आज बस एक प्रशन जिससे मै अकेला जूझता रहता हूँ!
"क्या हमारा अपना इतना सामर्थ्य है कि हम परमात्मा की दी हुई प्रेरणा को अस्वीकृत कर दे,उसे औचित्यहीन घोषित कर दे,बिना उसकी सहमती या आज्ञा के.....?"
मै मानता हूँ कि 'शब्द' 'विचार' को अक्षरशः प्रस्तुत करने में असफल ही होते है और फिर उन असफल शब्दों से जो विचार बनेंगे क्या वो सफल सिद्ध होंगे.....?नहीं जानता....
तत्पश्चात भी मेरे विचारों के अधिकतम समीप जो शब्द मुझे जान पड़े वही आपके हवाले कर रहा हूँ...आज...!
जो कुछ भी आपके मस्तिष्क में चले इसे पढ़कर कृपया अवश्य अवगत कराये सभी को....क्या पता आपके बहाने किस को क्या मिल जाए........
जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,
कैसे न भागे सबकुछ छोड़...
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गोविन्द जो खींचे अपनी ओर
कैसे न भागे सब कुछ छोड़.
न दिखे फिर निशा और न भोर
दिखे तो बस एक कोमल डोर.
कभी शून्य चेतन,कभी भावविभोर
उनसे रिश्ता निभाने चली,बाक...
6 दिन पहले






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