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मंगलवार, 25 मई 2010

वाह कह दे एक बार बस वाह कह दे,.....(हास्य-वयंग्य)

कवी हृदय पती साधारण पतियों से अधिक पत्निव्रता होता है,इसमें कोई दो-राही बात नहीं हैं!उदाहरण के लिए आप कालजयी फिल्म "नवरंग" देख सकते है!

कवी हृदय पती तो बस एक वाह का मारा होता है!पत्नी उसे दुत्कारती रहे,कोई इज्जत ना करे(वैसे ऐसे काम वो कम ही कर पाते है जिनसे उनकी इज्जत आदि में सकारात्मक फर्क पड़ता हो!) फिर भी वो उसके प्रति कोई वैर-भाव मन में नहीं पालते!हर बार वो नकारे जाते है फिर भी वाह सुनने की चाह उनसे एक प्रयास और करवा डालती है!

अपनी सारी लगन का वो बस एक मोल आंकते है..."वाह"!(क्या कहा,भले ही सच्चे दिल से ना हो? तो भाई साहब शुद्ध कुछ मिलता है आजकल?थोड़ी बहुत(या सारी भी) मिलावट तो स्वीकार्य है!सोच में लोच तो होनी ही चाहिए!

अब कल ही की सुन लीजिये......देर रात घर पहुंचे,पत्नी श्री हमारी तरह कविहृदय तो है नहीं,सो हमारे जितनी पतिव्रता तो वो.....मेरा मतलब है वो है तो.....बस अवसर पर दिखाने पर चूक जाती है बेचारी.....!

खाना-पीना हो चुका था,हमारे लिए बचा था या नहीं इसमें हमारी कोई रुचि नहीं थी!(रुचि होने से कोई फर्क भी नहीं पड़ने वाला था,पर हमारी सच में कोई रुचि नहीं थी!)
खट-खट ने जब रूकने का नाम नहीं लिया तो देवी जी प्रकट हुई या उन्हें होना पड़ा जो भी.....!द्वार खुला...लेकिन उसका मस्तिष्क नहीं!"आ गए" जरूर उसने मन ही मन में कहा होगा,लेकिन मैंने महसूस कर लिया था,इसी लिए तो उसका द्वार खोलते ही वापस चला जाना मुझे गलत नहीं लगा!

उसके इसी व्यवहार ने तो मेरे अहम् का समूल नाश कर दिया था,अर्थार्थ अब "शुद्ध कवी" ही बचा था!जो बस हर बार,हर बात में कविता खोजता फिरता है!हालांकि मै जान चुका था कि पत्नीश्री का क्रोध बस राख के नीचे दबी आग कि तरह ही है जो थोड़ी सी कुरेदने पर भी भड़क सकता है....पर.....कविहृदय.....इसका क्या करे!
जो कविता बना के लाया था वो तो अब पुरानी जान पड़ी या उसे सुनाने के लिए भूमिका बना रहा था,मै अब उसे एक तुरन्त बनायी कविता सुना रहा था.....

                                                               वाह कह दे एक बार
बस वाह कह दे,

खाना भले ही ना दे
तू बिना जिरह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे,

जो भी कहना है वो
तू हो बेपरवाह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे,मेरा दिल भी ना दुखे


कुछ इस तरह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे,कुछ ना भी लगे लायक


तो भी बेवजह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे!

जो भी मै कहूं
तू ठीक वही राह कह दे
बस एक बार वाह कह दे!
जय हिन्द,जय श्रीराम
कुंवर जी,

शुक्रवार, 14 मई 2010

अपने अनुभव रूपी ज्ञान का दूसरो के लिए भी प्रयोग कर लेना चाहिए!फायदा अपना भी होगा और दुसरो का भी!कुछ सीखो यहाँ से-कुंवर जी,(हास्य-वयंग्य)

हमें अपने अनुभवों का लाभ सभी को देना चाहिए!ऐसा मेरा मानना है!ऐसी ही एक घटना मै आपको सुनाने जा रहा हूँ,शायद उसके बाद आपका भी ऐसा ही मानना हो जाए!


हुआ यूँ कि हम और राणा जी,किसी पार्टी में शिरकत करने पहुँच गए!अब ये बताने का कोई औचित्य नहीं लग रहा कि हम आमंत्रित भी थे या नहीं!भई दोस्त की हर चीज हमारी,फिर न्योता क्यों नहीं?


आपको ऐतराज हो तो बताओ.....!


हाँ तो वो दोस्त कुछ बी पी एल वाली लाइन से बहुत ऊपर का था,उसकी पार्टी भी वैसी ही होनी थी!


हम थे गाँव के गंवार,पत्तलों पर नीचे बैठ कर खाने वाले!वैसी सी पार्टी का पहला अनुभव जी हम दोनों का!तो लगभग साथ-साथ विचर रहे थे हम दोनों,चरने के लिए!


पर शायद कोई ख़ास समय निश्चित नहीं था उसके लिए!कुछ तो जाते ही जुट रहे थे और कुछ ना जाने क्या तलाश रहे थे!


इस बीच हम दोनों थोड़ी देर के लिए अलग-अलग भी हो गए थे!


एक भाई साहब प्लेट में ना जाने क्या लिए जा रहा था!बस समीप आकर धीरे से बोला "जल जी"!


हमने हाथ बढ़ाया ही था कि उधर से राणा जी की आवाज आई,"कुंवर जी,रहने दो;कोरा पानी है वो,मै भी धोखा खा गया था!"


हमने धन्यवाद कहा जी मन ही मन में राणा जी का!बोल देता तो खामख्वाह ही सर पर चढ़ जाते,सो मन ही ,मन में कह दिया था!


हम अभी भी विचार ही रहे थे,राणा जी ने कहा शुरुआत कर ही डालते है!हम तो इन्तजार ही इसी बात का कर रहे थे,और आँखों ही आँखों में इशारा कर दिया जी!


राणा जी ने प्लेट उठायी जी,उस में कुछ सफ़ेद-सफ़ेद मुलायम-मुलायम सा कुछ था!हाथ लगाते ही बड़ा अच्छा लग रहा था!राणा जी ने सोचा कुछ नया सौदा है खाने का!हमने भी देख लिया!जैसे ही उन्होंने उसे उठा कर मुह की और बढ़ाया,हमने टोका!


अब बारी हमारी थी!राणा जी के एहसान उतारने की भी और अपने अनुभव का लाभ राणा जी को देने की भी!


हमने राणा जी को लगभग समझाया,"रहने दो राणा जी,मै देख चुका हूँ!बिलकुल फीका है,कोई सब्जी भी ले लेते है साथ में!"

पास में एक जनाब हमें बड़े गौर से देख रहे थे!उन्होंने हमारी मानसिक और सामाजिक हालत को समझते हुए हमें एक और ले जाकर समझाया,वो बोले."ये खाने की चीज नहीं,टिस्यू पेपर है!पोंछने के काम आता है"


हमने उन्हें अपना अनुभव हमें बताने का धन्यवाद तो किया ही किया,साथ में अनुभव रूपी ज्ञान को बांटना भी सीखा!


