पहले तो मौन और फिर पण्डित जी को पढ़ा तो मन जो विचार उठे वो ही आज आपके समक्ष है.....
सब खुद से ही बोल रहे है,
अपमे मन को टटोल रहे है.....
अन्दर ही अन्दर खुद को तोल रहे है,
लगा अपनी आत्मा का मोल रहे है,
ऐसे में भला ओरो से बोले कौन....
शायद इसलिए है सारे मौन...
सभा सारी आपस में नजरे चुराए,
तिनका दाढ़ी में जान सब दाढ़ी खुजाये,
हमाम में सब नंगे पर्दा कौन हटाये,
इन्सानियत शायद जिन्दा है सो सब शर्माए,
धरती तो फट जाए पर समाये कौन,
शायद इसीलिए है सारे मौन...
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,
कैसे न भागे सबकुछ छोड़...
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गोविन्द जो खींचे अपनी ओर
कैसे न भागे सब कुछ छोड़.
न दिखे फिर निशा और न भोर
दिखे तो बस एक कोमल डोर.
कभी शून्य चेतन,कभी भावविभोर
उनसे रिश्ता निभाने चली,बाक...
6 दिन पहले






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