गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

ज़िन्दगी है क्या बोलो ज़िन्दगी है क्या ?

आज आपके समक्ष एक गाना प्रस्तुत कर रहा हूँ!फिल्म का नाम है "सत्यकाम"!मुझे बहुत अच्छा लगता है ये गाना!किशोर कुमार,महेंदर कपूर और मुकेश का संगम बहुत ही मन-भावन होगा ये बताने की जरुरत मै महसूस नहीं कर रहा हूँ!सुनने के लिए u-tube का लिंक नीचे दे दिया गया है!तो पढ़िए और सुनिए....

ज़िन्दगी  है  क्या  बोलो  ज़िन्दगी  है  क्या ?
(ज़िन्दगी है क्या बोलो ज़िन्दगी है क्या)



ज़िन्दगी  है  लट्टू -2 चाहे  जहाँ  नचालो,
चाहे  इधर  घुमालो  भाड़े  का  जसे टट्टू, 
लट्टू;ज़िन्दगी  है  लट्टू,  
ज़िन्दगी  है  लड़की  लड़की,
ज़िन्दगी  है  लड़की -२,

लड़की  का  नाम  मत  लो,  
क्यूँ?
उसका  सलाम  मत  लो,  
क्यूँ?
लड़की  बढाए कडकी!


लट्टू  नहीं  लड़की  नहीं,
ज़िन्दगी  है  सच्चाई-२!
मिट्टी  की  मूरत  जब  सच  बोली  आदमी  तब  कहलाई!

आदमी  है  क्या  बोलो  आदमी  है  क्या?

आदमी  है  बंदर-2 रोटी  उठा  के  भागे,
कपडे  चुरा  के  भागे  कहलाये   वो  सिकंदर,
बंदर  आदमी  है  बंदर-२,
आदमी  है  चरखा -2 अरे  चू-चू  हमेशा  बोले,
भो  भो  हमेशा  डोले  रुकते  कभी  ना  देखा-२,
आदमी  है  चरखा-२,
बंदर  नहीं  चरखा  नहीं  आदमी  का  क्या  कहना,
प्यार  मोहबत  फितरत  उसकी  दोस्ती  मजहब  उसका!

दोस्ती  है  क्या  बोलो  दोस्ती  है  क्या?

दोस्ती  है  मोटर  मोटर  सुब  जिसमे  घुमते  है,
मस्ती  में  झुम्तें  जब  तक  के  हो  ना  पंक्चर,
दोस्ती  है  मोटर,
दोस्ती  भाई  लस्सी  हूऊन  हहा  हूं-२,
दोस्ती  है  भाई  लस्सी  पिलो  ज़रा  ना  छोड़ो,
भूले  से  भी  ना  तोड़ो  जादू  की  यह  रस्सी,


लस्सी  नहीं  है  रस्सी  नहीं  दोस्ती  दिल  की  धड़कन-२,
दुश्मनी  सहरा-सहरा  करे,
दोस्ती  गुलशन  गुलशन-2-3.....


 
http://www.youtube.com/watch?v=skaepcQg1vs
इसे यहाँ सुने...
कुंवर जी,

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

अब मै क्या बताऊँ...........(कविता)

किसी को ना बताऊँ तो कहाँ जाऊं मै!
भगवान् ने भी जो ना सुनी वो किसको सुनाऊँ मै!

जो हो गया सो तो हो लिया,
कुछ पा लिया कुछ कुछ खो दिया,
एक दुख़ और माला में पिरो लिया,
एक पल और आंसुओ से भिगो दिया;
जिन्दा होने का वहम भी हो तो मर जाऊं मै!
ओरो को तो बहला दू खुद को क्या समझाऊं मै!

काश के हँसना-रोना होता ही नहीं,
काश के यूँ सपने कोई संजोता ही नहीं,
काश के जो हो गया वो होता ही नहीं,
काश के ये 'काश' कभी खोता ही नहीं;
आंसू भी मेरे सूख चुके आँखों को कैसे अब रुलाऊँ मै!
पलकों के अन्दर जो है उसको कैसे वहां से हटाऊँ मै!

