बुधवार, 18 जनवरी 2012

अर्धविराम की सीमा लांघ पूर्णविराम तक का सफ़र ....

शब्द फूट पड़े है चंहूँ ओर से,
हर पल हर जगह से,
हर हल चल हर परिवर्तन से,
हर स्थूल हर सूक्ष्म से,
बढ़ चले कि कविता बनेंगे....


इसी उमंग में,
फूट रहे थे शब्द हर कहीं से,
पर क्या पता...


एक अधुरा वाक्य
भी वो पूरा कर पायेंगे या नहीं.....?


अर्धविराम की सीमा लांघ
पूर्णविराम तक का सफ़र ....
तय कर पायेंगे या नहीं.... 




जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शनिवार, 14 जनवरी 2012

उनको भी शुभकामनाये....इस ठण्ड-नाशक(मकर-संक्रांति ) त्यौहार की..!

राम राम जी.... आप सभी को मकर-संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाये....

कहते है आज से ही दिन बड़े होने आरम्भ हो जायेंगे....सर्दी भी अपनी वृद्धावस्था में चली जायेगी...चली जायेगी...धीमी चाल से...पर चली ही जायेगी अब तो!सूर्य देवता जो  अब तक धुंध और मेघो से संघर्ष में स्वयं को यदा-कदा लाचार अनुभव कर रहे थे....अब पुनः अपना तेज प्राप्त करते चले जायेगे.... न मेघो की चलेगी न धुन्ध अब इतना इतर पाएगी....जो चाहेंगे तो बरस जायेंगे मेघ पर....सूर्य देवता से आंखमिचोली...अब अधिक न चल पाएगी...!अर्थात ठण्ड घटती चली जायेगी.....और...

जो बदनसीब(कोई और शब्द मुझे नहीं सुझा) फूटपथो  पर अपने रात-दिन गुजारने
को विवश है.....उन्हें भी संभवतः कुछ राहत अनुभव हो...वैसे तो वो इस दुरूह ठण्ड को ही
ओढने के आदि हो चुके होंगे पर फिर भी.... कुछ तो राहत उन्हें भी मिलेगी..पक्का..!
हाँ...तिल-गुड के लड्डू,रेवाड़ी-गज्जक,मूंगफली  उन्हें न मिल पाए अन्य संपन्न परिवारों की
तरह.... पर... ठण्ड से राहत जरुर मिलनी आरम्भ हो जायेगी.....!

उनको भी शुभकामनाये....इस ठण्ड-नाशक त्यौहार की..!

अरे आज के दिन तो मरने का भी अत्यधिक महत्त्व बताया गया है...तभी....भीष्म पितामह ने तीरों के बिछौने पर भी आज ही के दिन की बाट जोही थी.....सूर्य देवता के उत्तरायण होने के पश्चात् ही उन्होंने प्राण त्यागे थे...!

और हाँ.. बताते है आज ही के दिन देवताओ का दिन आरम्भ होता है...अर्थात अब तक जो लम्बी रात्री देवताओ की चल रही थी वो समाप्त....सुना है वो सब जाग जायेंगे.....सूर्य देव भी उत्तरायणी हो जायेंगे... तो पुण्य कर्मो के फल अब कुछ अधिक मिलेंगे... तो कर दीजिये आज से आरम्भ....कुछ दान कीजिये...बड़ो से आशीष पाइए...लोगो से दुआए प्राप्त करे....!

मुझे लगता है यदि किसी की प्रार्थना में आपके लिए भी प्रार्थना हो रही तो संभवतः वही सब से बड़ा कर्मफल है आपके लिए....तो आज से ही ओरो की प्रार्थना में सेंध लगानी आरम्भ कर दीजिये.....जितने अधिक लोगो की प्रार्थनाये आपके लिए होंगी उतना ही परमात्मा की नज़रों में
highlight होते चले जायेंगे....कर के तो देखिये ऐसा एक बार...! 


जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

उनकी आह नहीं मिटती...

शब्द खड़े है चारो और...
मुझे घेरे...
घूर रहे है...
मैंने पूछा उन से..
"सर्दी नहीं लगती है क्या तुम्हे......?"
वो बोले....
जवाब नहीं तो बात बदलोगे...?
हम ने कहा
 तुमने पूछा ही क्या है..?
वो बोले...
नहीं पूछा तो क्यों हो सहमे-सहमे ...?
मन में क्या कम्पन है..?


हम ने कहा... 
तुम भी खूब हो.
सर्द सुबह  में
सर्दी से ही कांप रहे है!
और जिनकी तुम सोच रहे हो...
उन फुटपाथ पर पड़े
लोगो की 
दिक्कत को भी भांप रहे है!
शब्द जैसे इतराए...
हमारी चोरी पकड़ कर..


हम पुनः बोले..
उनका प्रारब्ध,विधान.....
शब्द तो जैसे गरजे.....
बोले..
हमारे ही सहारे
हम ही से खेलते हो....!


मन की सारी करुणा 
बस कागज़ पर ही उड़ेलते हो!
कविता में तो भिगो देते हो 
हमें भी 
अपने आंसुओ से....
पर असल में 




पर असल में
बच के निकल आये हो तुम 
फुटपाथ पर पड़े अधनंगो से!
उनको कितने ही शब्द 
ओढाओ,पहराओ,
ऐसे किसी ही सर्दी नहीं हटती,
उनके जीवन  से
कोरी  "वाह" बीनने से ही
उनकी आह नहीं मिटती...
उनकी आह नहीं मिटती...
उनकी आह नहीं मिटती...



जय हिंद,जय श्रीराम
कुँवर जी,

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

कंगालों की हम से बड़ी मिसाल क्या है.....?(कुँवर जी)

क्या बताऊ तुम्हे की हाल क्या है..
कंगालों की हम से बड़ी मिसाल क्या है..?


बुझने में जिसे खो रहे जीवन अब तक
पता ही नहीं की असल में सवाल क्या है..?

भीड़ में शामिल हो खूब मचा आये शोर,
समाचारों में सुनते की आखिर ये बवाल क्या है..?

असहमति की अभिव्यक्ति हम कर सकते है,
करते नहीं पता नहीं मन में ये जंजाल क्या है..?

 जो राजी ही नहीं कभी हम से हुए,
उनकी हम से नाराज होने की ये चाल क्या है..?

बिना धन के गरीब देखे थे बहुत जग में,
अपनी आत्मा भी न मिली अपने पास,
न ज़मीर ही कही ढूंढ सके,
ना पाए विचार ही ओढने की खातिर,
ना पलके साहस कर सकी उठने का...
तो जाने कि असल में ये "कंगाल" क्या है..? 

क्या बताऊ तुम्हे की हाल क्या है..
कंगालों की हम से बड़ी मिसाल क्या है..?



जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

इक उम्मीद थी......(कुँवर जी)

इक उम्मीद थी कि 
धुन्ध छटेगी  तो 
सूरज निकल ही जाएगा...
क्या पता था कि 
मेघ भी 
पहरा लगाए बैठे होंगे!



जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

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