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सोमवार, 27 दिसंबर 2010

ये रात अँधेरी और सर्द तो जरुर है,पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा...?(कुंवर जी)


ये रात अँधेरी और सर्द
तो जरुर है,
पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा..?
जो
समेटे हुए है,
अंधड़ कितने ही,
कितने ही तुषाराघात सहे हुए है!
खुशियों के कितने ही सूरज
धुंधले-धुंधले से फिर रहे है
मेरे दुखो कि धुन्ध में!
जैसे भीख मांगते हो
कुछ पल को दिखने कि खातिर!
और आस के सूरज तो
फिर से नकलने की आस छोड़,
छिप ही चुके है!

ये रात अँधेरी और सर्द तो जरुर है,
पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा...?


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शनिवार, 27 नवंबर 2010

किस रंज के सायें में उल्लास है!



क्यों आज  आस ही   उदास है,
किस रंज के सायें में उल्लास है!

कर के मंथन कोई खुद ही,
कालकूट पीने का सा भास है!

दिल का दर्द यही  था बस,
या उसे छिपाने का ही ये प्रयास है!

बात छोटी हो या बड़ी,
भला क्यों ये अकेलेपन का एहसास है!

जय हिन्द,जय श्री राम,
कुंवर जी,

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