साथी बहुत है पर विश्वाश नहीं है,
जिसको पकड़ लूं वो एक आस नहीं है,
किसी को झुठलाने का ये प्रयास नहीं है,
और किसी के भी ऊपर ये कयास नहीं है;
कोई धोखा बचा ही नहीं जिसको अब खाऊं मै!
कोई काँधा जो मिल जाए तो शायद सर रख पाऊं मै!

कमी किसकी रही ये अब किसको सूझे,
कोई सवाल दिखे भी तो कोई बूझे,
किस्मत के अँधेरे में हम सायें को जूझे,
खुद ही जब साथ नहीं तो क्या संभालेंगे दूजे;
मौत जो आकर चली गयी अब उसको ही बुलाऊं मै!
                                           अँधेरे में जो जलाए थे वो हर दीप बुझाऊं मै!

कुंवर जी,

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

शादी से पहले बातचीत .......?

यह विषय आज के समय को देखते हुए बड़ा जरुरी-सा विषय बनता जा रहा है!हालांकि इसकी आवशयकता है भी या नहीं ये परिस्थितियों पर बहुत निर्भर करता है,मेरे हिसाब से तो!इसका एक कारण बताया जाता है कि लड़की ओर लड़के की आपस में जानकारी बढ़ेगी और वो एक दुसरे को और अच्छी  तरह जान पायेंगे!जिस से कि उनका आने वाला समय बेहतर होगा!

किन्तु कई बार इसका उल्टा हुआ है!उनकी आपस में एक दुसरे के बारे में जानकारी तो बढ़ जाती है,लेकिन एक रिश्ता जो बनने जा रहा था वो बन नहीं पाता!यहाँ तक कि शादी होने के बाद भी!क्योंकि वो जान जाते है एक दुसरे के बारे में,पहले ही!रोमांच सारा ख़त्म!

पहले क्या होता था,या गाँव-देहात में क्या होता है,लड़का-लड़की एक दुसरे से बात करना तो दूर,जानते भी नहीं,और शादी हो गयी जी!आधुनिक जगत को ये बात बहुत अखरती है!ऐसा कैसे हो गया,कैसे हो सकता है?पता नहीं वो एक दुसरे को समझ पायेंगे या नहीं?वो नहीं समझ पायेंगे तो सुखी कैसे रहेंगे?वगराह-वगराह!

वो ज्यादातर सुखी रहते है!
असल में सुखी रहने का रहस्य दुसरे को समझने में कम और खुद को समझने में अधिक छिपा है!ऐसा नहीं है के वो एक दुसरे को नहीं समझते,समझते है!लेकिन जब तक वो एक दुसरे को समझते है तब एक बहुत बड़ा कालखण्ड जीवन का बीत चुका होता है,जानने के रोमांच में!और जो आनंद मनुष्य दुसरे की जिन्दगी ने झाँक कर लेता है उसका शायद कोई विकल्प नहीं!वो आनंद ले रहे होते है 'किसी अपने' की जिंदगी में झाँकने का!जबकि यही काम यदि शादी से पहले किया जाए तो हम केवल 'किसी' लड़के या लड़की की जिंदगी में झाँक रहे होते है जो अभी तक हमारा कुछ नहीं है!भविष्य में हो सकता है,अभी कुछ नहीं है!सो एक एह्न्कार-सा मन में आ जाता है कि हम निष्पक्ष होकर किसी की जिंदगी में देखेंगे जो की हम कभी हो ही नहीं सकते!एह्न्कार में निर्णय ठीक ही हो इसकी सुनिश्चितता नहीं होती!

दूसरी और जब हम 'किसी अपने' की जिंदगी में झांकेंगे तो हमारे पास निष्पक्ष होने या रहने की मजबूरी नहीं होती!हम स्वाभाविक ही अपने का पक्ष ले सकते है!उसमे केवल अच्छा ही देखने की कोशिश करेंगे!कुछ बुरा यदि दिखाई दे भी जाए तो सोच लेते है की पहले रहा होगा,अब हम नहीं होने देंगे ऐसा!कमियाँ अब भी देखेंगे साथ ही उन्हें ख़त्म करने के उपाय भी!

