खेलता-खाता,रोता-नहाता,
रूठता-मनाता
भी मै शायद अधुरा ही होता हूँ!
आंसुओ के अहातो में
दुखो के अखाड़ो में,
मुश्किलों के पहाडो में
अपनों के मेलो में
परायो के झमेलों में,
अपनों के मेलो में
परायो के झमेलों में,
भी शायद मै अधूरा ही होता हूँ!
माँ के ख़यालात में,
और जब कलम होती है हाथ में
तो ही मै पूरा होता हूँ!
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,







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