शुक्रवार, 21 मई 2010

माँ के ख़यालात में....(कुंवर जी)

हँसता-गाता,
खेलता-खाता,रोता-नहाता,
रूठता-मनाता
भी मै शायद अधुरा ही होता हूँ!

आंसुओ के अहातो में
दुखो के अखाड़ो में,
मुश्किलों के पहाडो में
अपनों के मेलो में
परायो के झमेलों में,
भी शायद मै अधूरा ही होता हूँ!

माँ के ख़यालात में,
और जब कलम होती है हाथ में

तो ही मै पूरा होता हूँ!
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,







18 टिप्‍पणियां:

  1. मां के खयालात में और जब कलम होती है हाथ में.....
    बहुत खूब !

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  2. waah bahut khoobsoorat vichaar hain...sach hai maan sath na ho to sab adhura hi hota hai...

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  3. सादर वन्दे !
    माँ के लिए आपके ये शब्द अक्षरश सही हैं! यह मेरी तरफ से ....
    ये हमारे लाख दुःख सहती है
    लेकिन फिर भी चुप रहती है
    और भले दुश्मन हो जाएँ
    माँ तो लेकिन माँ रहती है |
    रत्नेश त्रिपाठी

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  4. हरदीप आखिरी पंक्तिया तो बिलकुल लाजवाब हैं और याद आया एक पुराना दोहा सा :-

    " गीत गजले खूब कही , मिला बहुत सम्मान !
    इसमें मेरा कुछ नहीं बस माँ का हैं वरदान ! "

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  5. सही कहा....तभी इन्सान पूरा होता है!!

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  6. मन में अब अभिलाषा एक ,
    चाहे मिले जन्म अनेक |
    गोंद तुम्हारी , प्यार तुम्हारा ,
    आँचल का हो सार तुम्हारा |

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  7. वाह !! कुंवर जी ........गजब की रचना है ..........बहुत खूब

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  8. बहुत भावपूर्ण उदगार...बहुत खूब !

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  9. बिलकुल ठीक कहा
    सारा चैन शुकुन उसके प्यार में ही मिलता हैं
    हम चाहे कितने भी बड़े हो जाये पर उनके लिए हमेशा बच्चे ही रहते हैं .

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  10. माँ के ख्यालात में
    और जब कलम होती है हाथ में
    तभी मैं पूरा होता हूँ.

    -सुन्दर.

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  11. माँ का आँचल और कलम का सहारा... बहुत सुन्दर कुंवर जी. सम्पूर्णता कि सम्पूर्ण व्याख्या कर दी आपने..

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  12. आपने मुझे भी याद दिला दी कुँवर जी..

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  13. आप सभी का हार्दिक धन्यवाद है जी.....

    कुंवर जी,

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