सोमवार, 10 जनवरी 2011

साँसों पर जोर नहीं था सो चल रही थी.....

सर्द रात और गहराती जा रही थी,
पलके थी कि झपकना भी भूल गयी!
साँसों पर जोर नहीं था सो चल रही थी.....

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शनिवार, 8 जनवरी 2011

ईंट,पत्थर,कंकड़ और तिनको से भी बच्चा खेलता है...

कौन कहता है कि हंसी में रोना नहीं होता,
जरा उनसे तो पूछो जिनके पास सूना सा कोई कोना नहीं होता!

ईंट,पत्थर,कंकड़ और तिनको से भी बच्चा खेलता  है,
जिस के पास खेलने को कोई खिलौना नहीं होता!

 घास मिली तो सही नहीं तो जमीन पर ही सो गया,
जिसके पास बिछाने को कोई बिछौना नहीं होता!

जिन्दगी को जी कर तो हम भी देखते कभी ना कभी,
जो जिन्दगी भर दुखो को यूँ ही ढोना ना होता!

मन की प्यास बुझाते आँख के पानी से ही हम,
जो किस्मत पे अपनी हमें कभी रोना ना होता!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शनिवार, 1 जनवरी 2011

जब सुख तक चला गया तो इस दुःख की तो क्या औकात है!

अरे!बस थोड़े से दिनों की तो ओर बात है,
 देखो साल बदला है.....
तो हाल क्यों नहीं बदलेगा!
जब सुख तक चला गया तो इस दुःख की तो क्या औकात है!
रोशनिया तक खो जाती है तो
परछाइयों की क्या बिसात है!
सच मे;आँखे खोलो,
वो निशा तो गुजर चुकी,
हो गयी नव प्रभात है!

आओ हम सब मिल कर इस सूर्य-गति-आधारित नव वर्ष का अभिनन्दन करे....
जो कुछ भी हम अपने लिए अच्छा सोच सकते है वो ही सबके लिए सोचे....
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

एक पत्नी-पीड़ित की गुहार...पतिहित में जारी!(कुंवर जी)

आज मोबाइल पर एक बड़ा ही सुकून देता सन्देश प्राप्त हुआ!पढ़ कर लगा कि हमारी तरह कोई ओर भी है यहाँ!
जो भी था सोचा आप तक भी पहुंचा दूं.....




दोस्तों आज हम एक एक अजीब से प्राणी के बारे में पढेंगे...

प्रभु की इस अद्भुत कृति का नाम है "पत्नी"!

@ये अक्सर रसोई में या टीवी के आसपास पायी जाती है!
@इनका पौष्टिक और पसंदीदा आहार है..."पती का भेजा"!
@ये पानी कम "पती का खून" ज्यादा पीती है!
@इन्हें अक्सर नाराज होने का "नाटक" करते हुए देखा जा सकता है!
@इस प्राणी का सबसे खतरनाक हथियार हो "रोना" और "इमोशनली ब्लेकमेल" करना!
@इसके प्रभाव में रहने पर "तनाव" नाम की बिमारी हो सकती है जो लाइलाज होती है!
@और कोई सावधानी आपको इन से नहीं बचा सकती......
एक पत्नी-पीड़ित की गुहार...पतिहित में जारी!


आप सभी को नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामनाये...
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

ये रात अँधेरी और सर्द तो जरुर है,पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा...?(कुंवर जी)


ये रात अँधेरी और सर्द
तो जरुर है,
पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा..?
जो
समेटे हुए है,
अंधड़ कितने ही,
कितने ही तुषाराघात सहे हुए है!
खुशियों के कितने ही सूरज
धुंधले-धुंधले से फिर रहे है
मेरे दुखो कि धुन्ध में!
जैसे भीख मांगते हो
कुछ पल को दिखने कि खातिर!
और आस के सूरज तो
फिर से नकलने की आस छोड़,
छिप ही चुके है!

ये रात अँधेरी और सर्द तो जरुर है,
पर क्या मेरे मन से भी ज्यादा...?


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

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