जबकि शादी से पहले केवल कमियाँ ही दिख पाती है,उपाय तक जाने की कोशिश ही नहीं की जाती!करे भी क्यों?किसके लिए?"ये नहीं तो और सही" वाली खिड़की होती है अभी हमारे पास!वो भी खुली हुई!कोई चिंता ही नहीं!

हालांकि इसका कभी-कभी लाभ भी होता है दोनों को! पर मैंने अब तक ऐसा कम ही देखा है!वैसे जो अनुभव हमारा है वो केवल हमारा ही है!जरूरी नहीं जिन परिस्थितियों में 'क' जो करेगा वही उन्ही परिस्थितियों 'ख' के लिए भी सही रहेगा!
कुंवर जी,

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

अजीब दास्ताँ है ये.......(2 )(हास्य-वयंग्य)

सर्वप्रथम तो आप सब का मुझे झेलते रहने का आभार प्रकट करना चाहुंगा!जिन्होंने मुझे "टिप्पणी ब्रांड" उत्साहवर्धक टोनिक की दो बूँद दी है,उन्हें मै बताना चाहूँगा के उनका ये प्रयोग सौ फीसदी सफल रहा!हर एक बूँद मेरे लहू में मिल जो रासायनिक क्रिया कर रही है उस से आप ज्यादा दिन अनभिज्ञ  नहीं रह पायेंगे!
मुझ तुच्छ पर दृष्टि डालने के लिए एक बार फिर मै आभार व्यक्त करता हूँ,साथ में आशा करता हूँ कि ये स्नेहाशीष सदा मुझे मिलता रहेगा!


पिछली बार जब हमारी बात रुकी थी तो कुंवर जी घर जा रहे थे और घर पहुँचने से घबरा भी रहे थे,क्यों? ये आपने पढ़ ही लिया!

हम घबरा जरुर रहे थे लेकिन हमारा मानसिक सन्तुलन  अभी भी कायम था!हम भली-भाँती जानते थे क़ि घर खाली हाथ जाना खतरे से खाली नहीं है,सो सर्दियों के मौसम के हिसाब से और अपनी जेब के मिजाज से मेल खाती चीज ले ही ली हमने!आप उत्सुक दिखाई दे रहे है सो बताये देता हूँ!हमने लिए जी "बादाम.......गरीबो के"!अर्थार्त मूंगफली,वो भी पूरी आधा किलो!साथ में गच्चक भी!मानो तो सोने पे सुहागा!


घर में प्रवेश करते ही सपना स्मरण हो आया जो सच सा प्रतीत हो रहा था!एक बात और पता चली के खीर भी बनायी गयी थी विशेषरूप से हमारे लिए!मन की शंकाओं ने मष्तिष्क की सहयता से षड़यंत्र रचने आरम्भ कर दिए ,सपने में दिखी सम्भावित आपदा से बचने के लिए!जाते ही सबसे पहले नतमस्तक माता-पिताश्री के श्रीचरणों में!श्रीमती जी अन्दर कक्ष में ही खड़ी-खड़ी निहार रही है जी और हम नजरे चुराने की झूठी कोशिशो में लगे है!


थोड़ी देर बाद पिताश्री भी उठ कर बहार चले जाते है,हम वही बैठे है!माताश्री,श्रीमती जी की भावनाओ को समझने के प्रयास करती दिखाई देती है,उन्हें हमारे लिए पानी लाने के लिए कह देती है!स्वयं वह से जाने के लिए बहार कोई काम याद आने की कह कर उठने लगती है!उन्होंने सोचा होगा के अब तो बात कर लेने दू दोनों को!परन्तु हम थोड़े से भयभीत थे सपने से!मिलने की जो उमंग-तरंग मनमे हर बार होती थी वो इस बार नहीं थी,आपको तो इमानदारी से बता ही सकता हूँ!

