शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

ले आए आरक्षण.....(कुँवर जी)


जब से ये आंदोलन नामक अंधड़ हरियाणा से गुजरा है अलग ही मानसिक स्थिति हो गई। कितने ही दोस्त इस अंधड़ में उड़ से गए, हम भी शायद उनके लिए किसी गाड़ी सा जल गए हो पता नहीही।
हमारी जिन्दगी बहुत ज्यादा बड़ी तो नहीं लेकिन कई पल ऐसे आते है जो कई जिन्दगी का बोझ सा दे जाते है। हमारे मजबूत चौड़े कन्धे उन कुछ पल का बोझ उठाने में अक्षम होते है। हम लाचार से घुटने टेक देते है उन पलो के।
एक शिक्षक जो इस लुटेरे आंदोलन का हिस्सा नहीं था, उसका समर्थक भी नहीं था, उस अंधी आग के कारण का समर्थक भी नहीं था, वो शिक्षक कई दिन के घोषित अवकाश के बाद कैसे अपने विद्यालय में गया होगा। कैसे उसने अपनी कक्षा में प्रवेश किया होगा और कैसे किसी विद्यार्थी से आँखे मिलाई होगी।

जो शिक्षक इस दंगे के समर्थक है या किसी भी बहाने से उन दंगाईयो के बचाव के भी समर्थक है उन पर थू ही है। वो तो बेशर्मी से अपने कुकर्म का घमण्ड दिखाते फिरेंगे उनका कोई जिक्र ही नही है।

लेकिन जो इसके समर्थक नहीं थे रोना तो उनका है। एक कहावत है कि "समझणिये की मर हो सै" बहुत सही है। वो तो हर उसकी आँखों में जो उसको देख रहा होगा कितने सवाल देखेगा। कोई आँख पूछ रही होगी "कितनी गाड़िया जला कर आए गुरु जी" कोई पूछ रही होगी "कितनी दुकाने लूटी" तो कोई आँख हँस रही होगी ये कहते हुए कि "मास्टर जी; ले आए आरक्षण"।
मन रो रहा है। पता नहीं कैसी कैसी कल्पनाएँ मन में आ रही है।

जय हिन्द,जय भारत।
कुँवर जी।

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

जिन्दगी तुझे ही तो ढूँढ रहे थे.....(कुँवर जी)

अनजानों में कही छिपा होता है 
जाना-पहचाना सा कोई
कभी रास्ते बदल जाते है
तब जान पड़ता है
कभी राहे वो ही रहती है
नजरिये नहीं बदलते
और लोग बदल जाते है।

फिर कही दूर किसी मोड़ पर
पलटते है हम
ना जाने क्या सोच कर
साँस समेट कर धड़कन रोक कर
और 

और पीछे से जिन्दगी छेड़ती है हमे
कहती है कि मै यहाँ तेरी राह तक रही
तू किसकी राह देखे।
मन के चोर को मन में छिपा 
आँखों मिचका कर 
कहते हम भी फिर
अरे तुझे ही तो ढूँढ रहे थे।
चलो चलते है।

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी ,

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

सभी के लिए शुभकारी और अमंगलहारी हो दीपावली।

आस्था, उल्लास, आनन्द और समरसता के इस पावन पर्व पर सभी को परमपिता परमात्मा शान्त चित्त दे, सुखी जीवन दे, समृद्ध व्यवहार दे, अध्यात्मिक वातावरण दे, इश्वर प्रीति-गुरु भग्ति दे, सद्ज्ञान दे।
निरोगी काया निर्मल मन हो,
सात्विक आहार और
 थोडा दान के लिए भी धन हो।
सृष्टि-हित और समाज-हित के अनुसार ही स्वयं-हित करते रहने की समझ हो।

कुछ ऐसी सी ही असीम और अनंत शुभेच्छाओ और प्रार्थनाओ को पूरी करने वाली हम सब की दीवाली हो।

कुँवर जी,
जय हिन्द, जय श्री राम।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

मौन..... (कुँवर जी)

मौन.....
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जिह्वा तालु को सटी है,
और अंतर में फिर भी शोर है,
क्या वहा मुझ से अलग कोई और है…
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ये कैसा मौन है, ये कौन मौन है…?


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी

गुरुवार, 15 मई 2014

नतीजे...(कुँवर जी)

यही रात अंतिम यही रात भारी...

चलो नतीजो के आने से पहले सो लिया जाये!

लिखिए अपनी भाषा में