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मंगलवार, 21 मई 2013

जो था नहीं.....(कुँवर जी)

जो था नहीं,
जो रहेगा नहीं,
वो ही रह कर भला क्या हो जायेगा !
जो रुका नहीं,
जो रुकेगा नहीं ,
 उसके लिए रुक कर भला क्या मिल जायेगा!
पर हम रुक जाते है,
जो है नहीं 
वो ही रह जाते है,
ना  कुछ होता है,
ना कुछ मिलता है,
शेष रह जाता है वही 
जो था ही …। 


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,


बुधवार, 16 मई 2012

आश्चर्य ही आश्चर्य ...... (कुँवर जी)

प्रकाश-पुन्ज को 
अभी निहारा भी न था
जी भर के,
ना समेटा ही था अभी
आश्चर्य 

आँखे खुलने का,
कि तभी
शाम का डर समां गया मन में,
सूरज के भी ढलने का रोमांच
डरा ही तो रहा था!

तम के वहम से सहमा मन
और भी चकित हो गया
जब
देखा कि
तम को भेदती हुई
वो महीन सी किरण
विराट हुई जाती है
फूटी है मुझ ही से...

जय हिन्द,जय श्रीराम!
कुँवर जी,

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