सर्द रात और गहराती जा रही थी,
पलके थी कि झपकना भी भूल गयी!
साँसों पर जोर नहीं था सो चल रही थी.....
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,
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सोमवार, 10 जनवरी 2011
सोमवार, 27 दिसंबर 2010
ये रात अँधेरी और सर्द तो जरुर है,पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा...?(कुंवर जी)
ये रात अँधेरी और सर्द
तो जरुर है,
पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा..?
जो
समेटे हुए है,
अंधड़ कितने ही,
कितने ही तुषाराघात सहे हुए है!
खुशियों के कितने ही सूरज
धुंधले-धुंधले से फिर रहे है
मेरे दुखो कि धुन्ध में!
जैसे भीख मांगते हो
कुछ पल को दिखने कि खातिर!
और आस के सूरज तो
फिर से नकलने की आस छोड़,
छिप ही चुके है!
ये रात अँधेरी और सर्द तो जरुर है,
पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा...?
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,
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