उमंग कि जगह मन में कुछ और था,आप तो समझ ही गए होंगे!माताश्री बहार चली गयी हमे अकेले ही जूझने के लिए छोड़कर!थोड़ी देर तो मेहमानों वली आव-भगत सी हुई,फिर बात मुद्दे कि और मुड़ती प्रतीत हुई हमे!हमने तुरन्त मूंगफली और गच्चक रूपी कवच-कुण्डल का प्रयोग किया,सफल भी रहा!कुछ देर के लिए ही सही,पर तब तक हमे खुद को सम्भालने  का समय मिल गया था!जैसे कैसे हम खुद को वह से निकालने में सफल रहे!उसके बाद तो संजीव के यहाँ बांग्लादेश और कीनिया का क्रिकेट टेस्ट मैच देखने बैठ गए!वो भाई साहब तो बोर हो गए थोड़ी देर में ही,पर हमे तो वो भी एक बहुत अच्छा साधन दिखाई दे रहा था खुद को व्यस्त रखने का,सो हम तो देखे जा रहे थे!

हम कितना ही दिखावा कर ले खुद को अपनी परेशानियों से अलग रखने का पर ये जालिम मन,रह-रह कर वहीँ दौड़ जाता है!अपना भी कुछ ऐसा सा ही हाल था!संजीव ने तंग आ कर पूछा के "और कितने  बचे है?"
हम बोले-"आठ सौ ही बचे है यार!"खैर 2-3 बार चाय देने के बाद वो भी टलता सा जान पड़ा तो हम फिर घर की और हो लिए!

शाम भी हो चली थी,घर के सिवा कोई और ठौर भी नहीं थी!सो हम एक बार फिर घर में!और मन में अब भी वो ही ख़याल के तनख्वाह 6000 मिली हुयी है इस बार तो,घर वालो कुछ ज्यादा मिलेगा पहले से!पर हाथ में केवल 800 !इसीलिए टलते फिर रहे थे!

माता-पिताश्री थोड़े संतोषी है,जब हमने पैसो का कुछ जिक्र नहीं किया तो उन्होंने सोच लिया के पैसे बहू को भी देगा तो भी घर में ही रहेंगे!उन्होंने ज्यादा छान-बीन नहीं करनी चाही!

अब पत्नीश्री को कैसे समझाया जाए?अब एक समय तो ऐसा आ ही जाता है जब मुसीबात सीधे गले पड़ती ही है(मेरा मतलब कुछ और नहीं है)!वो समय भी आ ही गया!उन्होंने समय अधिक ना लेते हुए सीधे मुद्दे की बात छेड़ दी!कुछ था ही नहीं देने को,पर ये कह भी नहीं सकते थे!कम से कम उनकी नजरो में तो 'कुछ' छवि थी ही हमारी,हम उसे भी धूमिल जो नहीं करना चाह रहे थे!मगर नारी और चतुराई तो साथ-2 ही रहते है!और जब चतुराई अहंकार से घुल-मिल जाए तो वो कुछ भी सोच सकती है!

हमारे बार-बार टलने से  जो उन्होंने सोचा वो उनकी एक दबी-सी जलन का हिस्सा भी लग रहा था!वो बोली-"एक बार फिर हो गए घरवालो के,वो तो तुम्हे ऐसे ही लूटेंगे सारी उम्र!लुटते रहो,मुझे क्या?मै कोंन-सा अपने लिए मांग रही थी?तुम्हारे ही घर में खर्च होने थे!मगर कौन सुने मेरी!कोई कुछ समझे तो सुने भी!जिन्हें समझते थे उनको तो दे दिए सारे पैसे!अब जब जाओगे फिर फैलाना उनके आगे हाथ!देखती हूँ  मै भी के कब हमे भी कुछ समझा जाएगा!..........."

उसका बोलना जारी था पर मुझे थोड़ी राहत सी महसूस हो रही थी!कुटिल मुस्कान होंठो पर अपने-आप थिरक गयी,कसम से अपने-आप!मै जान-बुझ कर नहीं हंसा था!मैंने बस इतना ही कहा "पागल;वो भी तो तेरी तरह बस मेरी और ही देख रहे है....."

