शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

फिर आतंकियों ने सेना पर हमला बोल दिया.....(लघु कथा )...(कुँवर जी)

मिश्रा जी ने चाय को ऐसे पिया जैसे किसी काढ़े का घूँट भर रहे हो!उनकी बहन घर पर आई हुयी थी,उन्होंने पूछा क्या हुआ चाय में चीनी की जगह नमक डाल दिया है क्या?
मिश्रा जी मुखमंडल पर दार्शनिक सी आभा को दिखाते हुए से बोले,"आज का अखबार तो देखो... फिर आतंकियों ने सेना पर हमला बोल दिया, कितने जवान शहीद हो गए!बोलते-बोलते वो सच में ही भावुक हो गए!फिर किसी की माँग सूनी हो गयी होगी,कितनी राखी कलाइयों को तरस जायेगी!कितनी माँ बस राह ताकती रह जायेगी!"
अखबार को अपने मन की तरह मसोस कर एक तरफ फेंक कर ऐसे ही बडबडाते हुए वो अपने कमरे की और चल पड़े,घडी की और नजर पड़ी तो ...." ओहो, आज फिर लेट हो जाऊँगा,अपनी पत्नी को लगभग धमकाते हुए वो बाथरूम की और दौड़े,"तुम्हे भी समय का पता नहीं चलता क्या?बताना तो चाहिए!आज तो वैसे भी एटीएम होकर जाना था,पांच-दस मिनट वहाँ भी लग जायेंगे!"
पत्नी बेचारी अपनी ननन्द की वजह से अपने सारे गुबार अपने ही अन्दर रखते हुए बोली,"नहाना बाद में, पहले अपने जीजा जी से बात तो कर लो.... क्या पता आज भी आये न आये!" पलट कर होंठ पीटती सी रसोई की और चली गयी!
मिश्रा जी की बहन को लगा की शायद वो ये कहती गयी है कि" रोज इसे लेने के लिए आने कि कह देते है....और आ रहे है नहीं!
उधर मिश्रा जी फोन काट कर बोले,"आज फिर बिना नहाये ही जाना पड़ेगा,खाना जैसा भी,जितना भी बना हो पैक कर दो!मैंने बोल दिया है जीजा जी को आज तो वो आ ही जायेंगे सो एटीएम तो जाना ही पड़ेगा!"
मिश्रा जी की बहन सोफे के एक कोने में फडफड़ाते  हुए अखबार को एक तक देखे जा रही थी,जैसे उसमे वो खुद को तलाश रही हो!

जय हिन्द,जय श्री राम,
कुँवर जी,   

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

इन्सानियत से होता कोसो दूर इन्सान !....(कुँवर जी)

हालातो के हाथो
में खुद को सौंप
दुआ,बददुआ और
किस्मत को भूल,
एक दुसरे को मारने को मजबूर इन्सान !

दया,धर्म और धैर्य
सब गए रसातल में
पथरीली आँखों के
वहशीपन में ये दो पाया
इन्सानियत से होता कोसो दूर इन्सान !

अहम्,स्वार्थ,
और राजनीति के षड्यंत्र,
इनसे आँखे मूंदे,
खुद से ही लड़ता हुआ
भला चल पायेगा कितनी दूर  इन्सान !




जय हिन्द, जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

कैसे आज तीज के झूले झूलूँ मै....

कैसे आज तीज के झूले झूलूँ मै....
दो सर आज भी झूल रहे है उनकी संगीनों पर...
कैसे भूलूँ मै!


झूलों की रस्सी में सांप दिखाई देते है,
हर आँखों में सीमा के संताप दिखाई देते है,
भड़क उठेंगे शोले जो जरा सी राख टटोलूं मै,
झूल रहे है दो शीश.....!


आस्तीन में सांप पालना कोई सीखे हमसे आकर,
दावत देते है हत्यारों को हम ससम्मान बुलाकर,
अबके घर में उनके घुसकर उनके शीश काट सारे दाग धोलूँ मै,
झूल रहे है दो शीश...!


कैसे आज तीज के झूले झूलूँ मै....
दो सर आज भी झूल रहे है उनकी संगीनों पर...
कैसे भूलूँ मै!


जय हिन्द ,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

सोमवार, 5 अगस्त 2013

वो तो भूखे ही रह जायेंगे ना....!!!(कुँवर जी)

