गुरुवार, 27 मई 2010

ओ कान्हा के देस को जाने वाले...(अरज)

ओ कान्हा के देस को जाने वाले...
उसके संग बोल-बतलाने वाले...
उसे अपने संग हंसाने-रुलाने वाले...
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!


शब्दों के अर्थ करने में ही जो उलझा हुआ है...
अपनी नज़रो में ही जो सुलझा हुआ है...
पुष्प खिलने से पहले ही उसका मुरझा हुआ है...
उस मुर्ख को तुम समझा देना...
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!



हम-तुम सब एक है क्या होगा ये जान के...
चलना पड़े तुम्हे चाहे विरूद्ध विधान के...
पार पहुंचा ही दो उसे अनुमान के...
तुम उस से जुदा ही कहा हो बस ये दिखा देना...
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!


वो नादान अनजान तुच्छ धूलि-समान सही...
अभी तक भले ही ढोया  हो उसने अज्ञान सही....
अभी उसके मन में आया कोई और अरमान नहीं...
धुल से धरती तक का सफ़र उसे करा देना....
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!












जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

28 टिप्‍पणियां:

  1. ओ पथिक संभलकर जइयो उस देश
    महा ठग बैठ्यो है धार ग्वाल को भेष
    टेढ़ी टेढ़ी चाल चले,अरु चितवन है टेढ़ी वांकी
    टेढ़ी हाथ धारी टेढ़ी तान सुनावे बांसुरी वांकी
    तन कारो धार्यो अम्बर पीत,गावे मधुर गीत
    बातन बतरावे मधुर मधुर क्षण माहि बने मीत
    सारो भेद खोल्यो मैं तेरे आगे,पहचान बतरायी है
    अमित मन हर लेत वो ऐसो ठग जग भरमाई है

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  2. ओ देशभक्त संभलर कदम बढ़ाईयों
    सेकुलर आतंकवादी घात लगाए बैठयो ए मानवाधिकार का चोला ओड़ के
    अति उतम रचना पर बधाई

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  3. उत्तम रचना .. कान्हा के माध्यम से आपका आह्वान प्रशंसनीय है ...
    लाजवाब लिखा है ...

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  4. उत्तम रचना .. कान्हा के माध्यम से आपका आह्वान प्रशंसनीय है .

    उत्तर देंहटाएं
  5. @अमित भाई साहब-

    "भेस बता दिया आपने किया ये उपकार....

    उतना ही पहचानूँगा जितने है मेरे सत्कार.."

    अमित भाई आपकी कविताई अनुपम है.....और ये तुरन्त बनने वाली तो गजब....आपकी भी काफी जान-पहचान लगती है उस ठग से.....

    कुंवर जी,

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  6. @सुनील जी-चेताने के लिए धन्यवाद है जी,

    @नासवा जी,@माधव जी-आपका भी धन्यवाद है जी....

    कुंवर जी,

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  7. आपकी और अमित भाई, दोनों की बहुत ही अद्भुद और प्रेम रस में सरोबार रचनाएँ.

    मैं तो वैसे ही इस रस का कायल हूँ. छक कर रसपान किया मैंने.

    बहुत खूब!

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  8. अरज सुनते सुनाते बहुत सी बात कान्हा से कह दीं...अच्छी रचना

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  9. आपकी कविता ने गोपियों का उद्धव से सम्वाद याद दिला दिया..

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  10. अति सुन्दर रचना ..
    हम-तुम सब एक है क्या होगा ये जान के...
    चलना पड़े तुम्हे चाहे विरूद्ध विधान के...

    सुन्दर पंक्तियाँ !

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  11. कुंवरजी जान पहचान तो जन्म जन्म कि है और इस जन्म में भी बचपन से अपनी सेवा-पूजा संभला रखी है इस ठग ने. वोह तो किशोरीजी(श्रीराधाजी) कि कृपा है नहीं तो यह ठग ना जाने क्या दुर्गत बना डाले . आपकी वृन्दावन यात्रा निर्विघ्न हो और यह ठग आपको भी ठगे यही मंगल कामना किशोरीजी से है .

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  12. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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  13. कुंवरजी आप खुद तो बढ़िया लिखते ही हैं पर दुसरे लेखकों के लिए उत्प्रेरक का कार्य भी करते हैं. आपने हमें अमित जैसा एक कवि दे दिया. आपका बहुत ही धन्यवाद.

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  14. बहुत भावात्मक प्रस्तुति . कृष्ण जी रो पड़े शायद की टिपण्णी में मुझे क्यों विलेन सा बनाया जा रहा हैं .