मेरे बोलने से ज्यादा मेरी हंसी ने अधिक हवा दे दी उसकी क्रोधाग्नि को!उसका बटन जैसे फिर दब गया हो,वो तो खैर पहले से ही दबा हुआ था!उसकी शिकायते-कम-आदेश निरंतर जारी थे!जब हमे लगा के बात सच में रूठने तक पहुंचने वाली है तो हमने एक बार फिर ब्रह्माश्त्र का प्रयोग किया!

और कुछ नहीं बस अगली बार सारी तनख्वाह उसके हाथ में ही रखने की बात कह दी,साथ में अंगूठी तो अगली बार ही,फर्श वो भी चिप्स वाला आने वाले दो-चार महीनो में,बिजली की फीटिंग गर्मियों से पहले,एक बड़ा लोहे का गेट भी बोल दिया के लगवा लेंगे,और जो पिछले तीन से साल से होता आ रहा था वही हुआ!बेचारी मेरी आँखों से सपने देख जरुर रही थी पर दिमाग अपना भी लगा रही थी!


फिर तो फर्श में डिजाइन कैसा होगा,गेट का डिजाइन क्या होना चाहिए.......... उसके सुझाव आ रहे थे जी शिकायतों की जगह!हमे लगा युध्ह-विराम के संकेत मिल गए है,सो शांति से सोने की तय्यारी करने लगे!सुबह चार बजे जो निकलना था दिल्ली के लिए!

हम सोच रहे थे क्या अजीब दास्ताँ है ये भी!माताश्री सोच रही है पैसे बहू को दे दिए होंगे,बहू सास से जली जा रही ये सोच कर कि पैसे उन्हें दिए गए है!जबकि सच कुछ और ही था!चलो जो भी था,वैसे भी जिंदगी भ्रमो के सहारे ही जीये जा रहे थे!एक-दो भ्रम और सही!....
कुंवर जी,

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

अजीब दास्ताँ है ये...(हास्य-वयंग्य)

राम राम जी!
जीवन भी कई बार अजीब परिस्थितियों से दो-चार करवा देता है!और हर किसी को!मुझे तो ऐसा ही लगता है!अब कुंवर जी को ही लो,फंस गए बेचारे ऐसी ही परिस्थिति में!मजे कि बात ये कि अपने ही घर में!


पौह का महीना हो तो बताने कि आवश्यकता नहीं कि ठंड अपने चरम पर होगी!कुंवर जी के घर में थोडा उत्सव का सा माहोल बनता दिखाई दे रहा था!रविवार था,बस यही तो बात ना होगी?अरे कुंवर जी आ रहे थे दिल्ली से,अब ये मत कहना के पिछले हफ्ते भी तो आये थे!यूँ तो हर रविवार को आ ही जाते है!पर इस बार कुछ तो ख़ास है?


घर में जाकर देखा तो आँगन गाय के ताजे गोबर से लीपा हुआ था!हर तरफ साफ़-सफाई सहज ही देखी जा सकती थी!हर कोई कुंवर जी के आने की बाट जोह रहे थे!कुंवर जी की माताश्री कह रही थी, "कितने दिनों के बाद आ रहा है मेरा बेटा,पता नहीं कितनी देर और लग जायेगी,उसने तो सुबह से कुछ खाया भी नहीं होगा?"
पिताश्री:-"आ जाएगा तेरा लाडला,विलायत से नहीं आ रहा है,ये दिल्ली रही!"


अन्दर कक्ष से जो आवाज आई उस से कहानी का रहस्य खुलता सा प्रतीत हुआ,सो हमने वही  कान लगाना उचित समझा!कुंवर जी की श्रीमती जी ने कही फोन मिलाया हुआ था,आने के तो कम ही अवसर होते है,सो मिलाया ही होगा!सम्भवतः कुंवर जी की साली से बात कर रही थी वें!कह रही थी, "करनाल में तो ढाई हज़ार ही मिलते थे उनको,दिल्ली में पूरे छः हज़ार!मैंने तो पूरे सत्रह व्रत किये थे उनकी इतनी तनख्वाह करवाने के लिए!पहले तो ये कह देते थे की 'इतने' में से क्या बचाऊं?अब तो ये भी ना कहने दूंगी तेरे जीजा जी को!आने दे एक बार उनको;देखती हूँ कितनी लाज रखते है वो मेरे व्रतो की!तीन हज़ार तो मै आते ही ले लूँगी,और सालगिरह भी आने वाली है, इस बार तो सोने की अंगूठी से कम 'गिफ्ट' नहीं चलेगा........"