आपने कुछ सीखा!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

गुरुवार, 13 मई 2010

देखना कैसे-कैसे मर्द है यहाँ?-कुंवर जी,

बैलगाड़ी धेरे-धीरे टुमक-टुमक चल रही थी जी!अब वो तो बैलगाड़ी थी ऐसे ही चलनी थी!जितने यात्री उसमे बैठे वो बोर भी नहीं हो रहे थे,सभी को आदत थी उसमे सफ़र करने की!
उनमे एक भाई साहब कुछ अलग से दिख रहे थे!सौभाग्य से या दुर्भाग्य से घडी केवल उन्ही के पास थी वहाँ!किसी ने पूछ लिया कि समय क्या हुआ है?
उन्होंने घडी में देखा,बोले दो बजने वाले है!
उस बैलगाड़ी में कोई कही से सवार था कोई कहीं से!आपस में इतना परिचय भी नहीं था!और वो धीरे-धीरे टुमक-टुमक चल रही थी!
काफी देर बाद उस घडी भाई साहब से किसी ने फिर समय पूछ लिया!अबकी बार उनकी व्यक्तिगत समस्याओं का असर उनके चेहरे पर नजर साफ़ आया!उन्होंने घडी में देखा और बोले दो बजने वाले है!
सुनने वाले को अजीब तो लगा पर वो कुछ कह नहीं पाया!शायद शीष्ट्ता  आड़े आ रही थी उनकी!
पर घडी भाई साहब अपने व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों में ही फसे पड़े थे अब भी!उन्हें नहीं पता वो क्या कह रहे है!उन पर कोई असर ही नहीं!
और बैलगाड़ी पर तो खैर क्या फर्क पड़ना था इस बात का!वो तो धीरे-धीरे टुमक-टुमक चल ही रही थी!


अब वो सभी अनजान थे और सभी पुरुष,सो एक-दूसरे से कोई ज्यादा बात-चीत भी नहीं हो रही थी उनके बीच!अब फिर किसी ने समय पूछ लिया उन घडी भाई साहब से!
पहले तो उसने समय पूछने वाले को लगभग घूरा,फिर अचानक उस पर कृपा करते हुए घडी को देखा और बोला-"दो बजने वाले है!"
अबकी बार सभी घडी भाई साहब को एक-टक देखने लगे!इस पर उसकी सोच में भी जैसे किसी ने 'ठहरे हुए पानी में पत्थर सा मार दिया हो'वाला काम कर दिया!उन्हें लगा कि शायद कहीं कुछ गलत है!उन्होंने घडी को देखा वो सच में दो बजाने ही वाली थी!


अब उसने सोचा,घडी जब घर से चला तो  ठीक थी,शायद अब खराब हो गयी होगी!लेकिन उसे पिछली दो-तीन बार समय पूछने वाली बात भी स्मरण हो आई थी!अब वो मन ही मन लज्जित तो हो रहा था पर और किसी को इस बात का पता ना चले ये भी चाह रहा था!
दुसरे लोग भी इस बात को भांप चुके थे!उनमे से किसी एक ने शिष्टता के घूघट को थोडा उघाड़ते हुए,हिम्मत कर के कह ही दिया."भाई साहब,पिछले ढाई घंटे से दो नहीं बजे क्या?"
अब तो घडी भाई साहब को जैसे सांप सूंघ गया हो!एक दम तो कुछ नहीं बोले!पर शायद हरियाणे के थे!तुरन्त-बुद्धि उन्हें कहा जाता है!
हर बात का जवाब वो अपने हिसाब से ही देते है!अब घडी खराब है,ये स्वीकार कर लिया तो जो घडी होने का रौब वो अब तक अप्रत्यक्ष रूप से जमा रहे थे,सब ख़त्म!अब वो भी बचाना था और इज्ज़त भी!
वो शान से बोले-"रै बावले,या मर्द की जुबान सै, जो एक बै कह दिया सो कह दिया,मिनट-मिनट पै ना बदलेगी!"


सभी कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र तो थे,पर क्यों खामख्वाह में बुराई ले,ये सोच कर चुप भी थे!इस से बैल गाडी पर भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा था!वो तो अब भी यूँ ही धीरे-धीरे टुमक-टुमक चल ही रही थी!


अपनी बात कहने के लिए एक पुरानी बात को अपने हिसाब से प्रस्तुत किया है!आशा है आप मेरे इस असफल प्रयास को समझने की सफल कोशिश करेंगे!




जय हिन्द,जय श्री राम,
कुंवर जी,

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

एक रेल 150 की.मी./घंटा की रफ़्तार से आ रही है, और दूसरी 123 की.मी../घंटा की रफ़्तार से जा रही है,तो बताओ मेरी उम्र कितनी?"(हास्य-वयंग्य)

बहुत  पुरानी  तो  बात  नहीं  है  खैर!फिर भी पुरानी तो है ही,काफी समय से सुनते आ रहे है!
हमारे विद्यालय की दीवारे भी तब ज्यादा ऊँची नहीं होती थी!ये तो अब करनी पड़ी जब विद्यालयों की लड़कियों को देखने वालो को आंखो से ही डराना पर्याप्त ना रहा!
हाँ तो तब जब दीवारें ऊँची नहीं थी!बहार  से  अन्दर  साफ़  दिखाई  दे  जाता  था!एक ताऊ बहार खेतो में गाय-भैंस चरा रहा था!वो क्या देखता है के एक अध्यापक महोदय कक्षा के सभी बच्चो की एक-एक कर के पिटाई करता जा रहा था!जब बहुत देर हो गयी और सीन ना बदला तो ताऊ जी रहा ना गया!वो दीवार फांद कर अन्दर!सीधे कक्षा में!पूछने पर पता चला के मास्टर जी ने जो सवाल पूछा उसका जवाब नहीं था किसी के पास!ताऊ जी ने कहा-"मास्टर जी वो सवाल सा एक बार मुझ से भी पूछ लो!क्या पता मै जवाब दे दूं!

मास्टर जी बोले  "जब हाई क्लास के बच्चे इस सवाल को हल नहीं कर पाए तो आप क्या हल करेंगे!"

ताऊ जी ने थोड़ी सी अपनी टोन पकड़ते हुए कहा-"टेम क्यूँ खराब करो हो?"

मास्टर जी समझ गये!बोले-"सवाल ये है,एक रेल 150 की.मी./घंटा की रफ़्तार से आ रही है, और दूसरी 123 की.मी../घंटा  की रफ़्तार से जा रही है,तो बताओ मेरी उम्र कितनी?"


ताऊ जी ने बहुत गहन विचार के बाद जवाब दिया, "मास्टर जी आपकी उम्र है 42 साल!
मास्टर जी हैरान,परेशान!बोले."ताऊ जी आपका गणित लाजवाब है!आपने किस फार्मूले से सही जवाब निकाला है?"
ताऊ जी-"फार्मुल-वार्मुला तो कुछ नहीं!बस एक बात का विचार किया के हमारे छोटे लड़के की उम्र 21  साल है और वो आधा पागल है!और मुझे आप पूरे पागल लगे!बस ये बात थी!अब आप मास्टर हो,और तो कुछ नहीं कहा जा सकता जी!

