मंगलवार, 2 जुलाई 2013

हमें जरुरत क्या है अपने दैनिक जीवन में भगवान् की....?(कुँवर जी)

श्री हरी!ॐ !
हमें जरुरत क्या है अपने दैनिक जीवन में भगवान् की?उसके अस्तित्व को मानने अथवा न मानने से क्या फर्क पड़ता है हमारे दैनिक जीवन में?
उनका नाम लेने से अथवा स्मरण करने से अथवा उनके अस्तित्व को मान लेने से ही हमारी दैनिक जरुरत पूरी नहीं हो जाती!न ही हमें कोई नौकरी मिलती है, ना रोटी ही मिलती है और ना ही कोई मकान बन जाता है तो जरुरत क्या है उस भगवान् की हमें!भला क्यों मान ले हम उसे कि वो कहीं है भी?
मेरे एक मित्र है,आजकल अमरीका में उनका वास है!इंटरनेट के माध्यम से कुछ चर्चा चल रही थी तो कुछ ऐसे ही भाव वो जता रहे थे!
स्पष्ट शब्दों में वो जानना चाह रहे थे कोई "वैलिड" सा कारण जिसके आधार पर हम परमात्मा का होना मान ले!अब इसके गूढ़ प्रशन पर मुझे मौन ही साधना पड़ा!

अब कुछ पुरानी सुनी हुयी बाते स्मरण में आ रही है!उसको तो पता नहीं इस से संतुष्टि मिलेगी या नहीं पर मै  जरुर संतुष्ट हो जाता हूँ ऐसी बाते स्मरण कर के!

पढ़ा था कही.. कहाँ पता नहीं!

हम जब कहीं घूमने  जाते है तो अपने साथ रुपये-पैसे जरूर रखते है!हमारा ध्यान के इन पर ही केन्द्रित  होता है सबसे ज्यादा!हालांकि हम इन्हें खा नहीं सकते,ओढ़-पहर नहीं सकते पर सबसे अधिक ध्यान  पैसो पर ही होता है कि इनकी वयवस्था हमारे पास बनी रहे!और इन्हें पाने के लिए बहुत अधिक मेहनत भी
  करनी पड़ती है !
हालांकि खाना इस से ज्यादा जरुरी विषय है परन्तु हम उतना खाने कि चीजो पर ध्यान नहीं देते जितना पैसे को महत्त्व देते है!थोडा बहुत खाने की चीजे भी ले लेते है!हालांकि हम बिना खाए भी कई दिन रह सकते है फिर भी खाने की कुछ चीजे हम साथ लेके ही चलते है!

खाने से थोडा ज्यादा जरुरी है पानी!पर उस पर खाने से भी कम ध्यान दिया जाता है जाते हुए हम सोचते है कि पानी तो कही भी आसानी से उपलब्ध हो जाएगा!उपयोग के हिसाब से पानी खाने से कही अधिक बार हम प्रयोग करते है पर पानी की उपलब्धता पर खाने से कम मेहनत करनी होती है/करते है!
अब पानी से भी अधिक महत्वपूर्ण है हवा!इसके विषय में हम सोचते भी नहीं!कभी सोचते ही नहीं कि कल के लिए कुछ हवा रख ले!या कही जा रहे है तो अपनी हवा संग ले चले!
अथवा तो ये कहे कि कभी कुछ थोडा सा भी श्रम करने की जरुरत नहीं पड़ी है जीने लायक हवा को पाने के लिए!बिना कुछ किये ही ये हमें सर्वत्र उपलब्ध होती है!


क्या ये एक "वैलिड"  कारण नहीं है उसके होने का कि हमारे जीने के लिए सभी जरुरी चीजे हमें बिना किसी विशेष श्रम के उपलब्ध हो जाती है!इन सब चीजो की व्यवस्था वो पहले ही कर देता है!

यहाँ बस यही स्पष्ट करने की कोशिश थी कि जो चीज हमारे जीने के लिए, जीवन के लिए जितनी महत्वपूर्ण है, अथवा तो ये कहे  कि जीव के जीने के लिए जो चीज जितनी ज्यादा जरुरी है वो उसे उतने ही कम श्रम और अधिक आसानी से उपलब्ध हो जाती है!इसी आधार और अनुपात पर इन चीजो के लिए हमारे मन में चिंता-जरूरत  उत्पन्न होती है!

इसी तरह खाना-पानी-हवा को भी जो प्रयोग कर रहा है, जिसके बिना हम एक क्षण भी नहीं रह सकते!खाने के बिना भी हम कुछ दिन रह सकते है,पानी के बिना भी हम कुछ दिन जी सकते है और हवा के बिना भी हम कुछ समय तक जीवित रह सकते है पर जिस कारण से हम इन सबका प्रयोग कर पाते है वो आत्मा, उस चैतन्य स्वरूप का तो हम कभी ख्याल ही नहीं करते!पर वो हवा से भी अधिक समीप होता है हमारे!उसके बिना तो एक निमेष  भी शरीर जीवित नहीं रह सकता पर उसके लिए तो सांस लेने जितना श्रम भी हम नहीं करते!हमें उतना करने की भी जरुरत महसूस नहीं होती!
हमें जरूरत ही अभाव में होती है!उस परमात्मा का कभी अभाव ही हमें नहीं होता तो जरुरत भी महसूस नहीं होती!
हमें जरुरत ही नहीं है उसका होना मानने की,क्योकि कभी उसका अभाव ही नहीं है हमारे होने में!

जय हिन्द , जय श्रीराम 
कुँवर जी,
 

 

 

बुधवार, 26 जून 2013

प्रकृति ने की क्रिडा तो उपजी पीड़ा...(कुँवर जी)

जब तक चली तो खूब खेला
मानव प्रकृति संग
और जब
प्रकृति ने की क्रिडा
तो उपजी पीड़ा,
विश्वाश 
कही घायल पड़ा
लोगो से नजरे चुरा
कराह रहा है,
श्रद्धा
किसी पेड़ की टहनी में
अटकी हुई सी
किसी कीचड़ में दबे चीथड़े में
सिमटी हुई सी मौन है!
आस है कि
टकटकी लगाये बैठी है
उसी की और ही
जिसने
ये तांडव मचाया है!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी

गुरुवार, 20 जून 2013

आज निर्जला एकादशी है!



ॐ नमः भगवते वासुदेवाय!
आज निर्जला एकादशी है!संयोग और सौभाग्य से आज ये त्रिस्पर्षा एकादशी भी है,अर्थात आज एकादशी के साथ द्वादशी और त्रयोदशी तिथियों के योग का संयोग है जो कि बहुत कम देखने को मिलता है!






वैसे तो वर्ष कि सभी चौबीस एकादशियो को निराहार रह कर उपवास करना चाहिए लेकिन यदि हम सभी न रख सके तो निर्जला एकादशी का व्रत अवश्य ही रखना चाहिए!महर्षि वेड व्यास जी ने भीमसेन को बताया था कि सभी एकादशियो के बराबर निर्जला एकादशी है! और जब त्रिस्पर्षा एकादशी हो तो ये एक हजार एकादशियो के सामान बताई गयी है!इसे भीमा एकादशी और पांडव एकादशी भी कहते है!
 






आज के दिन निराहार तो रहना ही होता है संग में पानी भी नहीं पीना होता है!एकादशी का दिन भगवान् विष्णु जी को स्मरण करते हुए बिताना चाहिए!
ॐ नमः भगवते वासुदेवाय!
ॐ नमः भगवते वासुदेवाय!
ॐ नमः भगवते वासुदेवाय!
 यही जप मानसिक अथवा वाचिक चलता रहना चाहिए!




आज के दिन  कितने ही लोग जगह-जगह प्याऊ लगाते है!राहगीरों को ठंडा और मीठा जल पिलाते है!कुछ ऐसे भी नारायण सेवा-स्मरण करते है!

निर्जला एकादशी के बारे विस्तृत रूप से पढने के लिए आप यहाँ देख सकते है!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

बुधवार, 19 जून 2013

विवादित धारावाहिक "जोधा-अकबर" पर प्रतिक्रिया......(कुँवर जी )

 जी टीवी पर दिखाए जाने वाले विवादित धारावाहिक "जोधा-अकबर" पर अपनी प्रतिक्रिया जी टीवी तक सीधी पहुंचाए!
 पता  लगते रहना चाहिए कि  वो क्या दिखा रहे है उसका इस देश पर, समाज पर, इतिहास पर  और उनकी साख पर क्या प्रभाव पड़  रहा है!


प्रतिक्रिया देने के लिए यहाँ क्लिक करे!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर  जी

सोमवार, 17 जून 2013

"जानवर" ......(कुँवर जी)

 एक बहुत  ही आधुनिक लड़के का विवाह कुछ पुरानी विचारधारा और कम अंग्रेजी भाषा-संस्कृति की जानकार लड़की से हो जाता है!
लड़की बहुत सीधी सी थी!पुराने धारावाहिकों में जो पत्नी अपने पति को संबोधित करती वही संबोधन उसे स्मरण में थे,अन्य नहीं!
उसका पति आया और बड़े प्यार से उसे पुकारा!अब लड़का थोडा आधुनिक तो था ही साथ अंग्रेजी भाषा और संस्कृति को दर्शाने वाला भी था!उसने बड़े ही प्यार से अपनी पत्नी को आवाज लगाई... जान!
अब लड़की को "जान" की उम्मीद तो कतई नहीं नहीं थी!वो बेचारी सोचती-विचारती चुप रही!लड़के ने फिर अपना पूरा प्यार उड़ेलते हुए आवाज लगाईं... "जान, तुम बोलती क्यों नहीं!"
लड़की बेचारी असमंजस में.... एक तो घूंघट निकाले हुए थी सो अब ये भी पक्का नहीं कि उसे ही बुलाया जा रहा है अथवा तो किसी और को!
अब लड़के का सब्र भी थोडा उखाड़ता सा प्रतीत हुआ! उसने लड़की का हाथ पकड़ते हुए अपना समस्त प्यार घोलकर फिर कहा.. जान!
अब लड़की ने भी  उतने ही, नहीं उस से भी ज्यादा प्यार सहित उत्तर दिया.... "जानवर"!

(बहुत पहले सुनी हुई एक बात!)

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

लिखिए अपनी भाषा में