हिन्दू होकर हिन्दू दिखने में जो शर्माता है...
बाप के खून और माँ के दूध को लजाता है...
जय हिन्द, जय श्रीराम,
कुँवर जी,
हिन्दू होकर हिन्दू दिखने में जो शर्माता है...
बाप के खून और माँ के दूध को लजाता है...
जय हिन्द, जय श्रीराम,
कुँवर जी,
हम कहते है हमें शान्ति चाहिए,
वो बोले
हमने इतना बेआबरू तुमको किया,
कभी छाती की छलनी
अभी सर धर लिया,
तुम अब भी शान्त हो
अब इस से ज्यादा शान्ति का भी क्या करोगे...
शान्ति नहीं तुम्हे शर्म चाहिए,
हमने कहा
शर्म तो चली गयी बेशर्म हो...
चाहे कुछ भी हो अब शान्ति ही अपना धर्म हो...
तो हमें शान्ति चाहिए...
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,
क्यूँ घुट रहे हो पल-पल,
कोई क़सूर तो नही जिंदगी!
खोलो पलके हाथ बढाओ,
इतनी भी दूर तो नहीं ज़िन्दगी!
माना ज़ख्म है कई तो क्या,
कोई नासूर तो नहीं ज़िन्दगी!
रोते हुए को हँसी ना दे पाए जो,
इतनी मजबूर तो नहीं जिंदगी!
जय हिन्द, जय श्रीराम,
कुँवर जी,
देश की जो रीढ़ है लोकतंत्र.,(?) वही सबसे बड़ी कमजोरी मुझे दिखाई पड़ती है!कम से कम पिछले कुछ दिनों से तो ऐसा ही दिखाई दे रहा है! कोई घर से बहार का मारे तो दर्द होता है वो तो होगा ही, पर जब कोई घर का ही मारता है तो दुःख भी होता है साथ में!
कल जैसे लोकतंत्र का मज़ाक बना उस से बहुत दुःख हुआ, ना कुछ कहते बन रहा है, ना चुप रहते ही बन रहा!पता नहीं रोटी ही खाते है या क्या खाते है...?
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,