अब मै सोच रहा हूँ कि आज-कल ब्लॉग जगत में जो लोग उलटे सीधे सवाल पूछने में ही अपनी उर्जा खपा रहे है वो 21 साल के है या 42 के!मेरे जैसे मुर्ख,कम उम्र,कम अक्ल ये काम करे तो शोभा भी दे,पर  यहाँ तो कई डॉक्टर भी है!ऐसा लगता है जैसे अभी सारी समस्याओं को निपटा देंगे,सवाल खड़ा कर के ही बस!कुछ तो विचार करना चाहिए!



जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी, 

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

हिन्दुओ की ये भावना के "कुत्ता भौंक कर अपने आप चुप हो जाएगा" काफी हद तक जिम्मेवार है कुत्ते की भों-भों सुनने के लिए!

आजकल जो ब्लोग्युद्ध सा छिड़ा हुआ है ब्लॉगजगत में हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों को लेकर अपने-आप में दुर्भाग्यपूर्ण है!और जो वास्तव है में वो तो अति-घृणित भी! लेकिन जब कोई हमारे बारे में कुछ गलत कह रहा है तो उसे उसका जवाब भी तो मिलना चाहिए!जो सक्षम है जवाब देने में वो तो जवाब जरुर देंगे,देना भी चाहिए!हिन्दुओ की ये भावना के "कुत्ता भौंक कर अपने आप चुप हो जाएगा" काफी हद तक जिम्मेवार है कुत्ते की भों-भों सुनने के लिए!



असल में ये पोस्ट लिखी गयी है एक नीचे दिए गिये लिंक पर लिखे गए एक लेख पर टिप्पणी करते हुए!विस्तार से जानने के लिए नीचे क्लिक करें!  

 http://samrastamunch.blogspot.com/2010/04/blog-post_3276.html  इस तरह के कुत्ते सिर्फ मुस्लिम ही नहीं बल्कि इसाई जगत में भी पाए जाते है!और तो और हिन्दू धर्म से जो उप-धर्म निकले है उनमे भी और जो अभी तक भी खुद को हिन्दू मान रहे है वो भी इन कुत्तानुमा वयवहार ही कर रहे है!




कुत्ते से एक बात याद आ गयी,कवी सुरेंदर शर्मा जी की!अपने शब्दों का प्रयोग कर रहा हूँ,जो गलती होगी वो मेरी ही होगी!

एक फौजी की शादी हो गयी जी,बन्दे के पास अपनी दोनाली बन्दुक!नयी-नयी दुल्हन घर में!फौजी साहब खाना खा रहे है जी,बन्दूक पास में रखी है!
एक कुत्ता वही बैठा था,जब उसे काफी देर तक टुकड़ा नहीं मिला तो बेचारा आदतन भौंकने लगा!जब काफी देर हो गयी तो फौजी बोला "कुत्ते चुप"!अब बिना टुकड़े वो कहाँ चुप होने वाला था!वो भौंकता रह जी!फौजी बोला "कुत्ते चुप,मेरी बन्दूक नहीं देखी क्या?"अब कुत्ता कोई पढ़ा-लिखा डॉक्टर तो था नहीं!वो बेचारा बन्दूक क्या देखता,वो तो रोटी देख रहा था!रोटी मिली नहीं तो वो भौंकता रहा!
अब हो गयी जी हद!फौजी साहब अपने वास्तविक रूप में आते हुए बोले कुत्ते मै तीन तक गिनूंगा,चुप हो गया तो ठीक नहीं तो फिर देख लेना!
कुत्ता अब भी नहीं समझ पाया बेचारा!कुत्ता जो था!उधर गिनती शुरू!कुत्ते चुप हो जा एक...कुत्ते चुप हो जा दो...कुत्ते चुप होजा तीन....!


कुता बेचारा सच में अनपढ़ था!गिनती का महत्त्व नहीं जानता था,भौंकता रहा गिनती के दौरान भी और बाद भी!
गिनती पूरी और बस एक फायर ही काफी था उस कुत्ते के लिए तो!सदा के लिए चुप!फौजी अपनी जीत पर अति प्रसन्न!अब आराम से खाना खाया उसने!लेकिन उसकी पत्नी थोड़ी जागरूक नारी थी!वो ये अत्याचार सहन ना कर पायी!उसने आवाज उठायी!


फौजी पतिधर्म के तहत सब सुनने लगा!वो कहे जा रही थी....."ये कोई मानवता है क्या?कुत्ता था भौंक ही तो रहा था,गोली मार दी!ऐसे ही इसी को गोली मार देते है क्या......"
अब फौजी अपने धैर्य को टूटा सा देख कर बोला के बहुत हो चुका अब चुप हो जा!


पर नारी थी,जागरूक थी,"मुझे तो पता ही नहीं था कि आप ऐसे भी हो,पता होता तो कभी शादी नहीं करती......"


अब फौजी से ना रहा गया!वो बोला "देख चुप होजा एक.....चुप होजा दो......
और फिर तीन गिनने कि जरुरत नहीं पड़ी!आज सब ठीक चल रहा है!उसके बाद उस घर में फिर कभी लड़ाई नहीं हुई!


मतलब यही कि,कभी-कभी शान्ति के लिए हमे भी कठोर रूप अख्तियार कर लेना चाहिए!कोई हमे गलत कह रहा है तो कोई कब तक सहे!वो गलत है ये कहने वाला कोई ना कोई तो होना ही चाहिए!और वो कोई मै क्यों नहीं,ये बात सभी हिन्दुओ को सोचनी चाहिए!जब सभी अपने-अपने स्तर पर विरोध दर्ज कर सकते है तो करना चाहिए!क्यों हम गलत को गलत नहीं कह पा रहे है?


सोचो!
जय हिंद,जय श्री राम.....
 कुंवर जी,


मंगलवार, 16 मार्च 2010

नाम सब से अच्छा "तम्बकतुरा"!...(हास्य-वयंग्य)

एक गरीब के घर गलती से लड़का पैदा हो गया!क्षमा चाहूंगा,गरीब अधिकतर गलती ही करता है ना इसी लिए यहाँ भी 'गलती से' निकल गया!हाँ तो वो पैदा तो हो गया पर अब उसका नाम क्या रखे जी?
बड़ा ही कठिन सा प्रशन!हमारे-तुम्हारे लिए तो नहीं पर उस गरीब के लिए जरुर!

राम,कृष्ण,बलराम,विक्रम आदि रखदे तो क्षत्रिय वर्ग खा जाएगा उसे,'हमारे नाम ये रखेगा अब?"
सोहन,मोहन,बनारसी रखे तो पडोसी जीने नहीं देंगे,'हमारे ही नाम पाए थे तुझे?"
असलम,राशिद,रफ़ीक उसे अच्छे नहीं लगे,क्योंकि रखे तो जात-बिरादरी का डर!
आजकल के मोडर्न नाम उसे सूझते नहीं!

