बुधवार, 29 मई 2013

हिंदी और हिन्दी में शुद्ध रूप कौन सा है!

हिंदी और हिन्दी में शुद्ध रूप कौन सा है!
मुझे हिन्दी सही लगता था आज तक! अभी एक सरकारी साईट पर हिन्दी दिवस के अवसर पर लिखा गया सन्देश पढ़ा!उसे पढ़ कर मै भ्रमित सा हो गया हूँ!हिंदी और हिन्दी दोनों शब्दों का प्रयोग इसमें हुआ है,ज्यादा जोर हिंदी पर है!
सामान्य स्तर पर ऐसी त्रुटियाँ साधारण लग सकती है,पर राष्ट्रीय स्तर  और एक सरकारी  तौर पर ये एक अपराध ही गिना जायेगा,गिना जाना चाहिए! 

उस राजपत्र को आप यहाँ देख सकते है

इस पत्र से स्पष्ट दिख रहा है कि मन्त्रालय ने कैसी और कितनी शुभकामनाये दी है हिन्दी दिवस पर!  क्या ये चिन्ताजनक नहीं है कि राष्ट्रीय भाषा को सरकारी मन्त्रालयो में ही गम्भीरता से नहीं लिया जा रहा! 

जय हिन्द, जय श्रीराम!
कुँवर जी,

18 टिप्‍पणियां:

  1. "हिंदी" ये सही शब्द है। आप हिंदी शब्द कोश में भी देख सकते हैं... जो लोग इस तरह 'हिन्दी'लिखते हैं वो गलत है... हिंदी व्याकरण के अनुसार जब अंक का उच्चारण निकले तो अंक की मात्रा लगती है न कि आधा न। हिंदी के उच्चारण में हि के बाद अंक का उच्चारण निकल रहा है.. इस लिए हिंदी इस तरह लिखा जायेगा.. इसी तरह ज़िंदगी ऐसे लिखा जायेगा। ज़िन्दगी इस तरह लिखना गलत है।

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    1. नटखट जी आपका स्वागत है!आपने उत्तम बात बताई,इसके लिए आभार!
      हिन्दी भाषा में जो जैसे बोला जाता है वैसे ही लिखा भी जाता है!मुझे लगता है हिन्दी बोलते समय ध्वनि नाक से नहीं आएगी जबकि हिंदी कहते समय ध्वनि नाक से भी आएगी!यही पक्ष मुझे हिंदी को शुद्ध लेखन नहीं मानने दे रहा है!

      कुँवर जी,

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  2. हाँ आजकल महाविद्यालय स्तर पर बहुत से हिंदी के प्रोफेसर हिंदी ही लिखते है और इसे सही मानते हैं जो मेरे हिसाब से भी गलत है हिन्दी ही सही है यह मैं भी मानती हूँ ..आपने बढ़िया जानकारी दी है ..धन्यवाद

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    1. कविता जी, आपका स्वागत है!
      गूगल के हिन्दी लिखने वाले उपकरण में भी हम जब हिन्दी लिखते है तो उसमे भी पहला विकल्प 'हिंदी' ही दिखता है! अब मानने लगे है.... ये एक स्तर पर जाकर गम्भीर हो सकता है!परिवर्तन की इस बयार में वास्तविक स्वरूप को ना बहा दे हम..?

      कुँवर जी,

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  3. बारीक बात, बहुत बार हम भी गौर नहीं करते। भविष्य में जरूर ध्यान रखेंगे, नटखट जी की दी जानकारी बहुत काम की है। वैसे असली उद्देश्य अर्थ स्पष्ट होने से होता है लेकिन अधिकाधिक शुद्धता के लिये प्रयासरत तो रहना ही चाहिये।
    ब्लॉग टैंपलेट भी अब पहले से स्पष्ट है, आशा है समय समय पर स्पैम बॉक्स भी चैक करते रहेंगे।

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    1. बारीक तो है संजय जी,अब संजय और सन्जय की भी लड़ाई हो सकती है! वैसे आपने सही कहा हमारा अर्थ स्पष्ट होना चाहिए....
      स्पैम चैक करने की सही याद दिलाई आपने!नहीं तो कविता जी वही बैठी रह जाती!
      धन्यवाद!
      कुँवर जी,

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    2. सन्जय नहीं, संजय और सञ्जय ...
      :)

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    3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    4. यही नहीं - संजे, सन्जे और सञ्जे भी :)

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  4. मित्र,


    दोनों ही सही हैं। कैसे?


    बताता हूँ :


    हमारी हिन्दी भाषा में 'पाँच' वर्ग हैं


    कवर्ग : 'क' 'ख' 'ग' 'घ' और 'ङ्'


    चवर्ग : 'च' 'छ' 'ज' 'झ' और 'ञ'


    टवर्ग : 'ट' 'ठ ' 'ड' 'ढ' और 'ण'


    तवर्ग : 'त' 'थ' 'द' 'ध' और 'न'



    जिन वर्णों से पहले अनुस्वार आता है उस अनुस्वार की बिंदी उसके अनुरूप लग जाती है।


    कवर्ग ---

    जैसे शब्द है 'कङ्घा' ..... इसमें 'घ' वर्ण से पहले आये अनुस्वार 'ङ्' को 'बिंदी रूप में भी लिखा जा सकता है। यानी कंघा


    चवर्ग ----

    जैसे शब्द है 'चञ्चल' .... इसमें 'च' वर्ण से पहले आये अनुसार 'ञ' को बिंदी रूप में भी लिखा जा सकता है। यानी चंचल


