(वयंग्य)dhikkar hai ham par लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
(वयंग्य)dhikkar hai ham par लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

ये जो दुनिया है ये तो दुनिया है!....(कुँवर जी)


ये जो दुनिया है
ये तो दुनिया है!

कभी उलट दिशा में चल कर भी साथ होती है,
कभी हम पर हंसती कभी गम में हमारे रोती है,
कभी जागते है हम और ये आराम से सोती है,
कभी हमारी एक शिकन पे चैन अपना खोती है!
ये जो दुनिया है

ये तो दुनिया है!


कभी अपनों में पराये नजर आते है,
कभी परायो में हमसायें उतर आते है,
 बारिशों में कई चेहरे और निखर जाते है,
कुछ के कई और रंग उभर आते है!
ये जो दुनिया है


ये तो दुनिया है!


माना ये जो दुनिया है ये तो दुनिया है,
मगर देखो तो आखिर हम क्या है,
सोचते है ये जानकर भी आखिर मिलना क्या है,
न ये बदलेगी कभी और अपना.....

...अरे!अपना तो ख़ैर क्या है....!

ये जो दुनिया है

ये तो दुनिया है!




जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शुक्रवार, 18 जून 2010

तो धिक्कार है कह दूं....क्या काफी है?





हम शेर से सियार बनते जा रहे है,
तो धिक्कार है कह दूं....क्या काफी है?

खुद को ही भूल रहे तो क्या याद करेंगे पूर्वजो को,
पता नहीं कौन सी थाती हम देंगे अपने वंशजो को,
उनको भी पिसने को तय्यार करते जा रहे है!
तो ये अस्वीकार है कह दूं...क्या काफी है?

रग-रग में खून वही पुराना है क्या नहीं जानते हो,
महज एक प्रयास करने भर फिर क्यों नहीं ठानते हो,
खुद पर गुजरने का इन्तजार ही क्यों करते जा रहे हो,
तो जीना बेकार है कह दूं....क्या काफी है?

कभी विश्व परिवार था आज परिवार ही विश्व हुआ जाता है,
असहनीय था जो कभी आज हमें नजर भी नहीं आता है,
उन मरने वालो में क्या हम नहीं मरते जा रहे है,
तो घोर अन्धकार है कह दूं.....क्या काफी है?

अब नहीं तो कब जागेंगे ये कौन बतायेगा,
क्या खुद भुगते बिना नहीं हमें समझ आएगा,
समर्थ हो कर भी क्यों हम पिछड़ते जा रहे है,
तो धिक्कार है कह दूं....क्या काफी है?

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,








लिखिए अपनी भाषा में