एक जमींदार आया,उसने कुछ बधाई स्वरूप कुछ अनाज उस गरीब के घर डाला और बोला इसका नाम रख दो "तम्बकतुरा"!

चलो हो गया जो नामकरण!
अब तम्बक्तुरा बड़ा हो गया,समय पर विवाह भी हो गया जैसे-कैसे!अब उसकी पत्नी थोड़ी-बहुत पढ़ी-लिखी सी आ गयी जी गलती से!अब लड़की और गरीब की तो गलती से ही पढ़ ली होगी!उसे कोंन सा राष्ट्रपति बनना है!

अब कुछ दिन तो उसने सहा अपने पतिदेव का नाम-रूपी-अपमान!आखिर कब तक!एक दिन उसके अन्दर की शिक्षित नारी तड़प उठी,बोली "ये नाम बदल लो जी,मुझे अच्छा नहीं लगता!"
तम्बकतुरा बेचारा पुश्तैनी गरीब,जमींदार जो कहें वोही सर्वोपरि!बोला,"नाम में क्या रखा है,कोई कुछ भी कह ले,हमे तो अपना पेट भरना है और सो जाना है!और ये तो वैसे भी बड़े चौधरी ने दिया है,बदल कर उनका अपमान करना मेरे बस में नहीं है!":

पर जब पेट भरी नारी जाग जाती है तो उसे समझाना सम्भवतः असंभव है!अपने पतिदेव का नाम परिवर्तन की हठ उसने ठान ली!अब तम्बकतुरा गरीब के साथ-साथ आदमी भी था!घर की सुख-शान्ति के लिए के पत्नीश्री की मान लेना ही उचित देख बोला,"तू ही रख दे कोई नाम!"

वो बोली आज शाम तक नाम ढूंढ लाऊँगी!

उसने सोचा सावित्री तो यमराज से अपने पति के प्राण तक वापस  ले आई थी मुझे तो एक नाम ही लाना है,ले कर ही दम लूँगी!ऐसा प्राण कर वो घर से निकल पड़ी!सोचा जो भी नाम सबसे अच्छा लगेगा वो ही अपने पतिदेव का नाम रखूंगी!

घर से थोड़ी दूर निकलते ही उसने देखा किसी की अर्थी जा रही है!पूछने पर पता चला के मरने वाले का नाम था "अमर"!
उसने सोचा जो मर गया वो कैसा अमर?

थोडा आगे चलने पर देखा के एक आदमी शराब के नशे धुत्त सबके साथ गाली-गलौंच कर रहा था!पता लगा के उसका नाम था "भगत"!
उसने सोचा जो सूरा का गुलाम है वो कैसा भगत?
आगे राह में उसने देखा के एक हट्टा-कट्टा आदमी बदहवास सा भागा जा रहा है!बार पीछे मुड़-मुड़ कर देखता जाता और दौड़ता जाता!पता लगा वो ना जाने किस से डर कर भाग रहा था!नाम पता लगा उसका "शेर सिंह"!
उसने सोचा ये कैसा शेर,कैसा सिंह,जो डर रहा है?

थक हार कर शाम होते-होते वो बेचारी वापस अपने घर आ गयी!अब सभी को बता कर निकली थी के आज तो कोई उत्तम नाम अपने पतिदेव का ढूढ़ लाऊँगी,सो सभी की व्याकुल दृष्टि उसी की और थी!अब पुरुषो को तो उसकी हालत से अंदाजा हो गया के जो उन्होंने सोचा था वोही हुआ है आज,सो चुप ही रहे!पर नारी तो नारी ठहरी!समझ तो वें भी गयी के क्या हुआ है,पर जो रस सुन कर आता है वो महसूस करने में कहाँ?अपने-अपने अंदाज़ में सभी ने पूछा?
अब जो उत्तर उस बेचारी ने दिया वो मै आपको बिलकुल वैसे बताता हूँ जैसे मैंने सुना था!है तो हरियाणवी पर थोडा सरल है! वो बोली.....
                              "अमर को मरदे* देख्या,अर भगत देख्या सूरा**,
                               शेर सिंह नाम जिसका वो भी डर रह्य था पूरा,
                                सुन लो मेरी जिक्र करण की लोड*** नहीं...
                                नाम सब तै अच्छा "तम्बकतुरा"!

ये आख्यान मैंने अपने गाँव में सुना था!आप तक पहुँचाने में मैंने भी कुछ मिर्च मसाला इसमें अपनी ओर से डाल दिया है!पता नहीं स्वाद बिगाड़ा है या सुधारा है मेंरे मसाले ने!अब ये तो आप ही बता सकते हो!अब तो ये आपके हवाले........
कुछ शब्दार्थ...
*=मरते हुए
**=शराबी
***=जरुरत 
 कुंवर जी,

बुधवार, 10 मार्च 2010

नारी है अत्याचारी........(हास्य-वयंग्य)

कल ही महिला आरक्षण बिल पारित हुआ और आज मेरे पास ये सन्देश कई बार कई लोगो ने भेजा!
मुझे लगा आपको भी ये बताना चाहिए...


let,s celebrate men,s day...
बेचारा मर्द.....
अगर औरत पर हाथ उठाए तो ज़ालिम,
अगर पिट जाए तो बुजदिल,
औरत को किसी और के साथ देख कर लड़ाई करे तो 
जलता है,
चुप रहे तो बेगैरत.
घर से बहार रहे तो आवारा और
घर में रहे तो नाकारा,
बच्चो को डांटे तो  ज़ालिम,
ना डांटे तो लापरवाह,
औरत को सर्विस से रोके तो
शक्की-मिजाज़,
ना रोके तो औरत की कमाई खाने वाला,
आखिर नादाँ मर्द जाए तो जाए कहाँ...?
जनहित में जारी...
नारी है अत्याचारी!


मुझे इसके वास्तविक रचनाकार का नहीं पता!पर जिसने भी इसकी रचना की है उसने अपना पूरा अनुभव पूरी इमानदारी से उड़ेल दिया है!
कुंवर जी,

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

अजीब दास्ताँ है ये.......(2 )(हास्य-वयंग्य)

सर्वप्रथम तो आप सब का मुझे झेलते रहने का आभार प्रकट करना चाहुंगा!जिन्होंने मुझे "टिप्पणी ब्रांड" उत्साहवर्धक टोनिक की दो बूँद दी है,उन्हें मै बताना चाहूँगा के उनका ये प्रयोग सौ फीसदी सफल रहा!हर एक बूँद मेरे लहू में मिल जो रासायनिक क्रिया कर रही है उस से आप ज्यादा दिन अनभिज्ञ  नहीं रह पायेंगे!
मुझ तुच्छ पर दृष्टि डालने के लिए एक बार फिर मै आभार व्यक्त करता हूँ,साथ में आशा करता हूँ कि ये स्नेहाशीष सदा मुझे मिलता रहेगा!


