मंगलवार, 22 जून 2010

मेरा पिघलना अभी बाकी है....

ये कविता
यहाँ 
जब मैंने पढ़ी तो जो ख्याल मन में आये वो ये थे....

मेरा पिघलना अभी बाकी है,

तो भला क्या समझूंगा
यूँ नदी की तरह बहने की बाते,
भांप बन बन कर उड़ने की बाते,
बर्फ से बादल होने की बाते,


इस बारे में आपके के क्या ख्याल है...बताएँगे....

जय हिन्द,जय श्री राम.
कुंवर जी,

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