सोमवार, 31 मई 2010

क्या हमारा अपना इतना सामर्थ्य है की हम परमात्मा की दी हुई प्रेरणा को अस्वीकृत कर दे,उसे औचित्यहीन घोषित कर दे,बिना उसकी सहमती या आज्ञा के.....?-(एक विचार....)

आज बस एक प्रशन जिससे मै अकेला जूझता रहता हूँ!

"क्या हमारा अपना इतना सामर्थ्य है कि  हम परमात्मा की दी हुई प्रेरणा को अस्वीकृत कर दे,उसे औचित्यहीन घोषित कर दे,बिना उसकी सहमती या आज्ञा के.....?"


मै मानता हूँ कि 'शब्द' 'विचार' को अक्षरशः प्रस्तुत करने में असफल ही होते है और फिर उन असफल शब्दों से जो विचार बनेंगे क्या वो सफल सिद्ध होंगे.....?नहीं जानता....

तत्पश्चात भी मेरे विचारों के अधिकतम समीप जो शब्द मुझे जान पड़े वही आपके हवाले कर रहा हूँ...आज...!
जो कुछ भी आपके मस्तिष्क में चले इसे पढ़कर कृपया अवश्य अवगत कराये सभी को....क्या पता आपके बहाने किस को क्या मिल जाए........

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

गुरुवार, 27 मई 2010

ओ कान्हा के देस को जाने वाले...(अरज)

ओ कान्हा के देस को जाने वाले...
उसके संग बोल-बतलाने वाले...
उसे अपने संग हंसाने-रुलाने वाले...
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!


शब्दों के अर्थ करने में ही जो उलझा हुआ है...
अपनी नज़रो में ही जो सुलझा हुआ है...
पुष्प खिलने से पहले ही उसका मुरझा हुआ है...
उस मुर्ख को तुम समझा देना...
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!



हम-तुम सब एक है क्या होगा ये जान के...
चलना पड़े तुम्हे चाहे विरूद्ध विधान के...
पार पहुंचा ही दो उसे अनुमान के...
तुम उस से जुदा ही कहा हो बस ये दिखा देना...
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!


वो नादान अनजान तुच्छ धूलि-समान सही...
अभी तक भले ही ढोया  हो उसने अज्ञान सही....
अभी उसके मन में आया कोई और अरमान नहीं...
धुल से धरती तक का सफ़र उसे करा देना....
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!












जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 26 मई 2010

शायद इसलिए है सारे मौन...(कविता),

पहले तो मौन और फिर  पण्डित जी     को पढ़ा तो मन जो विचार उठे वो ही आज आपके समक्ष है.....

सब खुद से ही बोल रहे है,
अपमे मन को टटोल रहे है.....
अन्दर ही अन्दर खुद को तोल रहे है,
लगा अपनी आत्मा का मोल रहे है,
ऐसे में भला ओरो से बोले कौन....
शायद इसलिए है सारे मौन...


सभा सारी आपस में नजरे चुराए,
तिनका दाढ़ी में जान सब दाढ़ी खुजाये,
हमाम में सब नंगे पर्दा कौन हटाये,
इन्सानियत शायद जिन्दा है सो सब शर्माए,
धरती तो फट जाए पर समाये कौन,
शायद इसीलिए है सारे मौन...

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

मंगलवार, 25 मई 2010

वाह कह दे एक बार बस वाह कह दे,.....(हास्य-वयंग्य)

कवी हृदय पती साधारण पतियों से अधिक पत्निव्रता होता है,इसमें कोई दो-राही बात नहीं हैं!उदाहरण के लिए आप कालजयी फिल्म "नवरंग" देख सकते है!

कवी हृदय पती तो बस एक वाह का मारा होता है!पत्नी उसे दुत्कारती रहे,कोई इज्जत ना करे(वैसे ऐसे काम वो कम ही कर पाते है जिनसे उनकी इज्जत आदि में सकारात्मक फर्क पड़ता हो!) फिर भी वो उसके प्रति कोई वैर-भाव मन में नहीं पालते!हर बार वो नकारे जाते है फिर भी वाह सुनने की चाह उनसे एक प्रयास और करवा डालती है!