पिछली बार जब हमारी बात रुकी थी तो कुंवर जी घर जा रहे थे और घर पहुँचने से घबरा भी रहे थे,क्यों? ये आपने पढ़ ही लिया!

हम घबरा जरुर रहे थे लेकिन हमारा मानसिक सन्तुलन  अभी भी कायम था!हम भली-भाँती जानते थे क़ि घर खाली हाथ जाना खतरे से खाली नहीं है,सो सर्दियों के मौसम के हिसाब से और अपनी जेब के मिजाज से मेल खाती चीज ले ही ली हमने!आप उत्सुक दिखाई दे रहे है सो बताये देता हूँ!हमने लिए जी "बादाम.......गरीबो के"!अर्थार्त मूंगफली,वो भी पूरी आधा किलो!साथ में गच्चक भी!मानो तो सोने पे सुहागा!


घर में प्रवेश करते ही सपना स्मरण हो आया जो सच सा प्रतीत हो रहा था!एक बात और पता चली के खीर भी बनायी गयी थी विशेषरूप से हमारे लिए!मन की शंकाओं ने मष्तिष्क की सहयता से षड़यंत्र रचने आरम्भ कर दिए ,सपने में दिखी सम्भावित आपदा से बचने के लिए!जाते ही सबसे पहले नतमस्तक माता-पिताश्री के श्रीचरणों में!श्रीमती जी अन्दर कक्ष में ही खड़ी-खड़ी निहार रही है जी और हम नजरे चुराने की झूठी कोशिशो में लगे है!


थोड़ी देर बाद पिताश्री भी उठ कर बहार चले जाते है,हम वही बैठे है!माताश्री,श्रीमती जी की भावनाओ को समझने के प्रयास करती दिखाई देती है,उन्हें हमारे लिए पानी लाने के लिए कह देती है!स्वयं वह से जाने के लिए बहार कोई काम याद आने की कह कर उठने लगती है!उन्होंने सोचा होगा के अब तो बात कर लेने दू दोनों को!परन्तु हम थोड़े से भयभीत थे सपने से!मिलने की जो उमंग-तरंग मनमे हर बार होती थी वो इस बार नहीं थी,आपको तो इमानदारी से बता ही सकता हूँ!

उमंग कि जगह मन में कुछ और था,आप तो समझ ही गए होंगे!माताश्री बहार चली गयी हमे अकेले ही जूझने के लिए छोड़कर!थोड़ी देर तो मेहमानों वली आव-भगत सी हुई,फिर बात मुद्दे कि और मुड़ती प्रतीत हुई हमे!हमने तुरन्त मूंगफली और गच्चक रूपी कवच-कुण्डल का प्रयोग किया,सफल भी रहा!कुछ देर के लिए ही सही,पर तब तक हमे खुद को सम्भालने  का समय मिल गया था!जैसे कैसे हम खुद को वह से निकालने में सफल रहे!उसके बाद तो संजीव के यहाँ बांग्लादेश और कीनिया का क्रिकेट टेस्ट मैच देखने बैठ गए!वो भाई साहब तो बोर हो गए थोड़ी देर में ही,पर हमे तो वो भी एक बहुत अच्छा साधन दिखाई दे रहा था खुद को व्यस्त रखने का,सो हम तो देखे जा रहे थे!

हम कितना ही दिखावा कर ले खुद को अपनी परेशानियों से अलग रखने का पर ये जालिम मन,रह-रह कर वहीँ दौड़ जाता है!अपना भी कुछ ऐसा सा ही हाल था!संजीव ने तंग आ कर पूछा के "और कितने  बचे है?"
हम बोले-"आठ सौ ही बचे है यार!"खैर 2-3 बार चाय देने के बाद वो भी टलता सा जान पड़ा तो हम फिर घर की और हो लिए!

शाम भी हो चली थी,घर के सिवा कोई और ठौर भी नहीं थी!सो हम एक बार फिर घर में!और मन में अब भी वो ही ख़याल के तनख्वाह 6000 मिली हुयी है इस बार तो,घर वालो कुछ ज्यादा मिलेगा पहले से!पर हाथ में केवल 800 !इसीलिए टलते फिर रहे थे!

माता-पिताश्री थोड़े संतोषी है,जब हमने पैसो का कुछ जिक्र नहीं किया तो उन्होंने सोच लिया के पैसे बहू को भी देगा तो भी घर में ही रहेंगे!उन्होंने ज्यादा छान-बीन नहीं करनी चाही!

अब पत्नीश्री को कैसे समझाया जाए?अब एक समय तो ऐसा आ ही जाता है जब मुसीबात सीधे गले पड़ती ही है(मेरा मतलब कुछ और नहीं है)!वो समय भी आ ही गया!उन्होंने समय अधिक ना लेते हुए सीधे मुद्दे की बात छेड़ दी!कुछ था ही नहीं देने को,पर ये कह भी नहीं सकते थे!कम से कम उनकी नजरो में तो 'कुछ' छवि थी ही हमारी,हम उसे भी धूमिल जो नहीं करना चाह रहे थे!मगर नारी और चतुराई तो साथ-2 ही रहते है!और जब चतुराई अहंकार से घुल-मिल जाए तो वो कुछ भी सोच सकती है!

हमारे बार-बार टलने से  जो उन्होंने सोचा वो उनकी एक दबी-सी जलन का हिस्सा भी लग रहा था!वो बोली-"एक बार फिर हो गए घरवालो के,वो तो तुम्हे ऐसे ही लूटेंगे सारी उम्र!लुटते रहो,मुझे क्या?मै कोंन-सा अपने लिए मांग रही थी?तुम्हारे ही घर में खर्च होने थे!मगर कौन सुने मेरी!कोई कुछ समझे तो सुने भी!जिन्हें समझते थे उनको तो दे दिए सारे पैसे!अब जब जाओगे फिर फैलाना उनके आगे हाथ!देखती हूँ  मै भी के कब हमे भी कुछ समझा जाएगा!..........."

उसका बोलना जारी था पर मुझे थोड़ी राहत सी महसूस हो रही थी!कुटिल मुस्कान होंठो पर अपने-आप थिरक गयी,कसम से अपने-आप!मै जान-बुझ कर नहीं हंसा था!मैंने बस इतना ही कहा "पागल;वो भी तो तेरी तरह बस मेरी और ही देख रहे है....."

मेरे बोलने से ज्यादा मेरी हंसी ने अधिक हवा दे दी उसकी क्रोधाग्नि को!उसका बटन जैसे फिर दब गया हो,वो तो खैर पहले से ही दबा हुआ था!उसकी शिकायते-कम-आदेश निरंतर जारी थे!जब हमे लगा के बात सच में रूठने तक पहुंचने वाली है तो हमने एक बार फिर ब्रह्माश्त्र का प्रयोग किया!

