बुधवार, 1 मई 2013

एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल.....






थोडा रूक कर सोचे तो देखेंगे कि हम इस तरह भी तो भगवद सेवा कर सकते है!हम मानव तो अपनी जरुरत की चीजो का संग्रह कर के रख ही लेते है और जितनी जरुरत होती है उस से कहीं अधिक ही संग्रह कर लेते है!पर ये बेजुबान,निरीह पशु-पक्षी.... अभी भूख लगी तो कही जाकर खा लिया और प्यास लगी तो जो पानी कही भी उपलब्ध हो गया पी लिया! कल तो बहुत दूर है,दूसरी बार खाने-पीने के लिए भी ये संग्रह नहीं करते!

यदि हम देखे हमारी संग्रह की आदत से हम इनको भी लाभ दे ही सकते है!जो हम अपने लिए संग्रह कर रहे है उसमे से कुछ हिस्सा इनके लिए निकाल ले,और रख दे कही ऐसी जगह जो इनकी पहुँच में हो सरलता से,और सुरक्षित भी हो!और सोचो कितना हमें इनके लिए निकालना है,बहुत कम मात्र ही इनके लिए पर्याप्त है!




एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल,अनाज या जो भी अन्न हमें आसानी से मिल जाता हो!बस इतने से ही हम अपनी भगवद सेवा कर सकते है!हाँ,बदले में इन्हें खाने-पीने वाले पंछी आपको धन्यवाद बोलने तो नहीं आयेंगे पर आपको अनुभव जरूर होगा कि आपको धन्यवाद मिल गया है!अरे सोचना कि नहाने में एक लोटा पानी कम प्रयोग कर लेंगे, मंजन में थोडा कम पानी खर्च लेंगे.... और कितनी ही ऐसी गैरजरूरी पानी की बर्बादी को कम कर के हम ये एक लोटा पानी रोज निकाल ही सकते है और जिनमे हमें कुछ कमी भी महसूस नहीं होगी उस एक लोटे पानी की!

जरुरत है तो बस एकबार सच्चे मन से संकल्प करने की कि अब मुझे हर रोज एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल पंछियों के लिए निकालने ही है और छत पर,झांकी में या कही भी उनकी सरलता से पहुँच वाली जगह रखनी है......बस! फिर तो भगवान् भी आपको नहीं रोक सकता उन पंछियों के लिए ऐसा करने से!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

3 टिप्‍पणियां:

  1. ये सतप्रयास चलते रहें, शुभकामनायें!

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  2. अनुकम्पा भरी विनंति!!
    हृदय में करूणा की ज्योत जलाने के प्रयास को नमन!!

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  3. सच्चे मन से संकल्प करने की जरुरत है

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