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मंगलवार, 21 मई 2013
गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012
सौ संस्कारों के ऊपर भारी मजबूरी एक .... (कुँवर जी)
सौ संस्कारों के ऊपर भारी मजबूरी एक
आचरण बुरा ही सही पर है इरादे नेक!
खुद बोले खुद झुठलाये जो करे कह न पाए
अजब चलन चला जग में चक्कर में विवेक
भ्रष्टाचार से लड़ाई में हाल ये सामने आये
विजयी मुस्कान लिए सब रहे घुटने टेक!
आचरण बुरा ही सही पर है इरादे नेक!
खुद बोले खुद झुठलाये जो करे कह न पाए
अजब चलन चला जग में चक्कर में विवेक
भ्रष्टाचार से लड़ाई में हाल ये सामने आये
विजयी मुस्कान लिए सब रहे घुटने टेक!
मेहनत से डर कर खुद को मजबूर कहलवाए
जब तक मौका न मिले तब तक है सब नेक!
जय हिन्द, जय श्रीराम,
कुँवर जी
गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012
कहा है साहस खुद को उघाड़ने का....(कुँवर जी)
सब विषयो,
शीर्षकों,
मुद्दों,शब्दों को
इक्कठा कर
जब
कुछ लिखने की सोचता हूँ
तो एक-एक कर के
सब दूर जाते दिखते है....
बस
रह जाता हूँ
खड़ा मै अकेला
और
बात मुझ पर आकर
रुक ही जाती है....
और फिर क्या....
सब मौन....
कहा है साहस खुद को उघाड़ने का....????
कुँवर जी,
शीर्षकों,
मुद्दों,शब्दों को
इक्कठा कर
जब
कुछ लिखने की सोचता हूँ
तो एक-एक कर के
सब दूर जाते दिखते है....
बस
रह जाता हूँ
खड़ा मै अकेला
और
बात मुझ पर आकर
रुक ही जाती है....
और फिर क्या....
सब मौन....
कहा है साहस खुद को उघाड़ने का....????
कुँवर जी,
मंगलवार, 1 मार्च 2011
अपनों के बीच में आज अर्जुन नहीं दुर्योधन है....(कुंवर जी)
कल जब
अमित जी की ओजपूर्ण कविता को पढ़ा तो काफी दिनों के बाद कुछ पंक्तियाँ एक दम दिल से निकल कर आई....
अपनों के बीच में आज अर्जुन नहीं दुर्योधन है,
गीता गायी जाए तो किसके आगे ये भी उलझन है!
जो दिख रहा है उसे देख देख कर
छोटे से मन में बड़ी-बड़ी उधेड़बुन है!
बेशर्मी और बदनामी गौरव का कारण बन रही,
सच्चाई,ईमानदारी,देशभक्ति इनसे कहाँ अब जीवन है!
ठीक गलत के मायने सब बदल गए आज,
खिज़ा को ही बहार मान रहा खुद चमन है!
साधन और सुविधाओं को जुटाने को ही संघर्ष है,
साख और सोच में जैसे हो गयी कोई अनबन है!
जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,
कुंवर जी,
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