और कुछ नहीं बस अगली बार सारी तनख्वाह उसके हाथ में ही रखने की बात कह दी,साथ में अंगूठी तो अगली बार ही,फर्श वो भी चिप्स वाला आने वाले दो-चार महीनो में,बिजली की फीटिंग गर्मियों से पहले,एक बड़ा लोहे का गेट भी बोल दिया के लगवा लेंगे,और जो पिछले तीन से साल से होता आ रहा था वही हुआ!बेचारी मेरी आँखों से सपने देख जरुर रही थी पर दिमाग अपना भी लगा रही थी!


फिर तो फर्श में डिजाइन कैसा होगा,गेट का डिजाइन क्या होना चाहिए.......... उसके सुझाव आ रहे थे जी शिकायतों की जगह!हमे लगा युध्ह-विराम के संकेत मिल गए है,सो शांति से सोने की तय्यारी करने लगे!सुबह चार बजे जो निकलना था दिल्ली के लिए!

हम सोच रहे थे क्या अजीब दास्ताँ है ये भी!माताश्री सोच रही है पैसे बहू को दे दिए होंगे,बहू सास से जली जा रही ये सोच कर कि पैसे उन्हें दिए गए है!जबकि सच कुछ और ही था!चलो जो भी था,वैसे भी जिंदगी भ्रमो के सहारे ही जीये जा रहे थे!एक-दो भ्रम और सही!....
कुंवर जी,

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

अजीब दास्ताँ है ये...(हास्य-वयंग्य)

राम राम जी!
जीवन भी कई बार अजीब परिस्थितियों से दो-चार करवा देता है!और हर किसी को!मुझे तो ऐसा ही लगता है!अब कुंवर जी को ही लो,फंस गए बेचारे ऐसी ही परिस्थिति में!मजे कि बात ये कि अपने ही घर में!


पौह का महीना हो तो बताने कि आवश्यकता नहीं कि ठंड अपने चरम पर होगी!कुंवर जी के घर में थोडा उत्सव का सा माहोल बनता दिखाई दे रहा था!रविवार था,बस यही तो बात ना होगी?अरे कुंवर जी आ रहे थे दिल्ली से,अब ये मत कहना के पिछले हफ्ते भी तो आये थे!यूँ तो हर रविवार को आ ही जाते है!पर इस बार कुछ तो ख़ास है?


घर में जाकर देखा तो आँगन गाय के ताजे गोबर से लीपा हुआ था!हर तरफ साफ़-सफाई सहज ही देखी जा सकती थी!हर कोई कुंवर जी के आने की बाट जोह रहे थे!कुंवर जी की माताश्री कह रही थी, "कितने दिनों के बाद आ रहा है मेरा बेटा,पता नहीं कितनी देर और लग जायेगी,उसने तो सुबह से कुछ खाया भी नहीं होगा?"
पिताश्री:-"आ जाएगा तेरा लाडला,विलायत से नहीं आ रहा है,ये दिल्ली रही!"


अन्दर कक्ष से जो आवाज आई उस से कहानी का रहस्य खुलता सा प्रतीत हुआ,सो हमने वही  कान लगाना उचित समझा!कुंवर जी की श्रीमती जी ने कही फोन मिलाया हुआ था,आने के तो कम ही अवसर होते है,सो मिलाया ही होगा!सम्भवतः कुंवर जी की साली से बात कर रही थी वें!कह रही थी, "करनाल में तो ढाई हज़ार ही मिलते थे उनको,दिल्ली में पूरे छः हज़ार!मैंने तो पूरे सत्रह व्रत किये थे उनकी इतनी तनख्वाह करवाने के लिए!पहले तो ये कह देते थे की 'इतने' में से क्या बचाऊं?अब तो ये भी ना कहने दूंगी तेरे जीजा जी को!आने दे एक बार उनको;देखती हूँ कितनी लाज रखते है वो मेरे व्रतो की!तीन हज़ार तो मै आते ही ले लूँगी,और सालगिरह भी आने वाली है, इस बार तो सोने की अंगूठी से कम 'गिफ्ट' नहीं चलेगा........"


और अचानक ब्रेक लगने से बस झटके से क्या रुकी,कुंवर जी जैसे कितने ही यात्रियों की नींद एक झटके में ही खुल गयी!हम तो हैरान-परेशान!ये कहाँ हम?श्रीमती जी कहाँ है?इधर-उधर देखा तो पाया कि अभी तो हम बस में ही है!वो सब तो एक सपना था!


असल में जागते हुए आदमी जिन चिंताओं में घिरा रहता है, सो कर भी उन्ही चिंताओं में उलझा रहता है!प्रमुखता के आधार पर चिंताए सपना बन कर सोने के बाद भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती रहती है,कहीं ये हमे भूल ना जाए!अब कुंवर जी कि यही प्रमुखता रही होगी पिछले कई दिनों कि "कैसे पूंजी(तनख्वाह,या बची हुई तनख्वाह) का उचित वितरण किया जाए घर जाकर?"
घर वालो के,विशेषकर घरवाली कि योजनाओं का अनुमान तो हो गया था कुंवर जी को!
अब अपनी स्थिति का भी पूरा पता था हमे!
6000 रुपये वेतन है जरुर,मगर मिलता केवल 5200 रुपये ही है!बाकी कुछ हमारी वर्तमान कि सुरक्षा के नाम पर और कुछ भविष्य की सुरक्षा के नाम पर काट लिया जाता है,जाता कहा है ये तो पता नहीं,पर कटता जरुर है!

जहाँ हम रह रहे है वो दिल्ली है भाई,ससुराल नहीं जो मुफ्त में मलाई-कोफ्ता मिल जाता हो!अरे पानी भी खरीद कर पीना पड़ता है,रोटी,दाल-चावल की बात बहुत दूर रही!
और सबसे पहले "रहना"!चलने-फिरने के लिए तो बहुत जगह है,लेकिन जब थक जाये,तब?गाँव नहीं है जो किसी के भी यहाँ बैठ गए ओए कर लिया टाइम-पास!वो भी हो जाए तो रात को तो एक अपना ठिकाना चाहिए ही होता है!बहुत मिलते है दिल्ली में ठिकाने,पर उनका भी पैसा देना पड़ता है!सब मिला कर कम से कम 3000 रुपये तो तो इन्ही सब में चला गया!घर आने-जाने के में भी कम से कम एक हज़ार तो लग ही जाते है महीने भर में!अब इतनी ज्यादा पहली तनख्वाह थी ,तो दोस्तों के संग 'पार्टी' भी करनी पड़  गयी थी,8 -10 लोग एक साथ चाय पियेंगे तो खाली चाय थोड़े ही पिलाई जाती है,साथ में कुछ और हो ही जाता है!
और अब तक जो किसी से "लिया" हुआ था वो भी तो लौटाना था!
पिछली जेब से जब बटुआ निकाल कर देखा तो उसमे बचा-खुचा कर 800 रुपये मिले!

अब 6000 तनख्वाह वाले स्टेटस के लिए ही सही,अगली तनख्वाह तक जेब इतने पैसे तो होने ही चाहिए!......


