गुरुवार, 28 जुलाई 2011

ये शाम...

दिन की सारी  
उमंगो-तरंगो को समेट  
रोज
ये शाम 
ढल जाती है
सारी चमक
उम्मीदों वाली
शाम की लालिमा में
पिघल जाती है...

ये शाम 
ढल जाती है 
फिर भी ढलती नहीं
जाने क्यों
रात बन फिर
सुबह में बदल जाती है....

हारता तो नहीं हूँ
पर हार
हो ही जाती है.
उठा कदम
धरते ही
धरती सी फिसल जाती है...


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

बुधवार, 8 जून 2011

अब शायद भारत जाग जाए.....!(कुँवर जी)

अब शायद भारत जाग जाए!

जब चाहते है सब ऐसा,
हो भारत वही पहले जैसा,
वो फिर विश्वविजय के राग गाये!
तो अब शायद भारत जाग जाये!

मै,तुम,वो;हम सब क्यों न एक हो?
सर्वहित क्यों न चाहे,क्यों इरादे न हमारे नेक हो,
भला क्यों न ये दुर्भाग्य भाग जाए!
फिर तो शायद भारत जाग जाये!

बलिवेदी पर असंख्य बेटे बलिदान हुए,
कितनी मांगे उजड़ी कितने आँचल लहुलुहान हुए,
धुल अब अतीत के सारे  दाग जाए!
शायद अब भारत जाग जाये!

बस लिखो ही नहीं झकजोर दो सबको,
 राह प्रेम की कोई और दो सबको,
अब तो कुचला नफरत का ये नाग जाये!
अब शायद भारत जाग जाये!

रोना ही किस्मत नहीं तुम्हारी कब तुम जनोंगे,
आँखे खोलो नहीं तो मर कर भी क्या जागोंगे!
जो ये आंसू तुम्हारे जन-जन में बन आग जाये,
तो शायद भारत जाग जाये!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

बुधवार, 1 जून 2011

वाह रे मोबाइल तेरी महिमा!...(कुँवर जी)


मोबाइल!

इसे तो आप जानते ही होंगे!आज के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण जरुरत यही तो है!कुछ दिनों पहले जब मोबाइल इतना प्रचलित नहीं हुआ था,तब मैंने कही पढ़ा था की "जैसे पहले गाँव में कोई रिश्तेदार या मेहमान आता था तो सबसे पहले वो घर की राजी-ख़ुशी के बारे में पूछता,फिर घर में दूध-घूँट के बारे पूछता!फिर खेत-खलिहान के बारे में!उसके बाद इधर-उधर कि बातों पर चर्चा होती!पर आने वाले समय में वहाँ भी ये बाते पुरानी हो जायेगी!घर में घुसते ही राजी-ख़ुशी के बाद पूछा जाएगा कि "पतली पिन का चार्जर है?"  

आज एक जगह फिर मोबाइल की महिमा को दर्शाने वाला मार्मिक वृत्तांत पढ़ा, आज वो ही आपके समक्ष है!

एक भिखारी किसी घर में खाना मांगने के लिए गया!
वहा उपस्थितजन ने उसे बोला कि खाना अभी बना नहीं है!

इस पर भिखारी बोला..."कोई बात नहीं;मेरा मोबाइल नम्बर ले लो,जब बन जाए मिस कॉल दे देना......" 
वाह रे मोबाइल तेरी महिमा!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

सोमवार, 30 मई 2011

पेड़ों की नब्ज थाम, उनकी सांसों को लेते हैं सहेज,ये चमत्कार ही तो है!...(कुँवर जी)

हमारे जीवन में पेड़ो का एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है!इनकी अनुपस्थिति में हमारे जीवन की कल्पना करना भी बेहद दुखद है!अपनी कितनी ही जरूरते हम इनसे पूरी करते है!
और कितनी ही यादें हमारी जुडी होती है हमारे आस-पास के पेड़ो से!

