मंगलवार, 10 सितंबर 2013

इन्सानियत से होता कोसो दूर इन्सान !....(कुँवर जी)

हालातो के हाथो
में खुद को सौंप
दुआ,बददुआ और
किस्मत को भूल,
एक दुसरे को मारने को मजबूर इन्सान !

दया,धर्म और धैर्य
सब गए रसातल में
पथरीली आँखों के
वहशीपन में ये दो पाया
इन्सानियत से होता कोसो दूर इन्सान !

अहम्,स्वार्थ,
और राजनीति के षड्यंत्र,
इनसे आँखे मूंदे,
खुद से ही लड़ता हुआ
भला चल पायेगा कितनी दूर  इन्सान !




जय हिन्द, जय श्रीराम,
कुँवर जी,

8 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. उत्तर
    1. मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.... सम्भवतः पहली बार आप पधारे है...
      आभार!

      कुँवर जी,

      हटाएं
  3. बहुत मुश्किल है इन्सान को ऐसे चलना ...
    भावपूर्ण रचना ...

    उत्तर देंहटाएं

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