सच्चाई तो ये थी हमारी,और घर....????

'सोचा घर पहुँच कर ही देखा जाएगा' और लगे देखने आकाश की और!
जैसे-जैसे बस आगे बढ़ी जा रही थी,घर आने का डर और अधिक सता रहा था!
आखिरकार घर आ ही गया!
.....
...
..
.


क्षमा चाहूँगा क़ि आगे क्या हुआ ये जानने के लिए आपको अगली पोस्ट का इन्तजार करना पड़ेगा.......
कुंवर जी,

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

डॉक्टर साहब(हास्य-वयंग्य)

बात उन दिनों की है जब कुंवर जी अपना 3 वर्षीय अभियांत्रिकी का उपाधि-पत्र  प्राप्त करने के पश्चात भी गाँव में ही समय व्यतीत कर रहे थे!कुछ दिन नौकरी भी कर ली थी,छूट गयी थी किन्ही कारणों से!तब तक स्नातक भी हो चुके थे 'अर्थशाश्त्र' जैसे विषय से!बावजूद इसके भी कुंवर जी घर पर ही समय व्यतीत कर रहे थे!बैठक में एक नीम का पेड़ पूरा दिन साथ निभाता था उन दिनों हमारा!ऐसे ही एक दोपहर हमने गौर की कि एक हमारा पुराना मित्र;जो विद्यालय में हमारे साथ ही पढता था,या यूँ कहिये कि साथ छुपा करते थे कक्षा से!तभी की मित्रता थी जो बस तब तक ही थी!

हाँ तो वो मित्र,हमने देखा के वो डॉक्टर बन गया है!हमारे अचरज का तो कोई ठौर-ठिकाना ही नहीं था! ये देख कर नहीं के वो डॉक्टर बन गया है,बल्कि ये देख कर कि वो अति-व्यस्त भी है!हर घंटे में उसके दो-तीन चक्कर लग जाते थे प्रतिदिन ही!मतलब धंधा खूब चल रहा था!कमाई भी खूब हो रही होगी!'एक वो' जिसने 10वी तो शायद कर ही ली थी जैसे-कैसे भी,वो आज गाँव का एक अति-व्यस्त डॉक्टर है और 'एक हम' जो इतनी उपाधिया प्राप्त करने के पश्चात भी गाँव में खाली बैठे है "बेरोजगार"!

                                               जब भी 'वो' अपनी साईकिल पर पता नहीं क्या गुनगुनाता हुआ हमारे सामने से गुजरता तो सांप से लोटते थे हमारी छाती पर!
                             और उस दिन तो हमसे रहा ही नहीं गया!जो खार मन में इक्कट्ठा होता जाता था इतने दिनों से, सोचा आज कुछ तो बहार निकाल ही दे!
अपनी पूरी अदाकारी झोंक दी हमने उस से बात करने में!
                                                                                                            शुक्र है के मन में जो बाते-भावनाए होती है,उनकी झलक बहार नहीं मिलती कैसे भी!ना ही उनमे से कोई विशेष प्रकार कि गंध फैलती है वातावरण में!जैसे अच्छी भावनाओं से सुगंध और बुरी से दुर्गन्ध!ऐसा होता तो किसी से बात करना ही असंभव हो जाता हमारा तो!पर शुक्र है कि ऐसा नहीं है!
     तो हमने उसे एक दिन रोक ही लिया!आँखों समस्त प्रेम उड़ेल दिया हमने,जितना हम उड़ेल सकते थे,समस्त!अब चमक तो स्वाभाविक ही आनी थी आँखों में!उसे तो ऐसा लगा होगा जैसे हमे तो इच्छित वर ही मिल गया हो उस से मिल कर!पुरानी स्मृतियों को बैसाखी बना कर बात-चीत करने के लिए खड़े हो गए हम तन कर!जितनी जलन मन में होती थी उसे देख कर,आँखों में उतना ही संतोष!

पूछने पर पता चला के बच्चे,बूढ़े,जवान,औरत और तो और जानवरों तक का इलाज वो सफलतापूर्वक कर लेता था!

अब बैसाखी कमजोर पड़ती दिखाई दी तो जो असल बात थी मन में वो निकाल ही दी उसी अदाकारी से!
                                                         
लघभग चापलूसी सी करते हुए पूछ ही लिया उसकी सफलता का राज!
अब जैसे उसकी तो दुखती हुई रग दब गयी हो जैसे!जो प्रसन्नता थी मुख-मंडल पर सब गायब!एक पुरानी दास्ताँ जो खुशियों से शुरू हुई थी,अब ग़मो कि और बढ़ चली थी!

पता लगा कुछ भी तो अलग नहीं था उसकी और हमारी स्थिति में!बस हमारे पास एक-दो उपाधियो के साथ का अनुभव था और उसके पास केवल 10वी के साथ का!

हालात एक थे,फिर ये वयस्तता कैसी?

चलती बात पर अपनी ये कुण्ठा भी हमने ख़त्म करनी चाही!अब थोडा आत्मविश्वाश भी आ रहा था हमारे अन्दर!अंततः ये भी पूछ ही लिया हमने!

अब जो जवाब आया,उसमे उस बन्दे की सारी दार्शनिकता उभर आई!

वो बोला,"कैसी वयस्तता भाई?कोई दवाई लेने मेरे पास आता ही नहीं,साईकिल पर डॉक्टर का झोला टाँगे इसलिए गाँव में घूमता रहता हूँ के कोई देख कर ही रोक ले कुछ दवाई लेने के लिए!पर कोई रोकता भी नहीं!"
बस !
अब तो जैसे मन के सारे ऋण चुकते हो गए हो!सारा अभिनय ख़त्म!सच्ची प्रसन्नता आँखों में झलक आई,एक विजयी मुस्कान होंठो पर थिरक गयी!मंतव्य पूर्ण हो चुका था अपना तो,पर उसका वाक्य जारी था!मगर अपने किस काम का!
                                                                                                     जो सुनना था सुन लिया था,संतुष्टि हो जाने पर सब व्यर्थ जान पड़ता है!सो कुछ और सुनाई ही नहीं दे रहा था!खुद के लिए जो अपमान मन में पनप रहा था कुछ कम हुआ!अब एक बात और सोची के जब वो ये जानते हुए भी कि उस से कोई दवाई नहीं लेता है फिर भी गाँव में घूमता है ये सोच कर कि आज तो कोई ले ही लेगा,तो मै क्यों अभी तक गाँव में ही पड़ा हूँ!जब करनी नौकरी ही है तो कही तलाश क्यों नहीं कि जाए?मिल भी जायेगी एक दिन!और आज मै कर रहा हूँ नौकरी!
कुंवर जी,

शनिवार, 30 जनवरी 2010

शाम कि सैर...(हास्य-वयंग्य)

उम्र बहुत अनुभव दे देती है!किसी के भी पास उसके अनुभव ही उसकी असली सम्पति बतायी गयी है!अपना तो ये अनुभव है के ओरो के अनुभव से ही हम सीख जाए तो बहुत बढ़िया है,नहीं तो.... अब अगली बात तो केवल अनुभव करने कि ही है....
                             इस मामले में हमारे आस-पास के बुजुर्ग हमारे लिए अनुभव के सागर है,हमे जब-तब उनसे मिलते रहना चाहिए!हर बार कुछ न कुछ ऐसा जरूर मिलेगा जिसके आधार पर हम वो करने से बच सकते है जो हम अनजाने में करने जा रहे थे!
गाँव में किसी बुजुर्ग ने एक बात बताई थी,जो मुझे बहुत सच्ची और अच्छी लगी!आज वही बात आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ....