बस अपनी चाल से बस दौड़ी जा रही थी!हर कोई अपनी-अपनी बातो में मशगूल था! एक वृद्ध जन बैठा-बैठा अचानक मायूस सा होता दिखाई दिया!साथ वाले ने बड़े आदर से उन से उनके यूँ दुखी होने का कारण जानना चाहा!
उन बुजुर्गवार ने बताया कि वो पिछले कई दिनों से घर से बाहर है!बस इसीलिए थोड़े चिंतित है!
तो साथ वाले ने भी बड़े दार्शनिक से अंदाज में कहा," हाँ, घर से दूर होकर घरवालो की कमी महसूस होती ही है!"
इस बुजुर्गवार ने कहा,"मै हर रोज छत पर कुछ दाने और पानी रख देता था,अगली सुबह तक दाने कोई न कोई पक्षी आकर खा जाते थे और मै फिर रख देता था!काफी दिनों से यही सिलसिला चला आ रहा था,पर पिछले कुछ दिनों से मै घर से बहार हूँ तो वह कोई दाने भी नहीं रख रहा होगा....... बस यही सोच कर चिंतित और दुखी हूँ!"
"आप भी बस... अरे पक्षियों को लेकर इतने दुखी हो रहे हो...?वो कहीं भी जाकर खा लेंगे,कही भी उनको दान-पानी मिल जायेगा!" वो साथ वाले जनाब माहौल को हल्का करते हुए बोले!
तो बुजुर्गवार अपनी दोनों भौहों को सिकोड़ते हुए बोले,"पर जो पक्षी मेरे रखे हुए दानो के लिए कहीं और के दाने छोड़ कर आयेंगे वो तो भूखे ही रह जायेंगे ना....!!!



जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

क्या पता कौन-कहाँ घात लगाए बैठा हो!...(कुँवर जी)

दिन में भी मध्यरात्रि  सा सन्नाटा पसरा था!सूरज जैसे कोई नाराजगी दिखा रहा हो!हवा भी खीजी सी पड़ी थी,तपी हुयी चीखती-चिल्लाती बस वही जहाँ-कहाँ  धुल उडाती सी जलाती फिर रही थी!ऐसे में कबूतर का एक परिवार जिसमे दो व्यस्क और दो बच्चे थे,उड़ने का साहस दिखा रहे थे!
जीने की चाह भी मरने को मजबूर कर देती है!बैठे रहते तो भूख-प्यास से मरते और उड़ रहे है तो गर्मी-लू से मरने का अंदेशा, पर उड़ेंगे तो शायद  कही कुछ मिल जाएगा खाने-पीने को बस यही आस झेल रही थी गरम हवा को भी!
आखिर उनकी हिम्मत और मेहनत ने एक छत पर कुछ आस दिखाई!एक कोने में एक टोकरी किसी लकड़ी के सहारे कुछ ऐसे खड़ी की हुई  थी कि उसके निचे रखे हुए पानी के बर्तन पर धुप न पड़े और उसका पानी गर्म न हो!उसे देख कबूतरों की जान में जान आ गयी!और अधिक वेग से वे वह तक पहुंचे!वह पहुँच कर देखते है कि कुछ चावल भी वहा पड़े हुए है
कोटि-कोटि आशीष उनके तन-मन से फूटने लगे उस चावल और पानी को रखने वाले के प्रति !व्यस्क कबूतर ने मन में विचार किया कि थोडा पानी पी  और कुछ चावल खा लूँ  और थोडा सुस्ता लूं,फिर थोड़ी जान आ जाएगी इस लू में फिर से उड़ने की!तब अपने अन्य साथियों को भी यही बुला लाऊंगा!

चारो जीव परमात्मा और उस दाना-पानी को रखने वाले का धन्यवाद करते हुए अपनी भूख-प्यास को शांत करने लगे!वो  सोच रहे थे कि  धर्म अभी भी जिन्दा है, सबका हित चाहने वाले है अभी भी!हम जैसे निरीह बेजुबानो की परवाह करने वाले है धरा पर!

तभी  जैसे कोई  भूचाल सा आया हो,  जिस लकड़ी के सहारे वो टोकरी खड़ी थी…… अचानक ...... झटके से सरकी , वयस्क कबूतर तो उस हलचल को भांप गए थे!जब तक टोकरी गिरती तब तक दोनों बहार थे!पर दोनों बच्चो को अभी इतना अनुभव नहीं था .... सो जब तक उनकी समझ में कुछ आता तब तक वो  घुप्प अँधेरे में आँखे फाड़ रहे थे, बेचैनी में टोकरी से सर टकरा रहे थे!

जिस लकड़ी के सहारे वो टोकरी खड़ी  थी उसके निचले सिरे से एक बहुत महीन सा धागा बंधा हुआ था,जिसे वहाँ  से थोड़ी दूर कोने में अजित और सलिल पकड़े बैठे थे!दोनों पांचवी कक्षा में पढ़ते थे,गर्मियों की छुटियाँ चल रही थी!खली दिमाग शैतान का घर!दोनों को शरारत सूझी और कोई पंछी पकड़ने की चाह ने ये पूरा ताम-झाम जमवा दिया!दोनों ख़ुशी से किलकारियां मारते हुए, उछालते हुए आए!दोनों बहार बचे कबूतर फर्र्र से उड़ कर दूर जा बैठे और अपने दोनों नन्हे मुन्नों को देखने की आस लिए बैचनी से इधर-उधर चक्कर काटने लगे!अब उन्हें कोई लूं-गर्मी अथवा धूप की सुध नहीं रही थी!
दोनों मन में प्रार्थना कर रहे थे कि अभी बस वो दोनों उस टोकरी से कैसे भी निकल आये बस!फिर तो अपने कुटुम्ब में जाकर सबको यही बताना है कि यहाँ मत आये... यहाँ क्या ऐसी किसी भी जगह जरा सोच-समझ कर ही जाए!क्या पता कौन-कहाँ घात लगाए बैठा हो!

  

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

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