अभी मै गिरा कहाँ हूँ,
बस गिरने वाला हूँ,,,,,,,,,,,
अभी तो ना दुत्कारो मुझे,उपेक्षित भी ना करो,
पास आने दो मुझे और मेरे पास आते भी ना डरो,
अभी तो निर्दोष हूँ,सच्चे-झूठे दोष भी ना धरो,
अच्छा-बुरा सोच कर अब भी डरता हूँ मै,
पाप के डर से ही कई पुण्य भी तो नहीं करता हूँ मैं,
तुम तो पाक-साफ़ रह लो,अन्दर ही अन्दर रोज तो मरता हूँ मैं,
एक के दो करने के चक्कर में अभी घिरा कहाँ हूँ,
बस घिरने वाला हूँ!
अभी तो धोखा दिया कहाँ मैंने,बस खाए है,
अपनों को ही नहीं लूट पाया,बहुत दूर पराये है,
अँधेरे में हूँ,बस मै हूँ,नहीं पास कोई सायें है,
अभी तो हंसी ही है हंसी में मेरी,
सच में बेबस हो जाता हूँ बेबसी में मेरी,
दिख जाती है सूरत मुझे हर किसी में मेरी,
जो तुमने सोच लिया वो अभी किया कहाँ हैं,
बस करने वाला हूँ!
अभी मै गिरा कहाँ हूँ,
बस गिरने वाला हूँ,,,,,,,,,,,
कुंवर जी,
कैसे न भागे सबकुछ छोड़...
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गोविन्द जो खींचे अपनी ओर
कैसे न भागे सब कुछ छोड़.
न दिखे फिर निशा और न भोर
दिखे तो बस एक कोमल डोर.
कभी शून्य चेतन,कभी भावविभोर
उनसे रिश्ता निभाने चली,बाक...
1 सप्ताह पहले







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