.... दो विद्वान पुरुष शाम की  सैर पर निकल पड़े!विद्वान् इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि वो दोनों कुछ देर बाद ही पूरी मानवजाति के समक्ष एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करने वाले थो जो आज कि मानव-मानसिकता पर एक-दम फिट बैठता है!
संध्या समय,सूरज दिन-भर कि थकान मिटाने के लिए विदा ले चुके थे परन्तु अँधेरा अभी अपने पैर पूरी तरह से जमा नहीं पाया था!धुंधलका सा पसरा पड़ा था!राह जो गाँव से बहार जा रही थी एक दुसरे छोटे से गाँव की ओर थोड़ी शांत थी,जबकि शहर क़ी ओर जाने वाली,पूरी तरह से व्यस्त थी!तो उन विद्वान् पुरुषो ने वो शांत राह ही चुनी उस एतिहासिक शाम कि सैर के लिए!वो दोनों मेरी तरह सोचते बहुत थे,मेरी तरह!

एक कह रहा था- "आज के लोग गलत काम करते हूए डरते ही नहीं,उन्हें मानहानि होने का भी डर नहीं है,पता नहीं कैसे उनकी आत्मा उन्हें ऐसा करने देती है...."
दूसरा केवल सोचता था,उस सोच पर कुछ करने या कहने  की भी बस सोचता ही था!वो बस उसकी हाँ में हाँ में मिलाता उसके संग चला जा रहा था!
राह थोड़ी कच्ची थी,धुल भी उस पर अच्छी थी!
तभी उनके पास से एक घोड़ा-ताँगा गुजरा!धूल का एक बादल सा वहां  बन गया,अपने देश की मिट्टी की सुगंध वातावरण में तैर गयी!

लेकिन ये क्या?

आज से पहले तो कभी इस सुगंध में उन दोनों को मीठास का अनुभव नहीं हुआ था!थोडा सा गंभीर होकर सोचा तो पाया के ये तो गुड़ क़ी सुगंध है जो "धूल में फूल" का काम करती चल रही हो!गरम-गरम गुड़ की मीठी-मीठी सुगंध ने उनके अन्तर्मन तक को मीठास से भर दिया!
दोनों ने सोचा- "अब गुड़ मिल जाता तो आज शाम की सैर सफल..."
यही सोचते-2 दोनों चले जा रहे थे,धूल का बादल,जैसे उस घोड़े-ताँगे की ऐसे लोगो से सुरक्षा करने के लिए ही उसके पीछे-2 निरन्तर चला जा रहा था!
उन्हें चलते-चलते अपने से थोडा आगे कुछ पड़ा हुआ दिखाई दिया!धूल के कारण कुछ स्पष्ट नहीं हो पा रहा था!थोडा ओर निकट आने पर लगा जैसे कोई पत्थर है,थोडा ओर निकट आने पर लगा जैसे कई पत्थर इक्कठे पड़े है! गुड कि सुगंध का असर था उनके मन में अभी भी,उस पर उनकी मंद-2 चाल !उन्हें ये सोचने का समय मिल गया के ये पक्का गुड़ ही है जो उस ताँगे से गिर गया होगा!
अभी कुछ क्षण पहले ही तो गुड़ खाने की इच्छा हो रही थी ओर प्रभु की कृपा के वो सामने है!
जैसे-2 वो ओर निकट होते जा रहे थे उनकी इच्छा ओर बलवती होती जा रही थी!
पहला कुछ ज्यादा ही सोचने लगा,

..." कैसे आज गुड़ खाया जाए जबकि वो सामने ही है,भले ही वो नीचे मिट्टी मे ही क्यों न पड़ा हो? अब उठा कर खाए तो दूसरा उपहास करेगा,अभी भले ही न करे पीठ पीछे तो करेगा ही!गाँव-समाज में बतायेगा,वहां अपमान होगा,हर कोई खिल्ली उडाएगा के ये है नीचे से उठाकर गुड़ खाने वाला!"
समस्या गम्भीर,पर मन अधीर!

मन ऐसी "चीज" बना दी है भगवान् ने यदि हमे कुछ काम नहीं करना है तो उसके न करने असंख्य कारण हमे सुझा देता है,ओर यदि करना है तो उसके करने के भी असंख्य कारण हमे तुरन्त सुझा देता है!कारण ही नहीं उसे करने के तरीके भी!
                           उसको भी सुझा दिया तरीका उसके मन ने!उसने सोचा- "गिर जाता हूँ गुड़ के ऊपर,थोडा सा भोग लगा कर तुरन्त उठ जाऊँगा ,दुसरे को भी पता नहीं चल पायेगा ओर अपना मंतव्य भी निकल जाएगा!"

संभवतः ऐसे अनुभव के ऊपर ही कहा गया है के"जिन खोजा,तिन पाइया "

उसने अपने पैर आपस में ही उलझाए,कुछ लडखडाया ओर गिर पड़ा गुड़ के ठीक बगल में!इस से पहले दूसरा उसे उठाने क़ी सोचता वो अपना लक्ष्य पा चुका था,जो कुछ भी नीचे पड़ा था उसे खा चुका था!
अब वो अत्यन्त स्फूर्ति से उठता है,
अपने वस्त्रो पर से मिट्टी  झाड़ता हुआ संतोषी लहजे में दूसरे को कहता है-"भगवान् का शुक्र है के धसने से बच गए,नीचे घोड़े क़ी लीद पड़ी थी!"
दूसरा थोड़े आश्चर्य के साथ-"अच्छा; मै तो इसे गुड़ समझ रहा था!  
ओर दोनों फिर शाम क़ी सैर पर चल पड़ते है हाल-फिलहाल पर विचार-विमर्श करते हूए!

                                       मै सोचता हूँ के आज हम सभी(कम से कम मै तो) ऐसे ही चोरी-छुपे गिर कर लीद तो खा जायेंगे पर ओरो को दिखने के लिए तुरन्त अपने कपडे भी झाड लेंगे ये कहते हुए क़ि "शुक्र है धंसे नहीं"

एक कारण ये भी है मेरा केवल सोचने-2 का,काम से बचने का भी कहा जा सकता है!जो भी हो मुझे संतोष है क़ि मै गिर कर धंसने से बचने की बजाये गिरता ही नहीं,अब गिरने के लिए भी कुछ करना पड़ेगा ओर 'करना' मुझे थोडा कम पसंद है!
कुंवर जी,

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