उम्र बहुत अनुभव दे देती है!किसी के भी पास उसके अनुभव ही उसकी असली सम्पति बतायी गयी है!अपना तो ये अनुभव है के ओरो के अनुभव से ही हम सीख जाए तो बहुत बढ़िया है,नहीं तो.... अब अगली बात तो केवल अनुभव करने कि ही है....
इस मामले में हमारे आस-पास के बुजुर्ग हमारे लिए अनुभव के सागर है,हमे जब-तब उनसे मिलते रहना चाहिए!हर बार कुछ न कुछ ऐसा जरूर मिलेगा जिसके आधार पर हम वो करने से बच सकते है जो हम अनजाने में करने जा रहे थे!
गाँव में किसी बुजुर्ग ने एक बात बताई थी,जो मुझे बहुत सच्ची और अच्छी लगी!आज वही बात आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ....
.... दो विद्वान पुरुष शाम की सैर पर निकल पड़े!विद्वान् इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि वो दोनों कुछ देर बाद ही पूरी मानवजाति के समक्ष एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करने वाले थो जो आज कि मानव-मानसिकता पर एक-दम फिट बैठता है!
संध्या समय,सूरज दिन-भर कि थकान मिटाने के लिए विदा ले चुके थे परन्तु अँधेरा अभी अपने पैर पूरी तरह से जमा नहीं पाया था!धुंधलका सा पसरा पड़ा था!राह जो गाँव से बहार जा रही थी एक दुसरे छोटे से गाँव की ओर थोड़ी शांत थी,जबकि शहर क़ी ओर जाने वाली,पूरी तरह से व्यस्त थी!तो उन विद्वान् पुरुषो ने वो शांत राह ही चुनी उस एतिहासिक शाम कि सैर के लिए!वो दोनों मेरी तरह सोचते बहुत थे,मेरी तरह!
एक कह रहा था- "आज के लोग गलत काम करते हूए डरते ही नहीं,उन्हें मानहानि होने का भी डर नहीं है,पता नहीं कैसे उनकी आत्मा उन्हें ऐसा करने देती है...."
दूसरा केवल सोचता था,उस सोच पर कुछ करने या कहने की भी बस सोचता ही था!वो बस उसकी हाँ में हाँ में मिलाता उसके संग चला जा रहा था!
राह थोड़ी कच्ची थी,धुल भी उस पर अच्छी थी!
तभी उनके पास से एक घोड़ा-ताँगा गुजरा!धूल का एक बादल सा वहां बन गया,अपने देश की मिट्टी की सुगंध वातावरण में तैर गयी!
लेकिन ये क्या?
आज से पहले तो कभी इस सुगंध में उन दोनों को मीठास का अनुभव नहीं हुआ था!थोडा सा गंभीर होकर सोचा तो पाया के ये तो गुड़ क़ी सुगंध है जो "धूल में फूल" का काम करती चल रही हो!गरम-गरम गुड़ की मीठी-मीठी सुगंध ने उनके अन्तर्मन तक को मीठास से भर दिया!
दोनों ने सोचा- "अब गुड़ मिल जाता तो आज शाम की सैर सफल..."
यही सोचते-2 दोनों चले जा रहे थे,धूल का बादल,जैसे उस घोड़े-ताँगे की ऐसे लोगो से सुरक्षा करने के लिए ही उसके पीछे-2 निरन्तर चला जा रहा था!
उन्हें चलते-चलते अपने से थोडा आगे कुछ पड़ा हुआ दिखाई दिया!धूल के कारण कुछ स्पष्ट नहीं हो पा रहा था!थोडा ओर निकट आने पर लगा जैसे कोई पत्थर है,थोडा ओर निकट आने पर लगा जैसे कई पत्थर इक्कठे पड़े है! गुड कि सुगंध का असर था उनके मन में अभी भी,उस पर उनकी मंद-2 चाल !उन्हें ये सोचने का समय मिल गया के ये पक्का गुड़ ही है जो उस ताँगे से गिर गया होगा!
अभी कुछ क्षण पहले ही तो गुड़ खाने की इच्छा हो रही थी ओर प्रभु की कृपा के वो सामने है!
जैसे-2 वो ओर निकट होते जा रहे थे उनकी इच्छा ओर बलवती होती जा रही थी!
पहला कुछ ज्यादा ही सोचने लगा,
..." कैसे आज गुड़ खाया जाए जबकि वो सामने ही है,भले ही वो नीचे मिट्टी मे ही क्यों न पड़ा हो? अब उठा कर खाए तो दूसरा उपहास करेगा,अभी भले ही न करे पीठ पीछे तो करेगा ही!गाँव-समाज में बतायेगा,वहां अपमान होगा,हर कोई खिल्ली उडाएगा के ये है नीचे से उठाकर गुड़ खाने वाला!"
समस्या गम्भीर,पर मन अधीर!
मन ऐसी "चीज" बना दी है भगवान् ने यदि हमे कुछ काम नहीं करना है तो उसके न करने असंख्य कारण हमे सुझा देता है,ओर यदि करना है तो उसके करने के भी असंख्य कारण हमे तुरन्त सुझा देता है!कारण ही नहीं उसे करने के तरीके भी!
उसको भी सुझा दिया तरीका उसके मन ने!उसने सोचा- "गिर जाता हूँ गुड़ के ऊपर,थोडा सा भोग लगा कर तुरन्त उठ जाऊँगा ,दुसरे को भी पता नहीं चल पायेगा ओर अपना मंतव्य भी निकल जाएगा!"
संभवतः ऐसे अनुभव के ऊपर ही कहा गया है के"जिन खोजा,तिन पाइया "
उसने अपने पैर आपस में ही उलझाए,कुछ लडखडाया ओर गिर पड़ा गुड़ के ठीक बगल में!इस से पहले दूसरा उसे उठाने क़ी सोचता वो अपना लक्ष्य पा चुका था,जो कुछ भी नीचे पड़ा था उसे खा चुका था!
अब वो अत्यन्त स्फूर्ति से उठता है,
अपने वस्त्रो पर से मिट्टी झाड़ता हुआ संतोषी लहजे में दूसरे को कहता है-"भगवान् का शुक्र है के धसने से बच गए,नीचे घोड़े क़ी लीद पड़ी थी!"
दूसरा थोड़े आश्चर्य के साथ-"अच्छा; मै तो इसे गुड़ समझ रहा था!
ओर दोनों फिर शाम क़ी सैर पर चल पड़ते है हाल-फिलहाल पर विचार-विमर्श करते हूए!
मै सोचता हूँ के आज हम सभी(कम से कम मै तो) ऐसे ही चोरी-छुपे गिर कर लीद तो खा जायेंगे पर ओरो को दिखने के लिए तुरन्त अपने कपडे भी झाड लेंगे ये कहते हुए क़ि "शुक्र है धंसे नहीं"
एक कारण ये भी है मेरा केवल सोचने-2 का,काम से बचने का भी कहा जा सकता है!जो भी हो मुझे संतोष है क़ि मै गिर कर धंसने से बचने की बजाये गिरता ही नहीं,अब गिरने के लिए भी कुछ करना पड़ेगा ओर 'करना' मुझे थोडा कम पसंद है!
कुंवर जी,
कैसे न भागे सबकुछ छोड़...
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गोविन्द जो खींचे अपनी ओर
कैसे न भागे सब कुछ छोड़.
न दिखे फिर निशा और न भोर
दिखे तो बस एक कोमल डोर.
कभी शून्य चेतन,कभी भावविभोर
उनसे रिश्ता निभाने चली,बाक...
6 दिन पहले






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