

आओ हम सब मिल कर इस सूर्य-गति-आधारित नव वर्ष का अभिनन्दन करे....
जो कुछ भी हम अपने लिए अच्छा सोच सकते है वो ही सबके लिए सोचे....
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपको,नववर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाएं !!बंधु
    आपके अभिष्ट कार्य और शुभ संकल्प पारिपूर्ण हो!!

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  2. सुख आता दु:ख जाता
    ढलती फ़िरती छाया है।
    दुनियावी चकाचौंध में
    यह मानुष भरमाया है।

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  3. आपको और आपके परिवार को मेरी और से नव वर्ष की बहुत शुभकामनाये ......

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  4. .नव वर्ष २०११ आपके जीवन में सुख, समृद्धि व मनोवांछित फलदायी हो, यह मेरी हार्दिक शुभकामना है.

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  5. प्रेरित करती आपकी ये रचना बहुत पसंद आई.
    आप को नए वर्ष की ढेरों शुभकामनाएँ और बधाई!

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  6. सही है... ऐसी ही सकारात्मक सोच की ज़रूरत है..
    नववर्ष की बधाईयाँ..

    आभार

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  7. निश्चित तौर पर -जब सुख तक चला गया तो इस दुःख की तो क्या औकात है

    पाश्चात्य नववर्ष की शुभकामनाएँ

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  8. देखो साल बदला है.....
    तो हाल क्यों नहीं बदलेगा!

    सच्च है ....समयानुसार परिवर्तन तो होता है ....
    पर कभी कभी ये लम्बी अवधि निराश कर देती है .....

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  9. महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के ब्लॉग हिन्दी विश्‍व पर राजकिशोर के ३१ डिसेंबर के 'एक सार्थक दिन' शीर्षक के एक पोस्ट से ऐसा लगता है कि प्रीति सागर की छीनाल सस्कृति के तहत दलाली का ठेका राजकिशोर ने ही ले लिया है !बहुत ही स्तरहीन , घटिया और बाजारू स्तर की पोस्ट की भाषा देखिए ..."पुरुष और स्त्रियाँ खूब सज-धज कर आए थे- मानो यहां स्वयंवर प्रतियोगिता होने वाली ..."यह किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर के विश्‍वविद्यालय के औपचारिक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग ना होकर किसी छीनाल संस्कृति के तहत चलाए जाने वाले कोठे की भाषा लगती है ! क्या राजकिशोर की माँ भी जब सज कर किसी कार्यक्रम में जाती हैं तो किसी स्वयंवर के लिए राजकिशोर का कोई नया बाप खोजने के लिए जाती हैं !

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