क्यूँ घुट रहे हो पल-पल,
कोई क़सूर तो नही जिंदगी!
खोलो पलके हाथ बढाओ,
इतनी भी दूर तो नहीं ज़िन्दगी!
माना ज़ख्म है कई तो क्या,
कोई नासूर तो नहीं ज़िन्दगी!
रोते हुए को हँसी ना दे पाए जो,
इतनी मजबूर तो नहीं जिंदगी!
जय हिन्द, जय श्रीराम,
कुँवर जी,
क्यूँ घुट रहे हो पल-पल,
कोई क़सूर तो नही जिंदगी!
खोलो पलके हाथ बढाओ,
इतनी भी दूर तो नहीं ज़िन्दगी!
माना ज़ख्म है कई तो क्या,
कोई नासूर तो नहीं ज़िन्दगी!
रोते हुए को हँसी ना दे पाए जो,
इतनी मजबूर तो नहीं जिंदगी!
जय हिन्द, जय श्रीराम,
कुँवर जी,
देश की जो रीढ़ है लोकतंत्र.,(?) वही सबसे बड़ी कमजोरी मुझे दिखाई पड़ती है!कम से कम पिछले कुछ दिनों से तो ऐसा ही दिखाई दे रहा है! कोई घर से बहार का मारे तो दर्द होता है वो तो होगा ही, पर जब कोई घर का ही मारता है तो दुःख भी होता है साथ में!
कल जैसे लोकतंत्र का मज़ाक बना उस से बहुत दुःख हुआ, ना कुछ कहते बन रहा है, ना चुप रहते ही बन रहा!पता नहीं रोटी ही खाते है या क्या खाते है...?
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,