भगवान् ने भी जो ना सुनी वो किसको सुनाऊँ मै!
जो हो गया सो तो हो लिया,
कुछ पा लिया कुछ कुछ खो दिया,
एक दुख़ और माला में पिरो लिया,
एक पल और आंसुओ से भिगो दिया;
जिन्दा होने का वहम भी हो तो मर जाऊं मै!
ओरो को तो बहला दू खुद को क्या समझाऊं मै!
काश के हँसना-रोना होता ही नहीं,
काश के जो हो गया वो होता ही नहीं,
काश के ये 'काश' कभी खोता ही नहीं;आंसू भी मेरे सूख चुके आँखों को कैसे अब रुलाऊँ मै!
पलकों के अन्दर जो है उसको कैसे वहां से हटाऊँ मै!साथी बहुत है पर विश्वाश नहीं है,
जिसको पकड़ लूं वो एक आस नहीं है,
किसी को झुठलाने का ये प्रयास नहीं है,
और किसी के भी ऊपर ये कयास नहीं है;कोई धोखा बचा ही नहीं जिसको अब खाऊं मै!
कोई काँधा जो मिल जाए तो शायद सर रख पाऊं मै!कमी किसकी रही ये अब किसको सूझे,
कोई सवाल दिखे भी तो कोई बूझे,
किस्मत के अँधेरे में हम सायें को जूझे,
खुद ही जब साथ नहीं तो क्या संभालेंगे दूजे;मौत जो आकर चली गयी अब उसको ही बुलाऊं मै!
अँधेरे में जो जलाए थे वो हर दीप बुझाऊं मै!
कुंवर जी,










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