मंगलवार, 26 जून 2012

हाय संस्कृति......!(कुँवर जी)

 नवीन कॉलेज  की छुट्टियों में अपने भाई विकास के पास दिल्ली आया हुआ था!विकास यहाँ नौकरी कर रहा था पिछले कई सालो से!अब वो तो सुबह निकल गया ऑफिस,पीछे नवीन पांचवे माले पर बने गाँव की रसोई से भी छोटे या उतने ही बड़े कमरे में टीवी के रिमोट को दबाता रहा!दोपहर का समय तो जैसे-कैसे कट गया,पर शाम को..... रोया  तो नहीं था वो; पर..... !

घूमने की सोच कर बहार निकला,थोडा  भटकने पर ही एक पार्क उसे दिखाई दिया!वहा पहुँच कर उसने थोड़ी खुल कर सांस ली,शायद वही उसे कुछ पेड़ दिखे थे पूरे रस्ते में!कुछ बुजुर्ग वहा टहल रहे थे, कुछ टोली बना ताश खेल रहे थे!एक कोने में दो पोल पर नेट बंधा था,वालीबाल का था शायद,पर खेलने वालो की बाट  जोह  रहा था!वहा  आने-जाने वाले को वो बड़ी गौर से देख रहा था!उसने महसूस किया जैसे बुजुर्गो को छोड़ सभी किसी जल्दबाजी में है!भाग रहे है बस!अधिकतर तो कान पर फोन चिपकाए है!कोई परिचित दिखा तो चलते-चलते ही हाथ मिलाया अथवा तो दूर से ही मुस्कुरा कर हाथ हिला दिया!और सामने वाले ने भी चलते-चलते ही हाथ हिलाया और... चला गया!हाँ,हाय जरूर बोल रहे थे!

नवीन को ये बात बहुत ही अधिक अजीब लगी,बताओ... किसी को किसी से बतियाने का भी समय नहीं है!बस दूर से ही हाथ हिला दिया..?और सामने वाला भी शायद ऐसा ही चाह रहा हो!रात को खाना खाते समय उस से रहा न गया और जो देखा था उस पर वयंग्य करते हुए बोला,"भाई;यहाँ आकर एक नया फैशन देखा है!कोई जानकार यदि राह में मिल जाए तो फोन कान पर लगाओ और हाथ हिला दो,हाय!सामने वाला भी सोचता है कि चलो शुक्र है दूर से ही मिल लिए नहीं तो पता नहीं कितना समय खराब करवाता,तो वो भी इस से खुश होकर दूर से ही हाथ हिला,हाय  कर एक और चल पड़ता है!ये भी खूब है,इसे तो नाम देना चाहिए हाय संस्कृति! " 

जो ग्रास मुह में जा रहा था उसे वही रोक कर विकास नवीन को देखता है और फिर खाने लग जाता है!भोजन करने के पश्चात जब दोनों बहार टहलने के लिए निकलते है तो विकास नवीन के काँधे पर हाथ रख कर बोलना शुरू करता है.."तुम ने बिलकुल ठीक पहचाना इस हाय संस्कृति को नवीन!पर थोडा सा गलत समझ गए इसके बारे में!यहाँ गाँव की तरह किसी के पास इतना समय नहीं है कि वो हर मिलने वाले परिचित से जितना चाहता है उतना मिल पाए!हर कोई घर से 10-11  घंटो बाद ऑफिस के तनाव से लगभग निकलते हुए घर की और भाग रहा होता है!घर पर उसके परिजन किस हाल में है,घर क्या कुछ ले के जाना था,क्या ले लिया है सब उधेड़बुन भी चल रही होती है!ऐसे में अपने लिए समय नहीं निकल पाता पर  जो संस्कार हम में है कि हर परिचित के कुशल-क्षेम की जानकारी लेते रहने के वो अब भी काम रहे होते है!
 हाँ आराम से बतियाने का समय नहीं है पर,... पर दूर से ही हाथ उठा कर सामने वाले से उसका कुशल-क्षेम जाने चाह हम जाहिर करते है!दूर से ही मुस्कुरा कर उसे कहते है कि,मेरी चिंता मत करना मै ठीक हूँ,आप अपने बारे में बताये! सामने वाला भी हाथ उठा कर हमें महसूस करवाता है वो भी मजबूर है,समय उसके पास भी नहीं है पर ठीक वो भी है!"

नवीन जैसे सांस लेनी भी भूल गया हो पर सब सुन और महसूस जरुर कर रहा था!अब उसके मन थोड़ी ग्लानी थी जो विकास ने भी अनुभव की!सामने ही कुल्फी वाला था,विकास ने दो कुल्फी ली और गाँव की बात छेड़ दी!दोनों बतियाते हुए वापस कमरे की और चल दिए!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,  

3 टिप्‍पणियां:

  1. हाँ आराम से बतियाने का समय नहीं है पर,... पर दूर से ही हाथ उठा कर सामने वाले से उसका कुशल-क्षेम जाने चाह हम जाहिर करते है!दूर से ही मुस्कुरा कर उसे कहते है कि,मेरी चिंता मत करना मै ठीक हूँ,आप अपने बारे में बताये! सामने वाला भी हाथ उठा कर हमें महसूस करवाता है वो भी मजबूर है,समय उसके पास भी नहीं है पर ठीक वो भी है!"

    समय की कमी आपसी संबंधों से आत्मीयता चुरा ले जा रही है।

    .

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  2. बिल्‍कुल सही कहा है आपने ....

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  3. बड़े शेहरो में तो ढंग बात करने का भी समय नहीं होता है

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