गुरुवार, 3 जनवरी 2013

इतनी मजबूर तो नहीं जिंदगी....(कुँवर जी)

क्यूँ घुट रहे हो पल-पल,
कोई क़सूर तो नही जिंदगी!

खोलो पलके हाथ बढाओ,
इतनी भी दूर तो नहीं ज़िन्दगी!

माना ज़ख्म है कई तो क्या,
कोई नासूर तो नहीं ज़िन्दगी!

रोते हुए को हँसी ना दे पाए जो,
इतनी मजबूर तो नहीं जिंदगी!

जय हिन्द, जय श्रीराम,
कुँवर जी,

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

कोई संसद के बहार से हमला करता है... और कोई अन्दर से..!(कुँवर जी)

देश की जो रीढ़ है लोकतंत्र.,(?) वही सबसे बड़ी कमजोरी मुझे दिखाई पड़ती है!कम से कम पिछले कुछ दिनों से तो ऐसा ही दिखाई दे रहा है! कोई घर से बहार का मारे तो दर्द होता है वो तो होगा ही, पर जब कोई घर का ही मारता है तो दुःख भी होता है साथ में!

कल जैसे लोकतंत्र का मज़ाक बना उस से बहुत दुःख हुआ, ना कुछ कहते बन रहा है, ना चुप रहते ही बन रहा!पता नहीं रोटी ही खाते है या क्या खाते है...?

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

प्रतिक्रिया......(कुँवर जी)

अभी अनामिका जी को यहाँ पढ़ा तो   
सच में बोलती ही बंद हो गयी!कई दिन बाद स्वतः ही कुछ मौन से फूटा!आज वो ही आपके समक्ष!आज हम सब बुत से बन गए है!कोई प्रतिक्रिया कर ही नहीं रहे है है किसी भी कुरीति के विरोध में!बस आज यही....


देशवासियों तुम मूक ही रहना....
जब खुद की बारी आएगी..
तब आत्मा तक चिल्लाएगी,
सब चीख-ओ-पुकार तुम्हारी
सुन कर भी अनसुनी हो जायेगी,
तब तक
देशवासियों तुम मूक ही रहना....
 

तड़पती-तरसती आँखे तुम्हारी
जैसे अब तुम मूक हो,
तब सब को मूक देख पछताएगी!

बिना पछताए कहा 
हमारे बात समझ में आएगी!
तो 
तब तक
देशवासियों तुम मूक ही रहना...!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

सौ संस्कारों के ऊपर भारी मजबूरी एक .... (कुँवर जी)

सौ संस्कारों के ऊपर भारी मजबूरी एक
आचरण बुरा ही सही पर है इरादे नेक!

खुद बोले खुद झुठलाये जो करे कह न पाए
अजब चलन चला जग में चक्कर में विवेक

भ्रष्टाचार से लड़ाई में हाल ये सामने आये
विजयी मुस्कान लिए सब रहे घुटने टेक!

मेहनत से डर कर खुद को मजबूर कहलवाए 
जब तक मौका न मिले तब तक है सब नेक!

जय हिन्द, जय श्रीराम, 
कुँवर जी

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

बाकि देश जाए भाड़ में!.....(कुँवर जी)

राम राम जी, कई दिनों के बाद आज कुछ लिखना चाहता हूँ!असल में मै  नहीं चाहता ऐसा लिखना पर क्या करूँ,जो दिखता कलम वो ही तो लिखता है! ऐसा ही कुछ कही पढ़ा या सुना था शायद..... शुरूआती पंक्ति तो पक्का!आगे कुछ-कुछ अपने आप जुड़ता चला गया!


सब लगे है अपने ही जुगाड़ में
बाकि देश जाए भाड़ में!

अपने ही हित साधने में लगा हर कोई
समाज सेवा की आड़ में,
बाकि देश जाए भाड़ में! 

ज़मीर मूर्छित पड़ा है और सब राम है
संजीवनी कौन ढूंढे पहाड़ में,
बाकि देश जाए भाड़ में!

कब मौका मिले कब काटे गला किसी का
और आपस ही के लाड़ में,
बाकि देश जाए भाड़ में!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

लिखिए अपनी भाषा में