बुधवार, 20 अप्रैल 2011

ये जो दुनिया है ये तो दुनिया है!....(कुँवर जी)


ये जो दुनिया है
ये तो दुनिया है!

कभी उलट दिशा में चल कर भी साथ होती है,
कभी हम पर हंसती कभी गम में हमारे रोती है,
कभी जागते है हम और ये आराम से सोती है,
कभी हमारी एक शिकन पे चैन अपना खोती है!
ये जो दुनिया है

ये तो दुनिया है!


कभी अपनों में पराये नजर आते है,
कभी परायो में हमसायें उतर आते है,
 बारिशों में कई चेहरे और निखर जाते है,
कुछ के कई और रंग उभर आते है!
ये जो दुनिया है


ये तो दुनिया है!


माना ये जो दुनिया है ये तो दुनिया है,
मगर देखो तो आखिर हम क्या है,
सोचते है ये जानकर भी आखिर मिलना क्या है,
न ये बदलेगी कभी और अपना.....

...अरे!अपना तो ख़ैर क्या है....!

ये जो दुनिया है

ये तो दुनिया है!




जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

एक क्षणिका

हर कोई

अनजान सा

यहाँ जीये जाता है,

न जाने

कौन सा पल

ठहर जाए पलकों पर!



जय हिंद,जय श्रीराम
कुंवर जी,

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

शादी से पहले बातचीत .......?

राम राम जी,एक बार फिर ब्लॉगजगत से दूरी बनी हुयी है!कुछ नया भी लिखा नहीं जा रहा है!आज फिर एक शुरूआती पोस्ट आपके लिए.....

यह विषय आज के समय को देखते हुए बड़ा जरुरी-सा विषय बनता जा रहा है!हालांकि इसकी आवशयकता है भी या नहीं ये परिस्थितियों पर बहुत निर्भर करता है,मेरे हिसाब से तो!इसका एक कारण बताया जाता है कि लड़की ओर लड़के की आपस में जानकारी बढ़ेगी और वो एक दुसरे को और अच्छी तरह जान पायेंगे!जिस से कि उनका आने वाला समय बेहतर होगा!


किन्तु कई बार इसका उल्टा हुआ है!उनकी आपस में एक दुसरे के बारे में जानकारी तो बढ़ जाती है,लेकिन एक रिश्ता जो बनने जा रहा था वो बन नहीं पाता!यहाँ तक कि शादी होने के बाद भी!क्योंकि वो जान जाते है एक दुसरे के बारे में,पहले ही!रोमांच सारा ख़त्म!
पहले क्या होता था,या गाँव-देहात में क्या होता है,लड़का-लड़की एक दुसरे से बात करना तो दूर,जानते भी नहीं,और शादी हो गयी जी!आधुनिक जगत को ये बात बहुत अखरती है!ऐसा कैसे हो गया,कैसे हो सकता है?पता नहीं वो एक दुसरे को समझ पायेंगे या नहीं?वो नहीं समझ पायेंगे तो सुखी कैसे रहेंगे?वगराह-वगराह!

वो ज्यादातर सुखी रहते है!

असल में सुखी रहने का रहस्य दुसरे को समझने में कम और खुद को समझने में अधिक छिपा है!ऐसा नहीं है के वो एक दुसरे को नहीं समझते,समझते है!लेकिन जब तक वो एक दुसरे को समझते है तब एक बहुत बड़ा कालखण्ड जीवन का बीत चुका होता है,जानने के रोमांच में!और जो आनंद मनुष्य दुसरे की जिन्दगी ने झाँक कर लेता है उसका शायद कोई विकल्प नहीं!वो आनंद ले रहे होते है 'किसी अपने' की जिंदगी में झाँकने का!जबकि यही काम यदि शादी से पहले किया जाए तो हम केवल 'किसी' लड़के या लड़की की जिंदगी में झाँक रहे होते है जो अभी तक हमारा कुछ नहीं है!भविष्य में हो सकता है,अभी कुछ नहीं है!सो एक एह्न्कार-सा मन में आ जाता है कि हम निष्पक्ष होकर किसी की जिंदगी में देखेंगे जो की हम कभी हो ही नहीं सकते!एह्न्कार में निर्णय ठीक ही हो इसकी सुनिश्चितता नहीं होती!

दूसरी और जब हम 'किसी अपने' की जिंदगी में झांकेंगे तो हमारे पास निष्पक्ष होने या रहने की मजबूरी नहीं होती!हम स्वाभाविक ही अपने का पक्ष ले सकते है!उसमे केवल अच्छा ही देखने की कोशिश करेंगे!कुछ बुरा यदि दिखाई दे भी जाए तो सोच लेते है की पहले रहा होगा,अब हम नहीं होने देंगे ऐसा!कमियाँ अब भी देखेंगे साथ ही उन्हें ख़त्म करने के उपाय भी!

जबकि शादी से पहले केवल कमियाँ ही दिख पाती है,उपाय तक जाने की कोशिश ही नहीं की जाती!करे भी क्यों?किसके लिए?"ये नहीं तो और सही" वाली खिड़की होती है अभी हमारे पास!वो भी खुली हुई!कोई चिंता ही नहीं!

हालांकि इसका कभी-कभी लाभ भी होता है दोनों को! पर मैंने अब तक ऐसा कम ही देखा है!वैसे जो अनुभव हमारा है वो केवल हमारा ही है!जरूरी नहीं जिन परिस्थितियों में 'क' जो करेगा वही उन्ही परिस्थितियों 'ख' के लिए भी सही रहेगा!


जय हिंद,जयश्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

उम्मीदों के रंग में रंगने की बारी आज है....

मलाल के गुलाल से ही
होली खेलते आये थे अब तक हम,
उम्मीदों के रंग में
रंगने की बारी आज है!
धैर्य के राग पर
मन अपना साज़ है,
आँखों के सुर पे
मौन ही आवाज़ है,
क्योकि बोलने वालों को तो
यहाँ तौलने का रिवाज़ है,
और कोई तौले हमें
इस से दिल नासाज़ है!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

मंगलवार, 1 मार्च 2011

अपनों के बीच में आज अर्जुन नहीं दुर्योधन है....(कुंवर जी)




कल जब 
अमित जी की ओजपूर्ण कविता  को पढ़ा तो काफी दिनों के बाद कुछ पंक्तियाँ एक दम दिल से निकल कर आई....




अपनों के बीच में आज अर्जुन नहीं दुर्योधन है,
गीता गायी जाए तो किसके आगे ये भी उलझन है!

जो दिख रहा है उसे देख देख कर
छोटे से मन में बड़ी-बड़ी उधेड़बुन है!

बेशर्मी और बदनामी गौरव का कारण बन रही,
सच्चाई,ईमानदारी,देशभक्ति इनसे कहाँ अब जीवन है!

ठीक गलत के मायने सब बदल गए आज,
खिज़ा को ही बहार मान रहा खुद चमन है!

साधन और सुविधाओं को जुटाने को ही संघर्ष है,
साख और सोच में जैसे हो गयी कोई अनबन है!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,


लिखिए अपनी भाषा में