अपनी सारी लगन का वो बस एक मोल आंकते है..."वाह"!(क्या कहा,भले ही सच्चे दिल से ना हो? तो भाई साहब शुद्ध कुछ मिलता है आजकल?थोड़ी बहुत(या सारी भी) मिलावट तो स्वीकार्य है!सोच में लोच तो होनी ही चाहिए!

अब कल ही की सुन लीजिये......देर रात घर पहुंचे,पत्नी श्री हमारी तरह कविहृदय तो है नहीं,सो हमारे जितनी पतिव्रता तो वो.....मेरा मतलब है वो है तो.....बस अवसर पर दिखाने पर चूक जाती है बेचारी.....!

खाना-पीना हो चुका था,हमारे लिए बचा था या नहीं इसमें हमारी कोई रुचि नहीं थी!(रुचि होने से कोई फर्क भी नहीं पड़ने वाला था,पर हमारी सच में कोई रुचि नहीं थी!)
खट-खट ने जब रूकने का नाम नहीं लिया तो देवी जी प्रकट हुई या उन्हें होना पड़ा जो भी.....!द्वार खुला...लेकिन उसका मस्तिष्क नहीं!"आ गए" जरूर उसने मन ही मन में कहा होगा,लेकिन मैंने महसूस कर लिया था,इसी लिए तो उसका द्वार खोलते ही वापस चला जाना मुझे गलत नहीं लगा!

उसके इसी व्यवहार ने तो मेरे अहम् का समूल नाश कर दिया था,अर्थार्थ अब "शुद्ध कवी" ही बचा था!जो बस हर बार,हर बात में कविता खोजता फिरता है!हालांकि मै जान चुका था कि पत्नीश्री का क्रोध बस राख के नीचे दबी आग कि तरह ही है जो थोड़ी सी कुरेदने पर भी भड़क सकता है....पर.....कविहृदय.....इसका क्या करे!
जो कविता बना के लाया था वो तो अब पुरानी जान पड़ी या उसे सुनाने के लिए भूमिका बना रहा था,मै अब उसे एक तुरन्त बनायी कविता सुना रहा था.....

                                                               वाह कह दे एक बार
बस वाह कह दे,

खाना भले ही ना दे
तू बिना जिरह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे,

जो भी कहना है वो
तू हो बेपरवाह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे,मेरा दिल भी ना दुखे


कुछ इस तरह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे,कुछ ना भी लगे लायक


तो भी बेवजह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे!

जो भी मै कहूं
तू ठीक वही राह कह दे
बस एक बार वाह कह दे!
जय हिन्द,जय श्रीराम
कुंवर जी,

सोमवार, 24 मई 2010

मिट्टी मेरी.... न जाने कैसी है?-(कुंवर जी)

आज ही घर से वापिस आया हूँ!बहुत कुछ पढ़े बिना छूट गया होगा!
एक लम्बी यात्रा और वो भी बस में खड़े होकर..........थकान भी बहुत हो रही है!
कुछ भी नया जो लिखा गया उस से संतुष्टि सी नहीं मिली सो आज पुरानी कविता फिर आपके समक्ष........



किसी का भी दुःख मै नहीं बाँट सकता हूँ,
किसी की भी राहों से कांटे मै नहीं छाँट सकता हूँ,
पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!

जो मुझे जैसा समझता है मै वैसा ही हूँ मै,
जो खुद को जैसा भी समझता है वैसा भी हूँ मै,
पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!

ऐसे तो हाड़-मांस कि ही हूँ मै,
पर नहीं किसी के विश्वाश का हूँ मै,
पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!

गीली सी मिट्टी मानो,कुछ भी घड़ लो,
कोरा कागज़,जो मर्जी लिखो और पढ़ लो,
कुछ-कुछ ऐसी मिट्टी है मेरी!

हर-दीप जल कर बुझ जाता है,
अँधेरा पहले भी था,वही बाद में भी नजर आता है,
कुछ-कुछ ऐसी मिट्टी है मेरी!

पर शायद मिट्टी भी मेरी कहाँ है?
धुल सी,अभी यहाँ,अभी न जाने कहाँ है?
कुछ-कुछ ऐसी मिट्टी है मेरी!

मिट्टी मेरी....
न जाने कैसी है,
है! पर न होने जैसी है!
जय  हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

लिखिए अपनी भाषा में