शुक्रवार, 11 मई 2012

शब्द गूंगे हुए तो तड्पी कलम...(कुँवर जी)


शब्द गूंगे हुए तो तड्पी कलम...

एक पल के लिए..
फिर सोचा
इसमें मेरा तो कोई दोष  नहीं!


शिथिल हुए हाथ तो रोया मन
एक पल के लिए
फिर सोचा
मैंने तो खोया अपना होश नहीं!

न कुछ कर-कह सके
तो रोई  आत्मा,
पर इस से ही तो 

ख़त्म हुआ उसका रोष नहीं!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

19 टिप्‍पणियां:

  1. शब्द गूंगे हुए तो तड्पी कलम...
    एक पल के लिए..
    फिर सोचा
    इसमें मेरा तो कोई दोष नहीं!

    जिस्म चुप भले ही हो जाए
    मगर कलम,
    वो चलेगी,
    होगी कभी खामोश नहीं !

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    उत्तर
    1. राम राम जी,
      आपका प्रोत्साहन कलम को कभी खामोश नहीं होने देगा...

      कुँवर जी,

      हटाएं
  2. उत्तर
    1. जी बिल्कुल, पर कई बार जब शब्द साथ छोड़ते दिखाई दे तो जो दर्द व्यक्त करना था उसे अकेले hi सहन करना पड़ता है,
      असल में अपनी तड़प कलम में दिखाई देने लग जाती है,

      कुँवर जी,

      हटाएं
  3. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....खूबसूरत कविता...कुँवर जी

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  4. कलम की तड़प बनी रहनी चाहिए ... ये विप्लव ये तड़प शब्द अपने आप उगा लेगी ..

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  5. शिथिल हुए हाथ तो रोया मन
    एक पल के लिए
    फिर सोचा
    मैंने तो खोया अपना होश नहीं!
    सुन्दर संयोजन,सुन्दर अभिवय्कती

    उत्तर देंहटाएं
  6. कलम तडपे तो और गहरे शब्द निकलेंगे, बहुत खूब हरदीप|

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  7. बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  8. आप सभी के सहयोग और मार्गदर्शन के लिए आभार!

    कुँवर जी,

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  9. शब्द जब तड़पते हैं तो बिखरते हैं प्राण पाने के लिए ... प्राण देना दोष कैसा

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  10. जितनी तड़पन.....उतने गहरे भाव............

    बहुत खूब..

    अनु

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