मंगलवार, 21 जनवरी 2014

धोखा उसकी रगो में बहता है क्या करे....

धोखा उसकी रगो में बहता है क्या करे,
वो करता है फिर सहता है क्या करे!

मशगूल है उसकी आदतो में बाँध तोड़ना,
औरो के चक्कर में फिर खुद बहता है क्या करे!


जय हिन्द,
जय श्रीराम!

3 टिप्‍पणियां:

  1. धोखा उसकी रगो में बहता है क्या करे
    ........ वाह क्या बात प्रभावी अंदाज़ है कुंवर जी

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  2. बहुत खूब .. क्या बात है लजवाब ...

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  3. धोखा उसकी रगो में बहता है क्या करे,
    वो करता है फिर सहता है क्या करे!
    वाह, सुन्दर प्रस्तुति.जिसकी फितरत में हो यह सब तो कोई क्या करे?

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