शनिवार, 27 नवंबर 2010

किस रंज के सायें में उल्लास है!



क्यों आज  आस ही   उदास है,
किस रंज के सायें में उल्लास है!

कर के मंथन कोई खुद ही,
कालकूट पीने का सा भास है!

दिल का दर्द यही  था बस,
या उसे छिपाने का ही ये प्रयास है!

बात छोटी हो या बड़ी,
भला क्यों ये अकेलेपन का एहसास है!

जय हिन्द,जय श्री राम,
कुंवर जी,

बुधवार, 24 नवंबर 2010

खुशियाँ लौट आती है,.....(कुंवर जी)

पता है,
खुशियाँ लौट आती है,
हमें थोडा सा तडपाती है,
थोडा तरसाती है,
पर हमारे बिना रह भी तो नहीं पाती है!
तो वापस लौट आती है!

फितरत नहीं है ना उनकी कहीं रुक जाना एक जगह ,
हर किसी से मिलने की  खातिर,
वो हमसे दूर चली जाती है!
पर वो रूठती थोड़े ही है हमसे,
थोड़ी अपनी याद दिलाती है,
थोडा सा हमारा मज़ाक उडाती है,
और
हम पर हंसती हुई फिर लौट आती है!

ज़िन्दगी जो रास्ता है तो मोड़ तो आयेंगे ही,
जो खेल तो जीत-हार सही,खुशियाँ भी हमें चलाती है!
थोड़ी सी खेलती हमारे साथ,
कभी जिताती कभी हराती है,
हर मोड़ के पार बुलाती है.
थोड़ी देर में ही सही
पर खुशियाँ लौट आती है!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,


सोमवार, 22 नवंबर 2010

`अब आंसुओ में कोई रंग आता ही नहीं!..........(Kunwar ji)..

पिछले  कुछ दिन या पिछला एक-दो महीना ब्लॉग से दूर सा ही रहा,कल तक तो इतना अफ़सोस नहीं हो रहा था पर कल रोहतक में जब मै अपने परिवार से पहली बार रूबरू हुआ तो लगा जैसे ये समय कैसे बर्बाद कर दिया मैंने....

लगा जैसे लड़की अपने ससुराल से मैके में आई हो पता नहीं कितने दिनों के बाद....
लेकिन वहा जाने से मन कि उत्कंठा को तो बल मिल गया पर समय का सहारा उन्हें अब भी नहीं मिल पा रहा है!उसी के अभाव में आज बस ये पंक्तियाँ ही आपके लिए....और चेष्टा रहेगी कि निरन्तर अपने परिवार का प्यार मै पाता रहूँ...

 अपने जीवन के सारे रंग
उड़ेल दिए मैंने शब्दों के चित्र बनाने में...

अब आंसुओ में कोई रंग आता ही नहीं!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

बिखरे पन्ने.......(कुंवर जी)

यादों से लड़ना हो या उनसे खेलना......दोनों ही हमें किसी ओर दुनिया में पहुंचा देते है!कभी गिरते है हम कभी खुद ही तन जाते है.....खामोश बैठे-बैठे यूँही अचानक मुस्कुराते है.....और तो क्या ख़ाक समझेंगे जब हम ही कुछ समझ नहीं पाते है!


और जब यादे उन पुराने मित्रो की हो जो कभी एक जान रहे हो,और अभी आस-पास भी ना हो तो.......
बस वो सब महसूस करने वाला होता है!कुछ-कुछ बताने के लिए कुछ लिख छोड़ा था कभी....आज आप सभी के समक्ष है.....




एक किताब की सिलाई उधड़ने पर जैसे
बिखरते है उसके पन्ने,
जानकारी जो होती थी कभी पूरी
रह जाती है आधी-अधूरी,
और फिर चलता है दौर लम्बा एक
पन्नो के फड़फड़ाने का,
कोई कहीं उड़ चला जाता है संग हवा के
कोई अटक जाता है कहीं!
न कोई सुनता है न ही समझता है तो
क्या फायदा उनके यूँ  फड़फड़ाने  का!
कभी गुजर जाते बिलकुल पास से
गुजर जाते,बनी रहती फिर भी उनमे दुरी!
फिर कभी वो किताब नहीं बनते दुबारा
रहते है यूँ ही बिखरे पन्ने!
जैसे हम........




जय हिन्द,जय श्रीराम,
(कुंवर जी)

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