गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

जिन्दगी दौड़ रही है,तेज बहुत तेज...

जिन्दगी दौड़ रही है,तेज बहुत तेज...
हमको वही दूर कहीं छोड़...तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये!


भाव सारे है यहाँ,कुछ कम कुछ ज्यादा....
बस कुछ को कुछ के ऊपर ओढ़...तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये....


सपने दिखाती है,आँखे खुल भी जाती है कभी,
कभी सपनो को कभी हमें तोड़...तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये....


मै साथ तो हूँ इसके,यही सोचता हूँ अधिकतर मै,
पर उसी पल मुझे झिंझोड़... तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये...

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

हम हिन्दू है या मुसलमान है,यदि इंसान है तो क्या हम ऐसा करते है...?(कुंवर जी)

आजकल विवाहों के उत्सव का माहौल है हर तरफ!ना चाहते हुए भी जाना पड़ रहा है बहुत सी जगह तो!किन्तु इस बार हर जाने पर एक विचार जो मन में कुलबुलाने लगता है,या यूँ कहे कि कुलबुलाता रहता है!
मै सोच रहा हूँ कि जब भी हम किसी के ऐसे उत्सव(बड़े या छोटे) में शामिल होते है,तो क्या हम हर बार उस उत्सव के सफल होने कि कामना करते है?

कई बार हमें किसी के मरणोपरांत उनके परिवार से मिलने जाते है,तो क्या हम दिल से एक बार भी स्वर्गीय आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना करते है?

किसी विवाहोत्सव में शामिल को होने पर क्या हम उस विवाह समारोह के शांतिपूर्ण सफल होने ओर उन दोनों का जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होने की प्रार्थना करते है!

किसी रोगी या दुखी से मिलते है या सोचते है तो क्या उसके रोग और कष्टों के निवारण की प्रार्थना हम परमात्मा से करते है?

किसी दरिद्र को देखने पर या उसे कुछ देते समय उसकी दरिद्रता समाप्त करने की प्रार्थना हम परमात्मा से करते है?

क्या हम दिल से किसी परिचित अथवा अपरिचित के दुःख या सुख में भागीदार बनते है...???
आज बस यही......

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 10 जनवरी 2011

साँसों पर जोर नहीं था सो चल रही थी.....

सर्द रात और गहराती जा रही थी,
पलके थी कि झपकना भी भूल गयी!
साँसों पर जोर नहीं था सो चल रही थी.....

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शनिवार, 8 जनवरी 2011

ईंट,पत्थर,कंकड़ और तिनको से भी बच्चा खेलता है...

कौन कहता है कि हंसी में रोना नहीं होता,
जरा उनसे तो पूछो जिनके पास सूना सा कोई कोना नहीं होता!

ईंट,पत्थर,कंकड़ और तिनको से भी बच्चा खेलता  है,
जिस के पास खेलने को कोई खिलौना नहीं होता!

 घास मिली तो सही नहीं तो जमीन पर ही सो गया,
जिसके पास बिछाने को कोई बिछौना नहीं होता!

जिन्दगी को जी कर तो हम भी देखते कभी ना कभी,
जो जिन्दगी भर दुखो को यूँ ही ढोना ना होता!

मन की प्यास बुझाते आँख के पानी से ही हम,
जो किस्मत पे अपनी हमें कभी रोना ना होता!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शनिवार, 1 जनवरी 2011

जब सुख तक चला गया तो इस दुःख की तो क्या औकात है!

अरे!बस थोड़े से दिनों की तो ओर बात है,
 देखो साल बदला है.....
तो हाल क्यों नहीं बदलेगा!
जब सुख तक चला गया तो इस दुःख की तो क्या औकात है!
रोशनिया तक खो जाती है तो
परछाइयों की क्या बिसात है!
सच मे;आँखे खोलो,
वो निशा तो गुजर चुकी,
हो गयी नव प्रभात है!

आओ हम सब मिल कर इस सूर्य-गति-आधारित नव वर्ष का अभिनन्दन करे....
जो कुछ भी हम अपने लिए अच्छा सोच सकते है वो ही सबके लिए सोचे....
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

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