गुरुवार, 18 मार्च 2010

अब तो जागो...(कविता)

एक जाती,
एक थाती,
पाती एक क्यों नहीं,
सब रहे जाग,
है एक आग,
राग एक क्यों नहीं?
इष्ट एक,
अभीष्ट एक,
शीष्ट एक क्यों नहीं?
जोश एक,
रोष एक,
होश एक क्यों नहीं?
     क्यों नहीं मंथन यहीं,
                                          सही और कुछ नहीं!
                                                कुंवर जी,

12 टिप्‍पणियां:

  1. कितनी ख़ूबसूरती से एकता का सन्देश दिया है आपने , पढ़कर स्तब्ध हूँ .. keep it up ...

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  2. "स्तब्ध हो" कुछ गलती हो गयी क्या भाई साहब...

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  3. सुन्दर सन्देश देती रचना शुभकामनायें

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  4. आपके सहयोग के लिए मै आपका आभारी हूँ!
    मै आशा कर सकता हूँ के ये स्नेहाशीष सदैव मिलता रहेगा..
    कुंवर जी,

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  5. सुन्दर भावपूर्ण रचना..बधाई.

    _________________
    "शब्द-शिखर" पर - हिन्दी की तलाश जारी है

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  6. कुंवर जी , पहले तो इस कविता के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें
    और एक खुश खबरी भी है जमाल साहब ने बायपास सर्जरी करवाली है

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  7. एहसास की यह अभिव्यक्ति बहुत खूब

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