जेठ के महीने जब
थक जाती है आँखें
बादल कि राह देख-देख,
तब तक आस भी
सब्र में तब्दील हो चुकी होती है!
पर आसमान पर ही टिकी रहती है
वो थकी आँखें!
तभी दिखाई दे कोई
उमड़ती-घुमड़ती घटा,
और छा जाए,
इक पल में पूरे नभ पे,
सूरज भी नहीं होता ऐसे पलों में,
जो कुछ पल पहले ही
अकड रहा होता था!
और ठंडक उस बादल की छाँव की
अभी ठण्डी भी ना कर पायी हो
बरसात कि आस में
वो सुलगती आँखें!
तभी एक तेज आंधी आये
और पल में
उस घटा को संग ले जाए,
और
तरसती रह जाए
फिर से
वो तरसती आँखें.....
तो...
फर्क तो पड़ता ही है....
कुंवर जी,







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