शनिवार, 21 जनवरी 2012

मयंक जी असल में मुझे भाषा ज्ञान बहुत अधिक नहीं है.....

राम राम जी....
आदरणीय मयंक जी 
  
मैंने आपकी टिपण्णी पढ़ी...कुछ देर के लिए सोचा जरूर,सोचना पड़ा...अब तक जैसे मुझे चाहिए थे वैसे ही कमेन्ट आ रहे थे...ये पहला ऐसा कमेन्ट रहा अब तक जो मुझे झकझोरने वाला रहा...... !

सर्वप्रथम मै आपका हार्दिक धन्यवाद करता हूँ कि आप मुझ जैसे तुच्छ और निम्न स्तरीय को पढने के लिए अपना अमूल्य समय खर्च करते हो!सच में आँखों में पानी छलक आया था एक बार तो!

अभी; मै आपसे समय पर संपर्क नहीं कर पाया था उसके लिए हृदय से खेद व्यक्त करता हूँ!सच मानिए,बहुत कम ही इन्टरनेट को समय दे पा रहा हूँ!आपको पढ़ जरुर लिया था पर संपर्क ही नहीं कर पाया....इसके लिए एक बार फिर खेद है!

और जो आपने कहा कि कई भाषाओ का मिलन धार कम करता है तो....इसके लिए मै यही कहना चाहूँगा कि असल में मुझे भाषा ज्ञान बहुत अधिक नहीं है!बस आम बोलचाल की भाषा की ही जानकारी अधिक है,जानकारी भी क्या बस जो कुछ पढ़ा-सुना है वही बस....जिसमे उर्दू,फ़ारसी के शब्द कुछ ऐसे मिले हुए है जैसे कि सब एक ही है...कुछ अलग है इसका पता ही नहीं चलता..और फिर मन में जो भाव जैसे भी आते है वो वैसे के वैसे ही कागज़ पर उतर आते है..मै उनमे अधिक कुछ परिवर्तन नहीं कर पाता....और धार.... उसका तो मुझे पता भी नहीं चलता कि है भी या नहीं..... बस मन के प्रवाह को ज्यो का त्यों शब्दों के प्रवाह में परिवर्तित करने का प्रयास सदा बना रहता है.....


वैसे ये सब मै केवल आप तक पहुंचाने के लिए ही लिख रहा था किन्तु अज्ञानता और लापरवाही वश मुझसे आपका वो अमूल्य कमेन्ट डिलीट  हो गया...इसके लिए मै क्षमा मांगने के योग्य भी नहीं हु फिर भी मुझे विश्वाश है कि आप मुझे क्षमा कर देंगे... सो इसे मै सार्वजनिक रूप से आपसे क्षमा मांगने और खेद व्यक्त करने के लिए ब्लॉग पर पोस्ट कर रहा हूँ!

साथ ही मै संजय भास्कर जी   से भी क्षमा चाहूँगा क्योकि उनका कीमती मणिक-तुल्य कमेन्ट भी मुझसे डिलीट हो गया है!




जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

1 टिप्पणी:

  1. कोई बात नहीं कुवर जी ये सब चलता रहता है गलती से हुई न ......कोई बात नहीं भाई

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