लेकिन हमारी अन्य जरूरते इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण हमें अब लगने लगी है कि हम उन्हें पूरा करने के लिए कोई भी पेड़,कितना भी पुराना पेड़ कुछ क्षणों में उखाड़ फेंकते है!सब यादें उस पेड़ की,हमारी उस पेड़ से जुडी सब बाते सब फिजूल हो जाती है!
हम ये भी भूल जाते है की ये पेड़ कितना प्राचीन है?


कुछ भी तो हम याद नहीं रख पाते,या रखना नहीं चाहते,जो भी! कई बार ऐसा भी होता है जिसको उस पेड़ को उखाड़ने की जिम्मेवारी मिली होती है उसे उस पेड़ से कोई लेना-देना नहीं होता,कोई भावनात्मक लगाव उसका पेड़ से नहीं होता!उसे तो बस अपना काम करने के पैसे लेने होते है!सो वह तो केवल अपना काम भर करता है,लेकिन असल में एक बहुत पुराना और महत्वपूर्ण पेड़ हम खो चुके होते है!




















अभी पिछले दिनों हमारी कम्पनी परिसर में भी ऐसी ही एक दुर्घटना घटी!एक बहुत प्राचीन और विशाल पीपल का पेड़ कटवा दिया गया!हालांकि हिन्दू धर्म की मान्यताओ के हिसाब से यथासंभव उसकी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना और ब्रहमहत्या से लगने वाले पाप से बचने के लिए क्षमायाचना  भी की गयी!पर ये सब उस पेड़ बचा नहीं सकी!

जब वो पेड़ काटा जा रहा था तो एक अजीब सा सूनापन  मस्तिष्क में फ़ैल रहा होता था!मन बचपन के उन दिनों में चला जाता था जब हम कोई छोटा पौधा उखाड़ कर लाते थे कहीं से,उसकी जड़े मिटटी में लपेट सपेट कर,अपने आँगन या खेत में लगाने के लिए!और लगा देते थे,कुछ पौधे आज पेड़ बन चुके है,कुछ तभी सूख भी गए थे!वो बाते ही याद आ रही थी!सोचते की काश इतने बड़े और पुराने पेड़ को भी हम उखाड़ कर दूसरी जगह लगा पाते तो शायद ये पेड़ बच जाता!
पिछले दिनों अखबार में एक खबर पढ़ी तो ख़ुशी का ठिकाना न रहा!अरे नहीं..!वो कम्पनी वाला पेड़ दुबारा नहीं उग आया था,वो खबर थी पेड़ को एक जगह से दूसरी जगह लगाने वाली खबर!

जिसे मै असंभव सा सोच रहा था एक हरियाली नामक संस्था उसे पूरी श्रद्धा और समर्पण कर रही है!उनकी ये मुहीम मुझे तो बहुत ही अधिक सरहानीय और एक तरह से मानव जाती पर परमात्मा का आशीर्वाद सा लगी!

ये है उस संस्था का इन्टरनेट पर लिंक !
यहाँ आप इस संस्था के बारे में विस्तार से जान पायेंगे!


मानवता  के हित किया जाने वाला ये अद्भुत प्रयास चमत्कार ही तो है!क्या ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहन नहीं मिलने चाहिए! समय और जानकारी के अभाव में मैंने ये एक तुच्छ सा प्रयास किया है यदि उचित लगे तो आप भी यथा संभव प्रयास करे!हो सकता है आपका ये प्रयास किसी की कोई सुनहरी स्मृति,किसी की आस्था,और पृथ्वी और मानवता के लिए एक पेड़ सहेजने का कारण बन जाए.....

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शनिवार, 14 मई 2011

ये वर्दी वाला कुछ खाता नहीं क्या...?

मैंने देखा
पतली सी कमर,
कमजोर से कंधे,
वाला एक आदमी
और वो भी वर्दी वाला....










अरे  ये कुछ खाता नहीं क्या...?


जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी, 

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