    यही तो हैं वो भाव जो कृष्ण लिखवाता हैं , जो राधा जी के मन में उठता हैं और मेरे जैसे कृतघ्न जिस पर अपना नाम डालकर नम्बर बनता हैं .
    कैसे कहू कि कृष्ण कितना तबाह हो चुका हैं सिर्फ सबकी मदद करते करते . वही हैं जो सब सहकर भी हौसला नहीं टूटने नहीं डे रहा हैं .
    कभी सूरदास कि अंधी आँखों से दिख जाने वाला अब सूरज की रौशनी में भी छप गया हैं .

    इसी विषय पर एक कविता पहले लिखी थी पर पोस्ट नहीं की . अब आज आपकी इसी पोस्ट को अग्रणी रखकर ये पोस्ट लिख डाली
    http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_27.html

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  15. शब्दों के अर्थ करने में ही जो उलझा हुआ है...
    अपनी नज़रो में ही जो सुलझा हुआ है...
    पुष्प खिलने से पहले ही उसका मुरझा हुआ है...
    उस मुर्ख को तुम समझा देना...

    is padya se prerit huaa. doosari pankti ne mujhe mahsoos karayaa ki swayam ko suljhaa hua samjhnaa moorkhtaa hai. vinamrataa ke saath aapne mujhe darpan dikhaayaa --- aabhaarii hun.

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  16. ओ रे पथिकावा
    नत जइयो तू
    वृन्दावन की ओर
    मत जइयो तू
    वृन्दावन की ओर

    बस जो वहाँ गया वहीँ का हो गया ........यही तो उसकी सबसे बड़ी खासियत है .............अमित जी और आपके दोनों के के ही भाव अति उत्तम हैं.

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  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  18. @वंदना जी-आपका स्वागत है जी,@पाण्डेय जी,@शाहनवाज भाई-असल में मेरी भावनाए केवल अनुमानों पर आधारित थी सो मेरे शब्द भी उन्हें इतना मजबूत नहीं कर पा रहे थे,तो अमित भाई साहब ने उस कमी को दूर कर दिया अपनी रसधारा बहा कर...वो तो कवी है ही जी...एक अच्छा इंसान क्या नहीं हो सकता जी किसी और के भले के लिए.....

    अब पता नहीं वो हमें वही रखेगा या नहीं...बस उस लायक ही बना दे......

    कुंवर जी,

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  19. धुल से धरती तक का सफ़र उसे करा देना....
    एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!


    बहुत खूब

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  20. "देखो भिखारी आया मोहन तेरी गली में
    श्रधा के फूल लाया मोहन तेरी गली में "

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  21. आप सब ने अपनी श्रद्धा यहाँ प्रकट कर मुझमे जो आस्था का प्रवाह किया है उसके लिए मै आप सब का ऋणी रहा...मुझे नहीं पता कभी मै इस ऋण से मुक्त हो भी पाऊंगा या नहीं....मेरी अल्पबुद्धि में जो आया वही बताया....अभी तो मै आप सब का मेरे भावो को समझने के लिए धन्यवाद भी नहीं कर पा रहा हूँ!

    @प्रतुल जी-ये सब तो अपने आप लिखा गया जी,असल मेरी यही स्थिति है आजकल,इसे आप अपने से जोड़ रहे है तो ये आपका बड़प्पन ही तो है...आप खामख्वाह ही मुझे श्रेय देने की कृपा कर रहे हो...अभी मै स्वयं दर्पण नहीं देख पाया हूँ,किसी और को तो भला क्या दिखाऊंगा....

    आपका सानिध्य मुझे सकारात्मक उर्जा देता महसूस हो रहा है...

    @सर जी-नम्बर के चक्करों में तो हम उलझे हुए है जी,

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  22. kunwar jii
    same to same.
    lekhan karne ke baad lekhak pathak ban kar hii rah jaataa hai.

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  23. ab sahi hai, kaphi dino baad kuch bahurupta ka abhas ho raha hai

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  24. ओ कान्हा के देस को जाने वाले...
    उसके संग बोल-बतलाने वाले...
    उसे अपने संग हंसाने-रुलाने वाले...
    एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!


    बहुत सुंदर.....!!

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  25. "मो सम कौन ? ने कहा…भाई कुंवर जी,
    इत्ती बढ़िया अरज लिखी है, अपीलकर्ता में हमारा भी नाम जोड़ लो।
    अब मेहनत करो आप, और नाम हम भी लिखवा रहे हैं प्रार्थियों में, बात गलत लगे हमारी तो ’मुझको राणा जी माफ़ करना, भूल म्हारे से हो गई।’"

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  26. मन को छू लेने वाली रचना...
    जय श्रीकृष्णा ...

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