और अचानक ब्रेक लगने से बस झटके से क्या रुकी,कुंवर जी जैसे कितने ही यात्रियों की नींद एक झटके में ही खुल गयी!हम तो हैरान-परेशान!ये कहाँ हम?श्रीमती जी कहाँ है?इधर-उधर देखा तो पाया कि अभी तो हम बस में ही है!वो सब तो एक सपना था!


असल में जागते हुए आदमी जिन चिंताओं में घिरा रहता है, सो कर भी उन्ही चिंताओं में उलझा रहता है!प्रमुखता के आधार पर चिंताए सपना बन कर सोने के बाद भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती रहती है,कहीं ये हमे भूल ना जाए!अब कुंवर जी कि यही प्रमुखता रही होगी पिछले कई दिनों कि "कैसे पूंजी(तनख्वाह,या बची हुई तनख्वाह) का उचित वितरण किया जाए घर जाकर?"
घर वालो के,विशेषकर घरवाली कि योजनाओं का अनुमान तो हो गया था कुंवर जी को!
अब अपनी स्थिति का भी पूरा पता था हमे!
6000 रुपये वेतन है जरुर,मगर मिलता केवल 5200 रुपये ही है!बाकी कुछ हमारी वर्तमान कि सुरक्षा के नाम पर और कुछ भविष्य की सुरक्षा के नाम पर काट लिया जाता है,जाता कहा है ये तो पता नहीं,पर कटता जरुर है!

जहाँ हम रह रहे है वो दिल्ली है भाई,ससुराल नहीं जो मुफ्त में मलाई-कोफ्ता मिल जाता हो!अरे पानी भी खरीद कर पीना पड़ता है,रोटी,दाल-चावल की बात बहुत दूर रही!
और सबसे पहले "रहना"!चलने-फिरने के लिए तो बहुत जगह है,लेकिन जब थक जाये,तब?गाँव नहीं है जो किसी के भी यहाँ बैठ गए ओए कर लिया टाइम-पास!वो भी हो जाए तो रात को तो एक अपना ठिकाना चाहिए ही होता है!बहुत मिलते है दिल्ली में ठिकाने,पर उनका भी पैसा देना पड़ता है!सब मिला कर कम से कम 3000 रुपये तो तो इन्ही सब में चला गया!घर आने-जाने के में भी कम से कम एक हज़ार तो लग ही जाते है महीने भर में!अब इतनी ज्यादा पहली तनख्वाह थी ,तो दोस्तों के संग 'पार्टी' भी करनी पड़  गयी थी,8 -10 लोग एक साथ चाय पियेंगे तो खाली चाय थोड़े ही पिलाई जाती है,साथ में कुछ और हो ही जाता है!
और अब तक जो किसी से "लिया" हुआ था वो भी तो लौटाना था!
पिछली जेब से जब बटुआ निकाल कर देखा तो उसमे बचा-खुचा कर 800 रुपये मिले!

अब 6000 तनख्वाह वाले स्टेटस के लिए ही सही,अगली तनख्वाह तक जेब इतने पैसे तो होने ही चाहिए!......


सच्चाई तो ये थी हमारी,और घर....????

'सोचा घर पहुँच कर ही देखा जाएगा' और लगे देखने आकाश की और!
जैसे-जैसे बस आगे बढ़ी जा रही थी,घर आने का डर और अधिक सता रहा था!
आखिरकार घर आ ही गया!
.....
...
..
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क्षमा चाहूँगा क़ि आगे क्या हुआ ये जानने के लिए आपको अगली पोस्ट का इन्तजार करना पड़ेगा.......
कुंवर जी,

लिखिए अपनी भाषा में