रविवार, 11 जुलाई 2010

जो भी कहा वो बस बेमानी था......(कुंवर जी)

जो भी सहा वो सब रूहानी था....
जो भी कहा वो बस बेमानी था...

कुछ दुविधा,कुछ दुर्भाग्य,
और कुछ आँख का पानी था!


लिखा पड़ा था पहले से ही कहीं,
और लगा कि हमारी ही मनमानी था!


यूँ जीते जी मरना और तड़पना,
क्या इसी का नाम जिंदगानी था!

चाहता हूँ पर कह नहीं पाता हूँ,
और मौन भी तो मौत अनजानी था!



क्या तुम्हे भी आप-बीती सी लगी,
जो कुछ भी ये मेरी जुबानी था!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

23 टिप्‍पणियां:

  1. "यूँ जीते जी मरना और तड़पना,
    क्या इसी का नाम जिंदगानी था!"
    ........... एक दर्शन आपने व्यक्त किया.

    "नहीं तुमको जीने की चाह
    हमें ना मरने की परवाह
    देखते हैं सच्चा आनंद
    कौन पायेगा उर की थाह."
    ........... एक दर्शन यह भी है.

    वियोग का दोनों ने स्वाद चखा है. लेकिन दर्शन भिन्न-भिन्न.

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  2. वाह ... सुभान अल्ला ..... बहुत लाजवाब ग़ज़ल बन पड़ी है .... कमाल की ज़ज़्बात पिरोए हैं ... बहुत खूब ...

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  3. इस बार तो कहर उठा दिया हरदीप , धांसू कविता !!!!!!!!!!!!!!!!!
    दो पंक्तिया आगे जोड़ लेना शायद अच्छी लगे

    चेहरे कि मुस्कान में छिपी आंसुओ की कहानी था
    बुढ़ापा आने से पहले झुर्राया वो किस्सा जवानी था

    कुछ रेत कुछ पानी था कुछ दरिया सी जिंदगानी था
    कुछ "कुंवर " खुद तबाह हुआ कुछ तेरी मेहरबानी था

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  4. वाह्! बहुत खूब! बेहतरीन रचना.....

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  5. बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

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  6. यूँ जीते जी मरना और तड़पना,
    क्या इसी का नाम जिंदगानी था!

    बहुत ही पसंद आई आपकी ये रचना कुँवर जी..

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  7. यूँ जीते जी मरना और तड़पना,
    क्या इसी का नाम जिंदगानी था!

    बहुत ही पसंद आई, अच्छी लगी आपकी ये रचना
    किस किस बात कि दाद दूँ हर बात दूसरे से भी बढ़ कर

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  8. जो भी सहा वो सब रूहानी था....
    जो भी कहा वो बस बेमानी था...



    बहुत बेहतरीन, बहुत खूब कुंवर जी!

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  9. कमाल की ज़ज़्बात पिरोए हैं ... बहुत खूब ...

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  10. क्या तुम्हे भी आप-बीती सी लगी,
    जो कुछ भी ये मेरी जुबानी था!

    जी बिलकुल लगी ......आपबीती ......और अच्छी भी ....!!

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  11. यूँ जीते जी मरना और तड़पना,
    क्या इसी का नाम जिंदगानी था!

    आपकी रचना अच्छी लगी.....

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