    टवर्ग ----

    जैसे शब्द है 'ठण्डा' .... इसमें 'ड' वर्ण से पहले आये अनुस्वार 'ण' को बिंदी रूप में भी लिखा जा सकता है। यानी ठंडा


    तवर्ग ----

    जैसे शब्द है 'हिन्दी' .... इसमें 'द' वर्ण से पहले आये अनुस्वार 'न' को बिंदी रूप में भी लिखा जा सकता है। यानी 'हिंदी'


    मित्र कुँवर, मानक हिन्दी व्याकरण पूरा समझने के लिए इस तरह के संदेह दूर करने बहुर जरूरी हैं। आपकी यह चिंता वास्तव में उचित है कि 'हिंदी' भाषा के प्रयोक्ता उसके उसके सही रूप को व्यवहार में लाने के प्रति गंभीर नहीं रहते। इस दृष्टि से आपकी यह पोस्ट चर्चा योग्य है।

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    1. जानकारी के लिए धन्यवाद प्रतुल। हिन्दी की यही समस्या है कि एक दूसरे को सही करने के प्रयास तो दिखते हैं लेकिन जानकारी के मूल में जाने का प्रयास कम दिखता है। जो जानकारी दे सकते हैं ऐसे कई लोग तो शायद कोशिश से भी हताश हो चुके हैं। या फिर उनके लिखे-कहे तक लोगों की पहुँच ही नहीं है। जो भी हो, भाषा और लिपि के नियमों और मानकीकरण की जानकारी का प्रसार होना चाहिए और साथ ही साथ यह भी ध्यान रखा जाये कि जीवित भाषाएँ बदलती भी हैं. निजी अनुभवों की भी सीमाएं होती हैं। जो हमने देखा, जाना या समझा नहीं है, वह गलत ही हो यह ज़रूरी नहीं। एक बार फिर आभार!

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    2. अनुराग जी आपके सहयोग और समर्थन के लिए आभार!"इतनी सी त्रुटी से क्या फर्क पड़ जाएगा" वाली सोच का विस्तार होकर अब सम्भवतः ये हो गया है कि "त्रुटी से ही क्या फर्क पड़ जाएगा" !
      किसी भी भाषा के मूल रूप के लिए बहुत ही हानिकारक स्थिति होनी चाहिए!हिंदी भाषा के लचीलेपन को इसकी लचरता तो न समझा जाए!
      कुँवर जी,

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  5. इसी प्रकार पाँचवे वर्ग 'पवर्ग' पर नियम लागू होता है :
    शब्द है 'चम्पा' .... इसमें प वर्ण से पहले आये अनुस्वार 'म' को बिंदी रूप में भी लिखा जा सकता है। यानी चंपा

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    1. प्रतुल जी, विस्तार से समझाने के लिए आभार!पढाई के आरम्भिक( जब से कुछ समझ होनी लगती है) से ही हिंदी के प्रति अनुराग तो रहा पर उसे शुद्ध रूप से पढ़ाने वाले अध्यापक नहीं मिले!कभी ध्यान ही नहीं गया कि हम कब और कितने अशुद्ध उच्चारण और लेखन कर रहे होते है!और गाँव में तो शुद्ध हिंदी के उच्चारण का अवसर सहज मिलता ही नहीं!गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित पुस्तको को पढ़ते हुए हिन्दी के स्वरूप को थोडा बहुत देखा! सही तो तब भी नहीं समझ पाए!
      आजकल पता नहीं क्या हिन्दी को जान्ने की लत सी लगना चाह रही है!आपके सहयोग के लिए एक बार फिर आभार प्रतुल जी!
      वैसे एक ही उच्चारण को एक से ज्यादा तरह लिख सकते है क्या..?

      कुँवर जी,

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    2. जी, जैसे कि प्रतुलजी ने नियम दिया, एक ही उच्चारण को भिन्न प्रकार से लिखने के अनेक उदाहरण हैं, जैसे गंगा और गङ्गा, पंचांग और पञ्चाङ्ग। इसके अलावा अनेक ध्वनियाँ, प्रयोग के अनुसार कई रूप में लिखी जा सकती हैं मसलन, तैयार और तय्यार, भैया, भईया और भय्या। मेओ जाति को सामान्यतः मेव ही लिखा जाता है, इसी प्रकार दैत्य के लिए उर्दू "देओ" जैसे बोले जाने वाले शब्द को अक्सर देव ही लिखते हैं जिसमें व की ध्वनि V के बजाय W जैसी है। संक्षेप में कहा जाए तो एकाधिक प्रकार से लिखे जा सकने वाले शब्दों की संख्या लाखों नहीं तो हजारों में आसानी से हो सकती है।

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  6. अर्धाक्षर की जगह अनुस्वार के लिए बिन्दु का आग्रह वस्तुतः सरलता और जगह की बचत के लिए भी है। बस एक ही समस्या है कि वर्ग के यह पंचमाक्षर- 'ङ्' 'ञ' विलुप्त हो जाएंगे…

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    1. जी, अब तो कंप्यूटर/यूनिकोड ने छापाखानों की सीमाओं से मुक्ति दिला दी है, सो अक्षर आसानी से बचाए जाते हैं। बल्कि अपने शब्दार्थ के अनुसार अक्षर को तो क्षरण से बचना ही चाहिए

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  7. कभी ध्यान नहीं दिया इस तरफ ... आपका आभार है ऐसी बातों को सामने तो लाये आप ...

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