बैलगाड़ी धेरे-धीरे टुमक-टुमक चल रही थी जी!अब वो तो बैलगाड़ी थी ऐसे ही चलनी थी!जितने यात्री उसमे बैठे वो बोर भी नहीं हो रहे थे,सभी को आदत थी उसमे सफ़र करने की!
उनमे एक भाई साहब कुछ अलग से दिख रहे थे!सौभाग्य से या दुर्भाग्य से घडी केवल उन्ही के पास थी वहाँ!किसी ने पूछ लिया कि समय क्या हुआ है?
उन्होंने घडी में देखा,बोले दो बजने वाले है!
उस बैलगाड़ी में कोई कही से सवार था कोई कहीं से!आपस में इतना परिचय भी नहीं था!और वो धीरे-धीरे टुमक-टुमक चल रही थी!
काफी देर बाद उस घडी भाई साहब से किसी ने फिर समय पूछ लिया!अबकी बार उनकी व्यक्तिगत समस्याओं का असर उनके चेहरे पर नजर साफ़ आया!उन्होंने घडी में देखा और बोले दो बजने वाले है!
सुनने वाले को अजीब तो लगा पर वो कुछ कह नहीं पाया!शायद शीष्ट्ता आड़े आ रही थी उनकी!
पर घडी भाई साहब अपने व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों में ही फसे पड़े थे अब भी!उन्हें नहीं पता वो क्या कह रहे है!उन पर कोई असर ही नहीं!
और बैलगाड़ी पर तो खैर क्या फर्क पड़ना था इस बात का!वो तो धीरे-धीरे टुमक-टुमक चल ही रही थी!
अब वो सभी अनजान थे और सभी पुरुष,सो एक-दूसरे से कोई ज्यादा बात-चीत भी नहीं हो रही थी उनके बीच!अब फिर किसी ने समय पूछ लिया उन घडी भाई साहब से!
पहले तो उसने समय पूछने वाले को लगभग घूरा,फिर अचानक उस पर कृपा करते हुए घडी को देखा और बोला-"दो बजने वाले है!"
अबकी बार सभी घडी भाई साहब को एक-टक देखने लगे!इस पर उसकी सोच में भी जैसे किसी ने 'ठहरे हुए पानी में पत्थर सा मार दिया हो'वाला काम कर दिया!उन्हें लगा कि शायद कहीं कुछ गलत है!उन्होंने घडी को देखा वो सच में दो बजाने ही वाली थी!
अब उसने सोचा,घडी जब घर से चला तो ठीक थी,शायद अब खराब हो गयी होगी!लेकिन उसे पिछली दो-तीन बार समय पूछने वाली बात भी स्मरण हो आई थी!अब वो मन ही मन लज्जित तो हो रहा था पर और किसी को इस बात का पता ना चले ये भी चाह रहा था!
दुसरे लोग भी इस बात को भांप चुके थे!उनमे से किसी एक ने शिष्टता के घूघट को थोडा उघाड़ते हुए,हिम्मत कर के कह ही दिया."भाई साहब,पिछले ढाई घंटे से दो नहीं बजे क्या?"
अब तो घडी भाई साहब को जैसे सांप सूंघ गया हो!एक दम तो कुछ नहीं बोले!पर शायद हरियाणे के थे!तुरन्त-बुद्धि उन्हें कहा जाता है!
हर बात का जवाब वो अपने हिसाब से ही देते है!अब घडी खराब है,ये स्वीकार कर लिया तो जो घडी होने का रौब वो अब तक अप्रत्यक्ष रूप से जमा रहे थे,सब ख़त्म!अब वो भी बचाना था और इज्ज़त भी!
वो शान से बोले-"रै बावले,या मर्द की जुबान सै, जो एक बै कह दिया सो कह दिया,मिनट-मिनट पै ना बदलेगी!"
सभी कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र तो थे,पर क्यों खामख्वाह में बुराई ले,ये सोच कर चुप भी थे!इस से बैल गाडी पर भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा था!वो तो अब भी यूँ ही धीरे-धीरे टुमक-टुमक चल ही रही थी!
अपनी बात कहने के लिए एक पुरानी बात को अपने हिसाब से प्रस्तुत किया है!आशा है आप मेरे इस असफल प्रयास को समझने की सफल कोशिश करेंगे!
जय हिन्द,जय श्री राम,
कुंवर जी,
कैसे न भागे सबकुछ छोड़...
-
गोविन्द जो खींचे अपनी ओर
कैसे न भागे सब कुछ छोड़.
न दिखे फिर निशा और न भोर
दिखे तो बस एक कोमल डोर.
कभी शून्य चेतन,कभी भावविभोर
उनसे रिश्ता निभाने चली,बाक...
6 दिन पहले






13 टिप्पणियाँ: