मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

मन की असमंजस (कविता) {हरयाणवी रागणी}

आज पता नहीं क्यूँ अपणी मातृभाषा की गोद में बैठने का मन हो रहा है!मै मूलतः हरयाणा का रहने वाला हूँ,हरयाणवी ही वो पहली भाषा है जो मेरी जुबान ने सर्वप्रथम बोली!सो मातृभाषा "हरयाणवी" को कह दू तो ज्यादा गलत न होगा!जैसे हिंदी में कविता,गीत और ग़ज़ल होती है वैसे ही हरयाणवी में 'रागणी' होती है!छंदों का खूबसूरत सा मिश्रण,एक लय और ताल पर जब इसे सुनते है तो कानो का उद्देश्य पूर्ण होता प्रतीत होता है!आप जो अभी पढने जा रहे हो वो एक तुच्छ सा उदाहरण है 'रागणी' का!अब मै तो तुच्छ ही लिख सकता हूँ असली कलाकारों के सामने!
पंडित लख्मीचंद, पंडित मांगे राम,पंडित जगदीश चन्द्र वत्स आदि बहुत बड़े-बड़े नाम है इस श्रृंखला में जिनकी रचनाये वास्तव में महान है!उनको पढ़ कर-सुन कर मेरे चंचल मन में भी कुछ चिड़ियाए फुदक उठती है कभी-कभी!उसी का एक नतीजा आज आप के समक्ष है!

नुक्सान ठा  रहया सूँ मै तेरे तै ना कहवण का!
फेर बेरया ना यो बखत रहवण का ना रहवण का!

बोल कै बता दिया तो ख़तम कहाणी हो ज्यागी,
इब तो तू अपणी सै फेर  चीज बीराणी हो ज्यागी, 
तू बी अणजाणी  हो ज्यागी ढूंढेगी बहाना जावण का!

मन्ने जो कहया नहीं के वो कहणा जरुरी सै,
तू भी तो कह नहीं सकती तेरी अपणी मज़बूरी सै,
जो बात अधूरी सै,करू पूरी जो टाला करू शरमावण का!

जो नहीं कहया तो फेर भी के चाला हो सै,
जिसकी न कोई गौर करै उसका भी राम-रुखाला हो सै,
यु जखम कुधाला हो सै नहीं होता दिखावण का!

मीन तडपे ज्यू पाणी तै बहार आणे पै,
चकवा तरसै ज्यू बादलो के बिन बरसे जाणे पै,
न्योए तेरे तै ना कह पाणे पै हाल मेरा नहीं बतावण का!

कोई के सम्झेग्या जो मेरे जी पै बण रहयी,
कुछ हरदीप माड़ा कुछ किस्मत माड़ी बण रहयी,
बात रह गयी अणकही और हौसला भी नहीं समझावण का!
कुंवर जी,

2 टिप्‍पणियां:

  1. मेरा अनुरोच है कि आप इस रागणी के सफ़र को ज़ारी रखें. रागणी वो विधा हैं जो व्यक्तिगत बातों को करके मनोविनोद को अवसर देती है. और संवेदना और शौर्य के भाव भी भरने में काम आती रही है. इसमें स्वयं के ऐसे अनुभव होते हैं जो सामाजिक कायदों पर टीका-टिप्पणी करके चुटकियाँ लेकर जीवन में रस घोल देते हैं.

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